वतन का हाथ थामा तो मिली मौत की सजा: पीओके में तिरंगा लहराया तो उजाड़ दिया घर, 79 साल बाद भी मीरपुर लौटने की आस
17 साल की उम्र में मीरपुर से विस्थापित हुईं 97 वर्षीय पुष्पा देवी ने विभाजन में पिता, भाई, बहन, ससुर और कई रिश्तेदारों को खोया और अपना घर-दुकान जलते देखा। 79 साल बाद भी उनके दिल में अपने पैतृक मीरपुर लौटकर वहीं अंतिम सांस लेने की आस जिंदा है।
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हां! आज का ही दिन तो था जब 14 अगस्त 1947 की देर रात हिन्दुस्तान में तिरंगा लहराया और 15 अगस्त की सुबह उदय हुए सूर्य की किरणों से आजाद भारत नहा उठा। हर तरफ हर्षोल्लास और जश्न का माहौल था। ढोल, नगाड़े, ताशे बज रहे थे। जन गण मन..., वंदे मातरम... और मंगलगीत गाते हुए प्रभातफेरी में शामिल युवा एक-दूसरे को मिठाई खिला रहे थे। मानो हर घर में दीपावली मनाई जा रही है।
इसके इतर हम सभी नंगे पांव, बच्चों को गोद में लिए, जानवरों को हांकते हुए जान बचाने को मीरपुर (मौजूदा पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर/पीओके) से जम्मू-कश्मीर में शरण लेने के लिए भागे जा रहे थे। उन हजारों शरणार्थियों में मैं (पुष्पा देवी) भी शामिल थी। उस समय मेरी उम्र करीब 17 साल थी। मीरपुर जिले के पंदी की खुई गांव मेंं मेरा घर था। ससुर सोहन लाल की किराने और पति सीताराम गुप्ता की कपड़े की दुकान थी।
विभाजन की त्रासदी ने बंटवारे की रेखा खींची तो हिन्दुस्तान की तरफदारी करने वालों का पाकिस्तानी फौज ने नरसंहार शुरू किया। मेरे पिता, भाई, बहन और ससुर समेत कई रिश्तेदारों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मकान-दुकान लूटकर आग लगा दी गई। सात-आठ दिन पैदल चलने के बाद कश्मीर होते हुए जम्मू पहुंचे।
दर-दर की ठोकरें खाते हुए पति सीताराम के साथ दो बेटों और तीनों बेटियों को बेहतर तालीम देकर उन्हें काबिल बनाया। आजाद भारत में पीओके में अपनी और पुरखों की मातृभूमि पर लौटने की आस लिए पति सीताराम 1993 में प्रभु के चरणोंं में समाहित हो गए, लेकिन आज 97 साल की उम्र में भी मुझे (पुष्पा देवी) उम्मीद है कि मैं अपनी अंतिम सांस अपने उसी मीरपुर में लूंगी जहां मैं दुल्हन बनकर डोली में सवार होकर आई थी। सही मायने में मेरे लिए वही दिन आजादी का होगा।
1947 से अपने ही वतन में शरणार्थी हैं
97 वर्षीय पुष्पा देवी बताती हैं कि पाकिस्तानी फौज ने इस कदर कत्लेआम मचा रखा था कि वह अपने छह माह के दुधमुंह बेटे विनोद को छोड़कर चली आई थीं। दूसरे दिन मेरी सास उसे गोद में लिए पहुंची तो आंसू थमे। बताती हैं कि बाकी चार बच्चे यहीं पैदा हुए। जम्मू के बख्शीनगर/मीरपुर कॉलोनी मेंं रहने के दौरान मजदूरी कर सभी को पढ़ाया। बड़ा बेटा विनोद ओएनजीसी से उपनिदेशक पद से रिटायर हुए। अरुण कुमार जेएंडके बैंक से एजीएम, बेटी प्रवीन कुमारी इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य, सुमन बाला और सरोज बाला केंद्रीय विद्यालय से रिटायर हैं।
1947 से अपने ही वतन में शरणार्थी हैं
जेएंडके बैंक के एजीएम पद से रिटायर अरुण कुमार कहते हैं कि मां आज भी मीरपुर जाने की जिद करती हैं। पुराने दौर को याद कर बिलखती रहती हैं। बख्शीनगर मेंं मिले आवास के बदले वर्ष 1970 में 4500 रुपये प्रदेश सरकार ने लिए थे, लेकिन मीरपुर में लूटे गए हमारे मकान-दुकान का कोई मुआवजा नहीं मिला। अपने ही आजाद वतन में हम 1947 से लेकर आज तक शरणार्थी ही हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक सरकार ने कभी कोई मदद नहीं की।
गुलाम कश्मीर से विस्थापित 31,619 परिवारों का हुआ था पंजीकरण
वर्ष 1947 में पाकिस्तान की आक्रामकता के बाद पीओके से विस्थापित होकर आए 31,619 परिवारों ने पुनर्वास सहायता के लिए पंजीकरण कराया था। लोकसभा में 14 मई 2002 को दिए गए जवाब के अनुसार इनमें 22,700 परिवार जम्मू संभाग में कृषि भूमि पर, 3,600 जम्मू, उधमपुर और नौशेरा के शहरी इलाकों में जबकि 5,300 परिवार देश के अन्य हिस्सों में बसे।
दस्तावेज के मुताबिक केंद्र सरकार ने विस्थापित परिवारों को राहत देने के लिए 24 जून 1960 को अनुग्रह राशि और पुनर्वास सहायता देने का फैसला किया। पंजीकरण पांच अगस्त 1962 से शुरू हुआ। करीब 9,500 परिवारों के मामले विभिन्न कारणों से खारिज कर दिए गए। इनमें निर्धारित अवधि में पलायन नहीं करने वाले, परिवार के मुखिया के साथ नहीं आने वाले, शरणार्थी शिविरों में नहीं रहने वाले और 300 रुपये से अधिक मासिक आय वाले परिवार शामिल थे। सरकार ने बाद में इन परिवारों की शिकायतों पर भी विचार किया और नाै अगस्त 2000 को विस्थापित परिवारों के लिए राहत पैकेज जारी किया।
छह साल की उम्र में छोड़ा था घर
पीओके शरणार्थी दौलत राम रैना (85) के लिए 1947 का बंटवारा आज भी दर्दनाक याद है। छह साल की उम्र में वह मां और भाई के साथ छोटा गला (पुंछ) से पलायन कर भारत पहुंचे। रावलाकोट तक तीन दिन पैदल सफर किया। ननिहाल के 18 लोगों को घर में जिंदा जला दिया गया। बाद में नागरोटा कैंप में पिता से मुलाकात हुई। सरकारी ट्रक चालक सेवानिवृत्त रैना के नाम राजोरी में जमीन है लेकिन लाभ नहीं मिला। उन्होंने शरणार्थियों को एसटी दर्जा देने की मांग की है।
गुरुद्वारे में अपनों की हत्या का दर्द आज भी
सरदार केसर सिंह (77) के परिवार ने 1947 में पीओके के मीरपुर चोमक से विस्थापन का दर्द झेला। हालात बिगड़ने पर माता-पिता अलीबाग गुरुद्वारा पहुंचे, जहां ताया-चाचा के परिवार के कई सदस्यों और उनकी पांच चचेरी बहनों की हत्या कर दी गई। बाद में परिवार नगरोटा कैंप आ गया। केसर का जन्म 1949 में जम्मू में हुआ। ढाई साल की उम्र में मां और 15 साल की उम्र में पिता का साथ छूट गया। पीओके में परिवार की करीब 97 कनाल जमीन थी।
जम्मू में चार लाख पीओके शरणार्थी हैं
संगठन एसओएस इंटरनेशनल के अध्यक्ष राजीव चुनी अरसे से शरणार्थियों के अधिकारों, पुनर्वास व न्याय के लिए आवाज उठा रहे हैं। राजीव बताते हैं कि मौजूदा समय सिर्फ आरएस पुरा, बख्शीनगर, सुचेतगढ़, रिहाड़ी, रेशमघर कॉलोनी, कृष्णा नगर, डिग्याना, मुट्ठी और भलवाल कैंप समेत अन्य जगहों पर करीब चार लाख शरणार्थी हैं। इसके अलावा राजोरी, पुंछ, कठुआ, उधमपुर, रियासी, रामबन, उड़ी, बारामुला, अनंतनाग और श्रीनगर में भी शरणार्थी हैं।
जेल से लौटे पिता ने दी मां की भी ममता
शरणार्थी विनोद कुमार दत्ता (79) 1947 के विस्थापन का दर्द आज भी नहीं भूले हैं। उस समय वह महज दो महीने के थे। मीरपुर के काला डब कोटली निवासी दत्ता के परिवार के पास करीब 1200 कनाल जमीन थी। हालात बिगड़ने पर मां की हत्या कर दी गई। सेना में तैनात पिता को गिलगित में पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया। रिश्तेदार जम्मू ले आए। विनोद को यतीमखाने में रहना पड़ा। वर्षों बाद जेल से रिहा होकर पिता जम्मू पहुंचे और बेटे को खोज निकाला।
प्रमुख मांगें ...
- पीओके जब तक खाली नहीं होता तब तक कश्मीरी पंडितों की तरह आर्थिक अनुदान दिया जाए।
- मीरपुर (पाकिस्तान) में मंगला बांध के लिए कब्जाई गई जमीन के मालिकों को वर्ल्ड बैंक से ब्याज समेत मुआवजा दिलाएं।
- जम्मू-कश्मीर विधानसभा में नियमानुसार आठ सीटों पर नेतृत्व प्रदान किया जाए।
- पीओके से आए सभी शरणार्थियों को अनुसूचित जाति जनजाति का प्रमाण पत्र दिया जाए।