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Srinagar News: हाईकोर्ट ने बिलकीस को कोचिंग की अनुमति देने वाली याचिका खारिज की
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संवाद न्यूज़ एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने इंडियन कयाकिंग एंड कैनोइंग एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश संजीव कुमार और न्यायाधीश मोहम्मद यूसुफ वानी की खंडपीठ ने टिप्पणी की किसी स्पोर्ट्स फेडरेशन की ओर से सरकारी कर्मचारी की नियुक्ति मात्र से अनापत्ति प्रमाण पत्र, कार्यमुक्ति आदेश या विदेश यात्रा की अनुमति मांगने का कोई प्रवर्तनीय कानूनी अधिकार पैदा नहीं होता है।
इंडियन कयाकिंग एंड कैनोइंग एसोसिएशन ने बिलकीस मीर को 15 फरवरी से 30 सितंबर तक एशियाई खेलों की तैयारियों के लिए राष्ट्रीय टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया था। इसके तहत एसोसिएशन ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से संपर्क कर उन्हें राष्ट्रीय कोचिंग कैंप में शामिल होने के लिए कार्यमुक्त करने का अनुरोध किया था। इसके अलावा उन्हें हंगरी में आयोजित आईसीएफ कैनो स्प्रिंट विश्व कप में चीफ फिनिश लाइन जज के रूप में कार्य करने का भी निमंत्रण मिला था। एसोसिएशन ने अदालत में तर्क दिया कि मीर को कार्यमुक्त न करने से अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की तैयारियों पर असर पड़ा है। खासकर तब जब कथित तौर पर एक अन्य कोच को इसी तरह के विदेशी दौरे की अनुमति दी गई थी।
दूसरी ओर, सरकार ने इस याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि मीर एक सरकारी कर्मचारी हैं। उन पर जम्मू-कश्मीर सरकारी कर्मचारी आचरण नियम 1971 और विदेश यात्रा से संबंधित सेवा नियम लागू होते हैं। बिना अनुमति के विदेश यात्रा और सेवा से जुड़े अन्य आरोपों के संबंध में मीर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई है। आवश्यक दस्तावेज जमा न कारने के कारण उनकी विजिलेंस क्लीयरेंस प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। इसके चलते 19 जून को आदेश जारी कर उनकी प्रस्तावित विदेश यात्राओं की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था।
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अदालत ने माना कि मीर युवा सेवा एवं खेल विभाग में एक स्थायी सरकारी कर्मचारी हैं, इसलिए वे सेवा नियमों से बंधी हुई हैं। खंडपीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी की सेवाएं फेडरेशन को देना केवल प्रतिनियुक्ति माना जा सकता है और कोई भी संगठन नियोक्ता सरकार को अपने कर्मचारी की सेवाएं देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
अदालत ने भारत और विदेशों में खेलों के प्रति बिलकीस मीर के उत्कृष्ट योगदान की सराहना तो की, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी कर्मचारी को नियोक्ता की सहमति के बिना सरकारी सेवा के अनुशासन का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने इंडियन कयाकिंग एंड कैनोइंग एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश संजीव कुमार और न्यायाधीश मोहम्मद यूसुफ वानी की खंडपीठ ने टिप्पणी की किसी स्पोर्ट्स फेडरेशन की ओर से सरकारी कर्मचारी की नियुक्ति मात्र से अनापत्ति प्रमाण पत्र, कार्यमुक्ति आदेश या विदेश यात्रा की अनुमति मांगने का कोई प्रवर्तनीय कानूनी अधिकार पैदा नहीं होता है।
इंडियन कयाकिंग एंड कैनोइंग एसोसिएशन ने बिलकीस मीर को 15 फरवरी से 30 सितंबर तक एशियाई खेलों की तैयारियों के लिए राष्ट्रीय टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया था। इसके तहत एसोसिएशन ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से संपर्क कर उन्हें राष्ट्रीय कोचिंग कैंप में शामिल होने के लिए कार्यमुक्त करने का अनुरोध किया था। इसके अलावा उन्हें हंगरी में आयोजित आईसीएफ कैनो स्प्रिंट विश्व कप में चीफ फिनिश लाइन जज के रूप में कार्य करने का भी निमंत्रण मिला था। एसोसिएशन ने अदालत में तर्क दिया कि मीर को कार्यमुक्त न करने से अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की तैयारियों पर असर पड़ा है। खासकर तब जब कथित तौर पर एक अन्य कोच को इसी तरह के विदेशी दौरे की अनुमति दी गई थी।
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दूसरी ओर, सरकार ने इस याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि मीर एक सरकारी कर्मचारी हैं। उन पर जम्मू-कश्मीर सरकारी कर्मचारी आचरण नियम 1971 और विदेश यात्रा से संबंधित सेवा नियम लागू होते हैं। बिना अनुमति के विदेश यात्रा और सेवा से जुड़े अन्य आरोपों के संबंध में मीर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई है। आवश्यक दस्तावेज जमा न कारने के कारण उनकी विजिलेंस क्लीयरेंस प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। इसके चलते 19 जून को आदेश जारी कर उनकी प्रस्तावित विदेश यात्राओं की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था।
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अदालत ने माना कि मीर युवा सेवा एवं खेल विभाग में एक स्थायी सरकारी कर्मचारी हैं, इसलिए वे सेवा नियमों से बंधी हुई हैं। खंडपीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी की सेवाएं फेडरेशन को देना केवल प्रतिनियुक्ति माना जा सकता है और कोई भी संगठन नियोक्ता सरकार को अपने कर्मचारी की सेवाएं देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
अदालत ने भारत और विदेशों में खेलों के प्रति बिलकीस मीर के उत्कृष्ट योगदान की सराहना तो की, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी कर्मचारी को नियोक्ता की सहमति के बिना सरकारी सेवा के अनुशासन का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।