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Jammu News: सांबा में महिलाओं की सेहत संकट में, हर दूसरी महिला एनीमिया से जूझ रही
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सांबा। जिले में महिलाओं की सेहत को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में महिलाएं और किशोरियां एनीमिया (खून की कमी) से जूझ रही हैं। आंकड़ों के अनुसार करीब 55 प्रतिशत महिलाएं इस समस्या से प्रभावित हैं। सामाजिक झिझक और जागरूकता की कमी के कारण यह मुद्दा अब भी ‘चुप्पी’ के दायरे में सिमटा हुआ है।
जिले के नड, सुंब, राजपुरा, रामगढ़ और सीमावर्ती इलाकों के कई गांवों में स्थिति अधिक चिंताजनक बनी हुई है। इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित होने और जागरूकता की कमी के चलते महिलाएं समय पर जांच और उपचार नहीं करवा पा रही हैं।
15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में खून की कमी के मामले सबसे अधिक सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पोषण की कमी, अनियमित खानपान और समय पर जांच न कराना इस समस्या की प्रमुख वजह है। गर्भवती महिलाओं के मामले में यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से उप स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में जांच और उपचार की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। गर्भवती महिलाओं को आयरन-फोलिक एसिड (आईएफए) की गोलियां, टीकाकरण और नियमित जांच की सुविधा दी जा रही है। इसके साथ ही किशोरियों के लिए साप्ताहिक आयरन फोलिक कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है।
पोषण अभियान और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत महिलाओं को जागरूक करने और आर्थिक सहायता देने के प्रयास किए जा रहे हैं। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन प्रयासों का असर सीमित नजर आ रहा है।
वहीं ग्रामीण इलाकों में मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी बड़ी संख्या में किशोरियां सैनिटरी नैपकिन का नियमित उपयोग नहीं कर पातीं। पारंपरिक साधनों का उपयोग संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा रहा है।
नाम न छापने की शर्त पर एक किशोरी ने कहा कि स्कूल में जानकारी मिलती है, लेकिन घर पर इस विषय पर बात नहीं होती। कई बार नैपकिन उपलब्ध नहीं होते, जिससे परेशानी बढ़ जाती है।
एक अन्य ग्रामीण महिला राजकुमारी ने बताया कि घर और खेत के काम में अपनी सेहत का ध्यान नहीं रख पाते। कमजोरी रहती है, लेकिन डॉक्टर के पास जाना आसान नहीं होता। जब कमजोरी ज्यादा होती है तो दवा ले लेते हैं।
एक गर्भवती महिला भारती देवी ने कहा कि दवाइयां मिलती हैं, लेकिन हर बार अस्पताल जाना संभव नहीं होता। अब समझ आ रहा है कि सेहत का ध्यान जरूरी है। डॉक्टर ने कहा है कि दवा और खानपान का ध्यान रखना जरूरी है। अब नियमित जांच कराने की कोशिश कर रही हैं, ताकि कोई दिक्कत न हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की सेहत में सुधार के लिए केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव और जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। जब तक महिलाएं अपनी स्वास्थ्य समस्याओं पर खुलकर बात नहीं करेंगी, तब तक यह संकट यूं ही बना रहेगा।
कोट
क्षेत्र में लगातार जनरल हेल्थ कैंप, वीएचएनडी (विलेज हेल्थ एंड न्यूट्रिशन डे) तथा एनसीडी शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जो प्रत्येक सप्ताह लगाए जाते हैं। इन शिविरों में महिलाओं की हीमोग्लोबिन (एचबी) की नियमित जांच की जाती है। जिन महिलाओं में एनीमिया पाया जाता है, उन्हें आवश्यक दवाइयां और उचित परामर्श प्रदान दिया जाता है।
-डॉ. रिचा अरोड़ा, बीएमओ नड
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जिले के नड, सुंब, राजपुरा, रामगढ़ और सीमावर्ती इलाकों के कई गांवों में स्थिति अधिक चिंताजनक बनी हुई है। इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित होने और जागरूकता की कमी के चलते महिलाएं समय पर जांच और उपचार नहीं करवा पा रही हैं।
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15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में खून की कमी के मामले सबसे अधिक सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पोषण की कमी, अनियमित खानपान और समय पर जांच न कराना इस समस्या की प्रमुख वजह है। गर्भवती महिलाओं के मामले में यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से उप स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में जांच और उपचार की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। गर्भवती महिलाओं को आयरन-फोलिक एसिड (आईएफए) की गोलियां, टीकाकरण और नियमित जांच की सुविधा दी जा रही है। इसके साथ ही किशोरियों के लिए साप्ताहिक आयरन फोलिक कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है।
पोषण अभियान और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत महिलाओं को जागरूक करने और आर्थिक सहायता देने के प्रयास किए जा रहे हैं। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन प्रयासों का असर सीमित नजर आ रहा है।
वहीं ग्रामीण इलाकों में मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी बड़ी संख्या में किशोरियां सैनिटरी नैपकिन का नियमित उपयोग नहीं कर पातीं। पारंपरिक साधनों का उपयोग संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा रहा है।
नाम न छापने की शर्त पर एक किशोरी ने कहा कि स्कूल में जानकारी मिलती है, लेकिन घर पर इस विषय पर बात नहीं होती। कई बार नैपकिन उपलब्ध नहीं होते, जिससे परेशानी बढ़ जाती है।
एक अन्य ग्रामीण महिला राजकुमारी ने बताया कि घर और खेत के काम में अपनी सेहत का ध्यान नहीं रख पाते। कमजोरी रहती है, लेकिन डॉक्टर के पास जाना आसान नहीं होता। जब कमजोरी ज्यादा होती है तो दवा ले लेते हैं।
एक गर्भवती महिला भारती देवी ने कहा कि दवाइयां मिलती हैं, लेकिन हर बार अस्पताल जाना संभव नहीं होता। अब समझ आ रहा है कि सेहत का ध्यान जरूरी है। डॉक्टर ने कहा है कि दवा और खानपान का ध्यान रखना जरूरी है। अब नियमित जांच कराने की कोशिश कर रही हैं, ताकि कोई दिक्कत न हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की सेहत में सुधार के लिए केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव और जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। जब तक महिलाएं अपनी स्वास्थ्य समस्याओं पर खुलकर बात नहीं करेंगी, तब तक यह संकट यूं ही बना रहेगा।
कोट
क्षेत्र में लगातार जनरल हेल्थ कैंप, वीएचएनडी (विलेज हेल्थ एंड न्यूट्रिशन डे) तथा एनसीडी शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जो प्रत्येक सप्ताह लगाए जाते हैं। इन शिविरों में महिलाओं की हीमोग्लोबिन (एचबी) की नियमित जांच की जाती है। जिन महिलाओं में एनीमिया पाया जाता है, उन्हें आवश्यक दवाइयां और उचित परामर्श प्रदान दिया जाता है।
-डॉ. रिचा अरोड़ा, बीएमओ नड