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Rajouri News: मनावर तवी में मिला दुर्लभ कछुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, राजौरी
Updated Wed, 10 Jun 2026 02:46 AM IST
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राजोेरी में दुर्लभ इंडियन रूफ्ड टर्टल मिला, जैव विविधता संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण खोजमनवार तव
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खास खबर
- राजोेरी में दुर्लभ इंडियन रूफ्ड टर्टल मिला, जैव विविधता संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण खोज
- प्रजाति के वितरण क्षेत्र के उत्तर-पश्चिमी विस्तार की संभावना
संवाद न्यूज एजेंसी
राजोेरी। राजोेरी के मनावर तवी क्षेत्र में दुर्लभ इंडियन रूफड टूरटल (पैंगशुरा टेक्टा) की मौजूदगी दर्ज की गई है। यह खोज उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में इस प्रजाति के ज्ञात वितरण क्षेत्र के विस्तार का संकेत मानी जा रही है।
जानकारी के अनुसार लोगों ने मनावर तवी में कछुए जैसी एक प्रजाति देखे जाने की सूचना वन विभाग को दी। सूचना मिलने पर वन्यजीव विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर जीव को सुरक्षित रेस्क्यू किया। बाद में इसकी पहचान इंडियन रूफ्ड टर्टल के रूप में की गई। यह जियोएमिडिडे परिवार की मध्यम आकार की मीठे पानी में रहने वाली कछुआ प्रजाति है।
वन्यजीव राजोेरी-पुंछ प्रभाग के वार्डन ने बताया कि राजोेरी से इस प्रजाति का मिलना जैव-भौगोलिक और संरक्षण दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। रेंज अधिकारी ने बताया कि इस कछुए की पहचान इसकी ऊंची छतरीनुमा (रूफ-शेप्ड) कवच संरचना, जैतूनी-भूरे रंग और धीमी गति से बहने वाले मीठे-पानी के आवासों में रहने की प्रवृत्ति से होती है। यह नदियों, झरनों, तालाबों, जलाशयों और आर्द्रभूमियों में पाया जाता है। यह सर्वाहारी प्रजाति है जो जलीय वनस्पतियों, शैवाल, कीटों तथा जैविक पदार्थों को खाकर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाती है।
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वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार यह खोज दर्शाती है कि राजोेरी के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में अनुमान से कहीं अधिक समृद्ध जैव विविधता मौजूद है। जिला उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानी क्षेत्रों और हिमालय की तलहटी के बीच स्थित एक संक्रमणीय जैव-भौगोलिक क्षेत्र है जो वन्यजीवों के आवागमन के लिए गलियारे का कार्य करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज इस प्रजाति के वितरण क्षेत्र के उत्तर-पश्चिमी विस्तार का संकेत हो सकती है। साथ ही यह जम्मू-कश्मीर में मीठे पानी के सरीसृपों पर व्यापक और व्यवस्थित सर्वेक्षण की आवश्यकता को भी उजागर करती है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने कहा कि वर्तमान समय में नदियों में बदलाव, अवैध खनन, प्रदूषण, आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण और अनियंत्रित विकास गतिविधियां जलीय आवासों के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजोेरी में इंडियन रूफ्ड टर्टल की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि जिले में अभी भी अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्वस्थ जलीय आवास मौजूद हैं।
कोट
नदियों और जल स्रोतों में कचरा फेंकने और अवैध खनन से जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंच सकता है। लोग ऐसी गतिविधियों से दूर रहें। यह खोज जिले की वन्यजीव सूची में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में जुड़ गई है।
इफ्तिखार अहमद खान, रेंज अधिकारी
कोट
यह प्रजाति सामान्यत भारत के उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान के इंडो-गंगा मैदानों की नदी प्रणालियों में पाई जाती है। पीर पंजाल क्षेत्र और जम्मू-कश्मीर के समीपवर्ती इलाकों से इसके प्रमाणित वैज्ञानिक रिकॉर्ड बेहद कम या लगभग अनुपस्थित रहे हैं।
- नदीम इकबाल, वार्डन वन्यजीव राजोरी-पुंछ प्रभाग
खास खबर
- राजोेरी में दुर्लभ इंडियन रूफ्ड टर्टल मिला, जैव विविधता संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण खोज
- प्रजाति के वितरण क्षेत्र के उत्तर-पश्चिमी विस्तार की संभावना
संवाद न्यूज एजेंसी
राजोेरी। राजोेरी के मनावर तवी क्षेत्र में दुर्लभ इंडियन रूफड टूरटल (पैंगशुरा टेक्टा) की मौजूदगी दर्ज की गई है। यह खोज उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में इस प्रजाति के ज्ञात वितरण क्षेत्र के विस्तार का संकेत मानी जा रही है।
जानकारी के अनुसार लोगों ने मनावर तवी में कछुए जैसी एक प्रजाति देखे जाने की सूचना वन विभाग को दी। सूचना मिलने पर वन्यजीव विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर जीव को सुरक्षित रेस्क्यू किया। बाद में इसकी पहचान इंडियन रूफ्ड टर्टल के रूप में की गई। यह जियोएमिडिडे परिवार की मध्यम आकार की मीठे पानी में रहने वाली कछुआ प्रजाति है।
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वन्यजीव राजोेरी-पुंछ प्रभाग के वार्डन ने बताया कि राजोेरी से इस प्रजाति का मिलना जैव-भौगोलिक और संरक्षण दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। रेंज अधिकारी ने बताया कि इस कछुए की पहचान इसकी ऊंची छतरीनुमा (रूफ-शेप्ड) कवच संरचना, जैतूनी-भूरे रंग और धीमी गति से बहने वाले मीठे-पानी के आवासों में रहने की प्रवृत्ति से होती है। यह नदियों, झरनों, तालाबों, जलाशयों और आर्द्रभूमियों में पाया जाता है। यह सर्वाहारी प्रजाति है जो जलीय वनस्पतियों, शैवाल, कीटों तथा जैविक पदार्थों को खाकर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाती है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार यह खोज दर्शाती है कि राजोेरी के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में अनुमान से कहीं अधिक समृद्ध जैव विविधता मौजूद है। जिला उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानी क्षेत्रों और हिमालय की तलहटी के बीच स्थित एक संक्रमणीय जैव-भौगोलिक क्षेत्र है जो वन्यजीवों के आवागमन के लिए गलियारे का कार्य करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज इस प्रजाति के वितरण क्षेत्र के उत्तर-पश्चिमी विस्तार का संकेत हो सकती है। साथ ही यह जम्मू-कश्मीर में मीठे पानी के सरीसृपों पर व्यापक और व्यवस्थित सर्वेक्षण की आवश्यकता को भी उजागर करती है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने कहा कि वर्तमान समय में नदियों में बदलाव, अवैध खनन, प्रदूषण, आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण और अनियंत्रित विकास गतिविधियां जलीय आवासों के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजोेरी में इंडियन रूफ्ड टर्टल की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि जिले में अभी भी अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्वस्थ जलीय आवास मौजूद हैं।
कोट
नदियों और जल स्रोतों में कचरा फेंकने और अवैध खनन से जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंच सकता है। लोग ऐसी गतिविधियों से दूर रहें। यह खोज जिले की वन्यजीव सूची में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में जुड़ गई है।
इफ्तिखार अहमद खान, रेंज अधिकारी
कोट
यह प्रजाति सामान्यत भारत के उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान के इंडो-गंगा मैदानों की नदी प्रणालियों में पाई जाती है। पीर पंजाल क्षेत्र और जम्मू-कश्मीर के समीपवर्ती इलाकों से इसके प्रमाणित वैज्ञानिक रिकॉर्ड बेहद कम या लगभग अनुपस्थित रहे हैं।
- नदीम इकबाल, वार्डन वन्यजीव राजोरी-पुंछ प्रभाग