सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   Himalayan villages grappling with water crisis find water through new technology amidst vanishing glaciers.

Climate Change: जल संकट से जूझ रहे हैं हिमालय के गांव, ग्लेशियरों के गायब होने के बीच नई तकनीक से मिल रहा पानी

अमर उजाला नेटवर्क, लेह Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 22 Jun 2026 06:37 AM IST
विज्ञापन
सार

इस चुनौती से निपटने के लिए लद्दाख में विकसित की गई कृत्रिम बर्फ भंडारण तकनीक किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है।

Himalayan villages grappling with water crisis find water through new technology amidst vanishing glaciers.
लद्दाख के सक्ती गांव सहित कई हिमालयी बस्तियों में खेती पूरी तरह बर्फ और ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर रही है। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार

जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में छोटे ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं, जिससे लद्दाख जैसे शुष्क पर्वतीय इलाकों में खेती और पेयजल का संकट गहराता जा रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए लद्दाख में विकसित की गई कृत्रिम बर्फ भंडारण तकनीक किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है। स्वचालित तकनीक से तैयार किए जा रहे विशाल बर्फ स्तंभ वसंत ऋतु में पिघलकर खेतों को पानी उपलब्ध करा रहे हैं और भूजल पुनर्भरण में भी मदद कर रहे हैं।



लद्दाख के सक्ती गांव सहित कई हिमालयी बस्तियों में खेती पूरी तरह बर्फ और ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर रही है। हालांकि पिछले कुछ दशकों में कम ऊंचाई वाले छोटे ग्लेशियर लगभग समाप्त हो गए हैं, जिससे किसानों के सामने सिंचाई का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। यह रिपोर्ट बीबीसी की वेबसाइट पर द आर्टिफिशियल आइस पिरामिड्स सेविंग इंडियाज माउंटेन विलेज शीर्षक से प्रकाशित हुई है।
विज्ञापन
विज्ञापन


करीब 4,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सक्ती गांव अत्यंत शुष्क क्षेत्र में आता है, जहां वर्षा बहुत कम होती है। इसी के मद्देनजर 2010 में लद्दाख के कुछ गांवों ने आइस स्तूपा नामक तकनीक अपनाई थी। इसमें पहाड़ों से पाइपों के जरिए पानी लाकर सर्दियों में हवा में फव्वारे की तरह छोड़ा जाता था, जो जमकर बर्फ के बड़े टावरों का रूप ले लेता था। वसंत में यही बर्फ पिघलकर खेतों को पानी देती थी।
विज्ञापन


हालांकि इस प्रणाली को संचालित करना बेहद कठिन था। तापमान शून्य से 20 से 30 डिग्री सेल्सियस नीचे पहुंचने पर पाइपों में पानी जम जाता था, जिससे पाइप फटने का खतरा बना रहता था। इन चुनौतियों को देखते हुए निजी संस्था एकर्स ऑफ आइस और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर ऑटोमेटेड आइस रिजर्वायर (एआईआर) तकनीक विकसित की है।

इस प्रणाली में भी ऊंचाई वाले क्षेत्रों से पानी पाइपों के जरिये नीचे लाया जाता है, लेकिन पूरा संचालन कंप्यूटर नियंत्रित प्रणाली द्वारा किया जाता है। सौर ऊर्जा से संचालित नियंत्रण इकाई मौसम, तापमान, आर्द्रता और पाइप के भीतर पानी की स्थिति पर लगातार नजर रखती है। यदि पाइप में पानी जमने का खतरा होता है तो प्रणाली स्वतः पानी निकाल देती है, जिससे पाइप फटने की समस्या नहीं आती।

कम पानी में अधिक बर्फ...
नई प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दक्षता है। पारंपरिक आइस स्तूपा में पानी लगातार छोड़ा जाता था, जिससे अपेक्षाकृत गर्म दिनों में पहले से जमी बर्फ भी पिघल जाती थी। एआईआर प्रणाली में पानी को महीन फुहार के रूप में नियंत्रित अंतराल पर छोड़ा जाता है। एक परत जमने के बाद ही अगली परत डाली जाती है। इससे लगभग पूरा पानी बर्फ में बदल जाता है और जल की बर्बादी न्यूनतम रहती है।

भूजल और जलस्रोतों को भी लाभ
लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग के अधिकारियों के अनुसार जिन गांवों में यह प्रणाली स्थापित की गई है वहां भूजल स्तर में सुधार और प्राकृतिक झरनों के पुनर्जीवन के संकेत मिले हैं। किसानों को समय पर सिंचाई का पानी मिलने लगा है। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed