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Srinagar News: पश्चिम एशिया संकट का कश्मीर के पेपर-माशी उद्योग पर असर
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कला...श्रीनगर में पेपर मैश से बने मॉडल को रंगता कारीगर। संवाद
- फोटो : samvad
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- शिपमेंट में देरी और घटती आय जैसी समस्याओं से जूझ रहे कारीगर
- बोले- ऑर्डर में हो रही देरी, पेमेंट फंसी, पता नहीं कब सामान्य होंगे हालात
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का कश्मीर के सदियों पुराने पेपर-माशी उद्योग पर गहरा असर पड़ रहा है। घाटी के कारीगर और निर्यातक अनिश्चितता, शिपमेंट में देरी और घटती आय जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
श्रीनगर के एक अनुभवी पेपर-माशी कारीगर मिर्जा अल्ताफ हुसैन ने कहा कि इस संकट ने सीधे तौर पर उन व्यापार मार्गों और निर्यात चक्रों को बाधित कर दिया है जिन पर कई कारीगर अपनी रोजी-रोटी के लिए निर्भर हैं। हमारे कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ा है। कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। ऑर्डर में देरी हो रही है। पेमेंट फंसी हुई है और हमें नहीं पता कि हालात कब सामान्य होंगे।
कश्मीर की पेपर-माशी कला जो अपने बारीक हाथ से बने डिजाइन और चमकीले रंगों के लिए जानी जाती है लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय बाजारों, खासकर पश्चिम एशिया पर निर्भर रही है। इस क्षेत्र के देश मुख्य खरीदार के तौर पर काम करते हैं जहां त्योहारों के मौसम और पर्यटन चक्रों के दौरान मांग अपने चरम पर होती है। हालांकि चल रहे युद्ध ने लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को बाधित कर दिया है। माल की आवाजाही धीमी कर दी है और शिपिंग लागत बढ़ा दी है।
एक निर्यातक मेहदी हसन ने बताया कि माल या तो रोक दिया जा रहा है या उसका रास्ता बदला जा रहा है। इससे समय सीमा बढ़ रही है। विदेशी ग्राहकों के साथ संबंधों में तनाव आ रहा है। कारीगरों और निर्यातकों के लिए जिनकी रोजी-रोटी इन निर्यातों से सीधे तौर पर जुड़ी है इसके परिणाम गंभीर हैं। उनके अनुसार हम इन उत्पादों पर महीनों तक काम करते हैं। अगर ये समय पर बाजार तक नहीं पहुंचते हैं तो हमारी सारी मेहनत बेकार चली जाती है।
इस संकट का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दूरगामी असर पड़ा है। कई कारीगर छोटे, पारिवारिक इकाइयों में काम करते हैं जहां कुशल श्रमिक काम करते हैं जो लगातार मिलने वाले ऑर्डरों पर निर्भर रहते हैं। अनिश्चितता के माहौल में वर्कशॉप का काम धीमा पड़ गया है और कुछ कारीगरों को आय के वैकल्पिक स्रोत तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
युवा कारीगर इस परंपरा को आगे बढ़ाने से पीछे हट सकते हैं
उद्योग के जानकार मोहम्मद सिद्दीक का कहना है कि लंबे समय तक बनी रहने वाली यह अस्थिरता इस पारंपरिक कला के लिए स्थायी रूप से नुकसानदायक साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में पेपर-माशी सिर्फ एक कारोबार नहीं है बल्कि यह एक सांस्कृतिक विरासत है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। मांग में कमी और आर्थिक दबाव के चलते युवा कारीगर इस परंपरा को आगे बढ़ाने से पीछे हट सकते हैं।
हमें बस थोड़े से सहारे और राहत की जरूरत है : मिर्जा अल्ताफ
कारीगर मिर्जा अल्ताफ हुसैन ने कहा हमने पहले भी मुश्किल दौर देखे हैं लेकिन यह कला हमारी पहचान है। जब तक हालात बेहतर नहीं हो जाते हमें बस थोड़े से सहारे और राहत की जरूरत है। गौरतलब है कि जैसे-जैसे यह संघर्ष गहराता जा रहा है कश्मीर का पेपर-माशी से जुड़ा समुदाय इसे बड़ी बारीकी से देख रहा है और शांति की उम्मीद कर रहा है। न केवल वैश्विक स्थिरता के लिए बल्कि अपनी कला और आजीविका के अस्तित्व के लिए भी।
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- बोले- ऑर्डर में हो रही देरी, पेमेंट फंसी, पता नहीं कब सामान्य होंगे हालात
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का कश्मीर के सदियों पुराने पेपर-माशी उद्योग पर गहरा असर पड़ रहा है। घाटी के कारीगर और निर्यातक अनिश्चितता, शिपमेंट में देरी और घटती आय जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
श्रीनगर के एक अनुभवी पेपर-माशी कारीगर मिर्जा अल्ताफ हुसैन ने कहा कि इस संकट ने सीधे तौर पर उन व्यापार मार्गों और निर्यात चक्रों को बाधित कर दिया है जिन पर कई कारीगर अपनी रोजी-रोटी के लिए निर्भर हैं। हमारे कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ा है। कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। ऑर्डर में देरी हो रही है। पेमेंट फंसी हुई है और हमें नहीं पता कि हालात कब सामान्य होंगे।
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कश्मीर की पेपर-माशी कला जो अपने बारीक हाथ से बने डिजाइन और चमकीले रंगों के लिए जानी जाती है लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय बाजारों, खासकर पश्चिम एशिया पर निर्भर रही है। इस क्षेत्र के देश मुख्य खरीदार के तौर पर काम करते हैं जहां त्योहारों के मौसम और पर्यटन चक्रों के दौरान मांग अपने चरम पर होती है। हालांकि चल रहे युद्ध ने लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को बाधित कर दिया है। माल की आवाजाही धीमी कर दी है और शिपिंग लागत बढ़ा दी है।
एक निर्यातक मेहदी हसन ने बताया कि माल या तो रोक दिया जा रहा है या उसका रास्ता बदला जा रहा है। इससे समय सीमा बढ़ रही है। विदेशी ग्राहकों के साथ संबंधों में तनाव आ रहा है। कारीगरों और निर्यातकों के लिए जिनकी रोजी-रोटी इन निर्यातों से सीधे तौर पर जुड़ी है इसके परिणाम गंभीर हैं। उनके अनुसार हम इन उत्पादों पर महीनों तक काम करते हैं। अगर ये समय पर बाजार तक नहीं पहुंचते हैं तो हमारी सारी मेहनत बेकार चली जाती है।
इस संकट का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दूरगामी असर पड़ा है। कई कारीगर छोटे, पारिवारिक इकाइयों में काम करते हैं जहां कुशल श्रमिक काम करते हैं जो लगातार मिलने वाले ऑर्डरों पर निर्भर रहते हैं। अनिश्चितता के माहौल में वर्कशॉप का काम धीमा पड़ गया है और कुछ कारीगरों को आय के वैकल्पिक स्रोत तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
युवा कारीगर इस परंपरा को आगे बढ़ाने से पीछे हट सकते हैं
उद्योग के जानकार मोहम्मद सिद्दीक का कहना है कि लंबे समय तक बनी रहने वाली यह अस्थिरता इस पारंपरिक कला के लिए स्थायी रूप से नुकसानदायक साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में पेपर-माशी सिर्फ एक कारोबार नहीं है बल्कि यह एक सांस्कृतिक विरासत है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। मांग में कमी और आर्थिक दबाव के चलते युवा कारीगर इस परंपरा को आगे बढ़ाने से पीछे हट सकते हैं।
हमें बस थोड़े से सहारे और राहत की जरूरत है : मिर्जा अल्ताफ
कारीगर मिर्जा अल्ताफ हुसैन ने कहा हमने पहले भी मुश्किल दौर देखे हैं लेकिन यह कला हमारी पहचान है। जब तक हालात बेहतर नहीं हो जाते हमें बस थोड़े से सहारे और राहत की जरूरत है। गौरतलब है कि जैसे-जैसे यह संघर्ष गहराता जा रहा है कश्मीर का पेपर-माशी से जुड़ा समुदाय इसे बड़ी बारीकी से देख रहा है और शांति की उम्मीद कर रहा है। न केवल वैश्विक स्थिरता के लिए बल्कि अपनी कला और आजीविका के अस्तित्व के लिए भी।