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Interview: सुरक्षा एजेंसियों में समन्वय बढ़ने से आतंकवाद पर प्रहार तेज, आतंकियों की पहचान उजागर करना रणनीति
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
Published by: शाहरुख खान
Updated Thu, 19 Feb 2026 03:27 PM IST
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सार
सुरक्षा एजेंसियों में समन्वय बढ़ने से आतंकवाद पर प्रहार तेज हुआ है। आतंकियों की पहचान उजागर करना रणनीति का हिस्सा है। इससे स्थानीय सहयोग बढ़ेगा।
डॉ. विजय सागर धीमान
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कठुआ और किश्तवाड़ में जैश-ए-मोहम्मद से तीन आतंकियों को ढेर करना बड़ी सफलता है। जम्मू संभाग में आतंकरोधी अभियान तेज करते हुए डोडा में जैश के पाकिस्तानी कमांडर सै फुल्लाह और कठुआ में पांच आतंकियों के पोस्टर 'लगाना आतंकवाद के खिलाफ रणनीति है। सुरक्षाबल व एजेंसियां में समन्य बढ़ा है। यह कहना है कि सेवानिवृत्त बिग्रेडियर व रक्षा विशेषज्ञ डॉ. विजय सागर धीमान का।
प्रदेश के सुरक्षा परिदृश्य पर बातचीत में बिग्रेडियर धीमान ने कहा कि पुलवामा हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा तंत्र में बड़ा बदलाव हुआ है। अनुच्छेद 370 के हटने से स्थानीय समर्थन मिला है। आतंकियों को खोजो और सफाया करो अभियान से काफी सफल होता दिख रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों के बीच क्रेडिट गेम खत्म हो गया है और वे टीम वर्क से आतंक के खिलाफ प्रहार कर रही हैं। इसी का परिणाम है कि 20 से 30 प्रतिशत के बीच रहने वाली सफलता दर बढ़कर अब 80 से 90 फीसदी पहुंच गई है। पेश हैं अमर उजाला के अरुण कुमार से बातचीत के प्रमुख अंश।
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प्रदेश के सुरक्षा परिदृश्य पर बातचीत में बिग्रेडियर धीमान ने कहा कि पुलवामा हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा तंत्र में बड़ा बदलाव हुआ है। अनुच्छेद 370 के हटने से स्थानीय समर्थन मिला है। आतंकियों को खोजो और सफाया करो अभियान से काफी सफल होता दिख रहा है।
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सुरक्षा एजेंसियों के बीच क्रेडिट गेम खत्म हो गया है और वे टीम वर्क से आतंक के खिलाफ प्रहार कर रही हैं। इसी का परिणाम है कि 20 से 30 प्रतिशत के बीच रहने वाली सफलता दर बढ़कर अब 80 से 90 फीसदी पहुंच गई है। पेश हैं अमर उजाला के अरुण कुमार से बातचीत के प्रमुख अंश।
कठुआ में हाल में हुई घुसपैठ को आप कैसे देखते हैं?
यह पूरी तरह नई घुसपैठ नहीं है। सक्रिय आतंकी पहले से क्षेत्र में नेटवर्क का हिस्सा रहे हैं। पुलिस की ओर से आतंकियों के पोस्टर जारी करने का मतलब है कि एजेंसियों के पास उनकी पहचान और गतिविधियों की जानकारी है। इनाम घोषित करना रणनीति का हिस्सा है। आतंकियों की पहचान उजागर करने से आतंक के खिलाफ जनभागीदारी बढ़ेगी।
यह पूरी तरह नई घुसपैठ नहीं है। सक्रिय आतंकी पहले से क्षेत्र में नेटवर्क का हिस्सा रहे हैं। पुलिस की ओर से आतंकियों के पोस्टर जारी करने का मतलब है कि एजेंसियों के पास उनकी पहचान और गतिविधियों की जानकारी है। इनाम घोषित करना रणनीति का हिस्सा है। आतंकियों की पहचान उजागर करने से आतंक के खिलाफ जनभागीदारी बढ़ेगी।
एजेंसियों की यह उपलब्धि है कि उन्हें पता है आतंकी कौन हैं और कहां से आए हैं। सीमापार से एक-एक आतंकी की घुसपैठ रोकना मुमकिन नहीं है। कठुआ और डोडा जिले में सक्रिय आतंकी आम व्यक्ति की तरह बाजार या गांव में घूमते रहे होंगे पर अब ऐसा नहीं होगा। अब लोगों से एजेंसियों को इनपुट मिलेगा और आतंक पर प्रहार होगा।
घुसपैठ के बाद कहां से आगे बढ़ते हैं आतंकी?
अंतरराष्ट्रीय सीमा से घुसपैठ के बाद आतंकी बसोहली से छत्रगलां और आगे पहाड़ी बेल्ट की ओर बढ़ते हैं। पहले वे लंबे समय तक सुरक्षित ठिकानों में छिपे रहते थे। सर्दियों में बर्फबारी के बाद नीचे आकर गतिविधियां बढ़ाते हैं लेकिन अब लगातार दबाव के कारण उनकी संख्या घट रही है। उनकी हर मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय सीमा से घुसपैठ के बाद आतंकी बसोहली से छत्रगलां और आगे पहाड़ी बेल्ट की ओर बढ़ते हैं। पहले वे लंबे समय तक सुरक्षित ठिकानों में छिपे रहते थे। सर्दियों में बर्फबारी के बाद नीचे आकर गतिविधियां बढ़ाते हैं लेकिन अब लगातार दबाव के कारण उनकी संख्या घट रही है। उनकी हर मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है।
कठुआ में आतंकी ठिकाना नष्ट करना उसके बाद मुठभेड़ में आतंकियों को मार गिराना बड़ी सफलता है कठुआ में अभी यस आतंकी को मारना बता रहा है की सुरक्षा एजेंसियों को आतंकी के मूवमेंट पर नजर है जवाब दे ही बढ़ने से एजेंसी अब समन्वय के साथ ऑपरेशन को अंजाम दे रही है।
क्या अब एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर है?
अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस पर राजनीतिक दबाव कम हुआ है। उन्हें बेहतर हथियार व उपकरण मिले हैं। एजेंसियों को खुलकर काम करने का माहौल मिला है। इनपुट साझा करने की संस्कृति विकसित हुई और ऑपरेशंस ठोस खुफिया जानकारी और संयुक्त योजना के आधार पर होने लगे हैं।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस पर राजनीतिक दबाव कम हुआ है। उन्हें बेहतर हथियार व उपकरण मिले हैं। एजेंसियों को खुलकर काम करने का माहौल मिला है। इनपुट साझा करने की संस्कृति विकसित हुई और ऑपरेशंस ठोस खुफिया जानकारी और संयुक्त योजना के आधार पर होने लगे हैं।
इसी का परिणाम है कि सफलता दर 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंची। आम लोगों का भी सहयोग मिल रहा है। पुलवामा हमले से पहले आतंक पर कार्रवाई होती थी लेकिन एजेंसियों के बीच तालमेल और जवाबदेही उतनी मजबूत नहीं थी। पुलवामा व पहलगाम से साफ संदेश गया कि रणनीति में मूलभूत बदलाव जरूरी है।
पुलवामा के बाद क्या नई पहल हुई?
एजेंसियों में टीम वर्क बढ़ा है। पुलिस को बेहतर काउंटर इंसजेंसी प्रशिक्षण दिया गया है। सेना और अन्य एजेंसियों के साथ तालमेल मजबूत हुआ है। जम्मू-कश्मीर पुलिस भी अब दबाब मुक्त होकर काम कर रही है। पुलिस के पूर्व डीजीपी आरआर स्वाई ने अपने कार्यकाल में भद्रवाह में सेना के कोर बैटल स्कूल में पुलिस के एसआई और डीएसपी को आतंकवाद विरोधी गोरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया था। यह सेना और पुलिस के बीच बढ़ते समन्वय को दिखाता है।
एजेंसियों में टीम वर्क बढ़ा है। पुलिस को बेहतर काउंटर इंसजेंसी प्रशिक्षण दिया गया है। सेना और अन्य एजेंसियों के साथ तालमेल मजबूत हुआ है। जम्मू-कश्मीर पुलिस भी अब दबाब मुक्त होकर काम कर रही है। पुलिस के पूर्व डीजीपी आरआर स्वाई ने अपने कार्यकाल में भद्रवाह में सेना के कोर बैटल स्कूल में पुलिस के एसआई और डीएसपी को आतंकवाद विरोधी गोरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया था। यह सेना और पुलिस के बीच बढ़ते समन्वय को दिखाता है।
घुसपैठ के बाद आतंकी किन रूट का इस्तेमाल कर रहे हैं
कठुआ से किश्तवाड़ के बीच नदियां, घने जंगल, सियोजधार बेल्ट, बसोहली, छत्रगलां, गंदोह, काटरी, सिंथन टॉप और त्राल जैसे इलाके लंबे समय से घुसपैठ के रूट रहे हैं। गलवान से पहले तक इन रूटों पर सेना की तैनाती थी। इलाके में शांति मानकर सेना की यूनिट हटा दी गई। इस बीच आतंकियों ने इस क्षेत्र में फिर नेटवर्क सक्रिय किया। घुसपैठ के बाद पैसे का लालच देकर डराकर या धर्म के नाम पर स्थानीय लोगों को बरगलाया गया। कठुआ में आतंकी ठिकाने से रोजमर्रा का सामान मिलना बताता है कि आतंकियों का स्थानीय संपर्क कितना मजबूत है
कठुआ से किश्तवाड़ के बीच नदियां, घने जंगल, सियोजधार बेल्ट, बसोहली, छत्रगलां, गंदोह, काटरी, सिंथन टॉप और त्राल जैसे इलाके लंबे समय से घुसपैठ के रूट रहे हैं। गलवान से पहले तक इन रूटों पर सेना की तैनाती थी। इलाके में शांति मानकर सेना की यूनिट हटा दी गई। इस बीच आतंकियों ने इस क्षेत्र में फिर नेटवर्क सक्रिय किया। घुसपैठ के बाद पैसे का लालच देकर डराकर या धर्म के नाम पर स्थानीय लोगों को बरगलाया गया। कठुआ में आतंकी ठिकाने से रोजमर्रा का सामान मिलना बताता है कि आतंकियों का स्थानीय संपर्क कितना मजबूत है