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Srinagar News: मेघदूत से बाना टॉप तक... साहस, बलिदान और शौर्य की गाथा

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Leh, Siyachin day, Special Story, Meghdoot to Baba Top
सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में गश्त करते भारतीय सेना के जवानस्रोत - भारतीय सेना
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संवाद न्यूज एजेंसी
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लेह। सियाचिन बेस कैंप पर सियाचिन दिवस आज देशभक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। यह दिन भारत के सैन्य इतिहास की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक ऑपरेशन मेघदूत की याद में मनाया जाता है।

बाल्टी भाषा में सिया का अर्थ गुलाब और चेन का अर्थ बहुतायत होता है लेकिन आज यह ‘गुलाबों की जगह’ बर्फ, संघर्ष और सतत सैन्य सतर्कता के बीच दब चुकी है। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, पूर्व सैनिक और जवान भाग लेंगे। इसमें पुष्पांजलि समारोह, संवाद सत्र, चिकित्सा शिविर और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे ताकि दुनिया के सबसे कठिन इलाकों में तैनात सैनिकों के साहस और बलिदान को सम्मान दिया जा सके।
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हर साल 13 अप्रैल को मनाया जाने वाला सियाचिन दिवस 1984 में ऑपरेशन मेघदूत की सफलता का प्रतीक है जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान के ऑपरेशन अबाबील से पहले पहुंचकर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सियाचिन ग्लेशियर पर नियंत्रण स्थापित किया। इस अभियान ने साल्टोरो रिज के साथ बिलाफोंड ला और सिया ला जैसे महत्वपूर्ण दर्रों पर भारत की पकड़ सुनिश्चित की और पाकिस्तान की मंशा को विफल कर दिया।

सियाचिन की वीरता गाथाओं में कायद पोस्ट जो आज बाना टॉप के नाम से जानी जाती है की जीत एक ऐतिहासिक अध्याय है। परमवीर चक्र विजेता बाना सिंह ने इस साहसिक मिशन का नेतृत्व किया और अपने अनुभव साझा करते हुए विनम्रता और दृढ़ता का परिचय दिया। बातचीत में बाना सिंह ने कहा, यह देश की जीत है, मेरी नहीं। सेना में हमेशा करो या मरो की भावना रहती है। हम 24 घंटे देश के लिए तैयार रहते हैं। हम सेना में पीछे हटने या मुंह मोड़ने के लिए नहीं आते। यह हर सैनिक का कर्तव्य है।

मिशन को याद करते हुए उन्होंने बताया कि 62 जवानों की टीम को अत्यंत कठिन परिस्थितियों में इस पोस्ट पर कब्जा करने का कार्य सौंपा गया था। आदेश स्पष्ट था, जब तक पोस्ट पर कब्जा नहीं होगा कोई वापस नहीं आएगा। लगभग एक महीने तक योजना बनाई गई। हर पहलू यानी टीम, हथियार, रास्ता सब तय किया गया। करीब -50 डिग्री सेल्सियस तापमान में यह ऑपरेशन चार दिन में पूरा हुआ। सैनिकों ने अनजान और खतरनाक रास्तों पर चलते हुए बर्फ में अपना रास्ता खुद बनाया। उन्होंने कहा, कठिन परिस्थितियों के बावजूद टीम सफल रही। बहुतों ने इसे असंभव कहा लेकिन मैंने कभी ऐसा नहीं माना। कुछ भी असंभव नहीं है जब तक हम हार नहीं मानते।

काराकोरम पर्वत शृंखला में 20,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र है। इसका सामरिक महत्व बेहद अहम है क्योंकि यहां से गिलगित-बाल्टिस्तान से लेह और काराकोरम दर्रे तक के मार्गों पर नजर रखी जा सकती है जिससे भारत की उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। साथ ही, यहां से शक्सगाम घाटी पर भी नजर रखी जा सकती है।

उन्होंने बताया कि इस संघर्ष की जड़ें कराची समझौता और शिमला समझौता तक जाती हैं जहां एनजे 9842 के आगे की सीमा स्पष्ट नहीं की गई थी, जिससे क्षेत्रीय विवाद और सैन्य टकराव की स्थिति बनी। ऑपरेशन मेघदूत की सफलता एक साहसिक पूर्व-खुफिया रणनीति का परिणाम थी जिसमें वायु सेना ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सैनिकों और रसद की हवाई आपूर्ति कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह इतनी ऊंचाई पर किया गया पहला सैन्य अभियान था।

आज सेना इस क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए हुए है और इतनी ऊंचाई पर सैनिकों और भारी उपकरणों की तैनाती करने वाली दुनिया की एकमात्र सेना है। यहां तैनात सैनिक -60 डिग्री सेल्सियस तक गिरते तापमान, हिमस्खलन और गंभीर ऊंचाई से जुड़ी बीमारियों जैसी चुनौतियों का सामना करते हैं।

इन कठिनाइयों के बावजूद सेना ने विशेष कपड़ों, बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स में उल्लेखनीय प्रगति की है। चीता और ध्रुव हेलिकॉप्टर कठिन मौसम में भी आपूर्ति बनाए रखते हैं, जबकि स्मार्ट सोलर ग्रिड जैसी तकनीकें ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती हैं। पर्यावरण संरक्षण के तहत ग्लेशियर से निकलने वाले कचरे को नुब्रा घाटी के पार्टापुर में रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जाता है और डीआरडीओ के सहयोग से बायोडिग्रेडेबल समाधान विकसित किए जा रहे हैं।

इस प्रकार, सियाचिन दिवस केवल एक स्मरण नहीं बल्कि भारत की रणनीतिक दूरदर्शिता, सैन्य क्षमता और सबसे बढ़कर उसके सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान का जीवंत प्रतीक है जो मानव सहनशक्ति की सीमाओं पर खड़े होकर देश की रक्षा कर रहे हैं।
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