{"_id":"6a6eac99b620bcf305060ce4","slug":"kulgam-targeted-killings-migrant-workers-are-unsung-partners-of-jammu-and-kashmir-economy-2026-08-02","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"कुलगाम टारगेट किलिंग: जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था के अनदेखे साथी हैं प्रवासी मजदूर, ये काम होंगे प्रभावित!","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कुलगाम टारगेट किलिंग: जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था के अनदेखे साथी हैं प्रवासी मजदूर, ये काम होंगे प्रभावित!
Sun, 02 Aug 2026 08:42 AM IST
Sharukh Khan
गौरव रावत, अमर उजाला, जम्मू
गौरव रावत, अमर उजाला, जम्मू
Published by: Sharukh Khan
Updated Sun, 02 Aug 2026 08:42 AM IST
सार
प्रवासी मजदूर जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था के अनदेखे साथी हैं। दूसरे राज्यों के श्रमिक सड़क, भवन, सेब बागान और उद्योगों की रीढ़ बने हैं। विशेषज्ञों की राय है कि असुरक्षा बढ़ी तो सबसे पहले निर्माण, उद्योग और बागवानी की रफ्तार प्रभावित होगी।
विज्ञापन
Kulgam Targeted Killing
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जम्मू-कश्मीर में सड़क, सुरंग, रेलवे, उद्योग और सेब बागवान जैसे कई बड़े क्षेत्रों की रफ्तार दूसरे राज्यों से आने वाले प्रवासी मजदूरों के श्रम पर टिकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बाहरी श्रमिकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी और उनका यहां आना कम हुआ तो इसका असर केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगा। निर्माण कार्यों की गति धीमी पड़ सकती है, उद्योगों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है और बागवानी समेत कई कारोबारों पर दबाव बढ़ सकता है।
जम्मू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रो. फालेन्द्र सूदन कहते हैं क प्रदेश में पांच से आठ लाख मजदूर प्रवासी ही हैं। हर साल बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में श्रमिक रोजगार के लिए पहुंचते हैं। जम्मू में भवन निर्माण, औद्योगिक इकाइयों, राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे परियोजनाओं, गोदामों और माल ढुलाई में इनकी सबसे ज्यादा जरूरत रहती है।
विज्ञापन
जम्मू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रो. फालेन्द्र सूदन कहते हैं क प्रदेश में पांच से आठ लाख मजदूर प्रवासी ही हैं। हर साल बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में श्रमिक रोजगार के लिए पहुंचते हैं। जम्मू में भवन निर्माण, औद्योगिक इकाइयों, राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे परियोजनाओं, गोदामों और माल ढुलाई में इनकी सबसे ज्यादा जरूरत रहती है।
विज्ञापन
दूसरी ओर कश्मीर में सेब बागानों, धान की खेती, होटल-रेस्तरां, निर्माण कार्य, ईंट-भट्ठों और ढुलाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं श्रमिकों के सहारे चलता है। अगस्त से अक्तूबर के बीच सेब की तुड़ाई, ग्रेडिंग और पैकिंग के मौसम में इनकी मांग सबसे अधिक रहती है। स्थानीय श्रमिकों की उपलब्धता सीमित है, इसलिए इन कामों में वर्षों से दक्ष बाहरी श्रमिकों की कमी तुरंत महसूस होती है।
पहले जब भी मजदूर लौटे तो उत्पादन भी थमा
गंग्याल इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के अध्यक्ष वीरेंद्र जैन ने बताया कि पिछले वर्ष ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों को लौट गए थे। इसका असर जम्मू के औद्योगिक क्षेत्रों में साफ दिखाई दिया। कई इकाइयों का उत्पादन प्रभावित हुआ और समय पर ऑर्डर पूरे करना मुश्किल हो गया। आज भी अनेक उद्योग बाहरी श्रमिकों पर निर्भर हैं। श्रमिकों की कमी होने पर केवल उत्पादन ही नहीं, तैयार माल की समय पर आपूर्ति भी प्रभावित होती है। कोरोना के समय में यही दिक्कत हुई थी।
गंग्याल इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के अध्यक्ष वीरेंद्र जैन ने बताया कि पिछले वर्ष ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों को लौट गए थे। इसका असर जम्मू के औद्योगिक क्षेत्रों में साफ दिखाई दिया। कई इकाइयों का उत्पादन प्रभावित हुआ और समय पर ऑर्डर पूरे करना मुश्किल हो गया। आज भी अनेक उद्योग बाहरी श्रमिकों पर निर्भर हैं। श्रमिकों की कमी होने पर केवल उत्पादन ही नहीं, तैयार माल की समय पर आपूर्ति भी प्रभावित होती है। कोरोना के समय में यही दिक्कत हुई थी।
हर राज्य के श्रमिकों की अलग पहचान
समय के साथ अलग-अलग राज्यों से आने वाले श्रमिकों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र बना लिए हैं। जम्मू में ओडिशा के श्रमिक भवन निर्माण और सब्जी कारोबार, बिहार के मजदूर निर्माण, होटल और ढुलाई, जबकि उत्तर प्रदेश के लोग माली, पेंटिंग और बढ़ईगिरी जैसे कामों में बड़ी संख्या में जुड़े हैं। कश्मीर में बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के श्रमिक सेब बागानों, खेती, ईंट-भट्ठों और निर्माण कार्य की मजबूत कड़ी बन चुके हैं। बेहतर मजदूरी और नियमित काम मिलने के कारण इनमें से कई श्रमिक हर साल सीजन शुरू होते ही वापस लौट आते हैं।
समय के साथ अलग-अलग राज्यों से आने वाले श्रमिकों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र बना लिए हैं। जम्मू में ओडिशा के श्रमिक भवन निर्माण और सब्जी कारोबार, बिहार के मजदूर निर्माण, होटल और ढुलाई, जबकि उत्तर प्रदेश के लोग माली, पेंटिंग और बढ़ईगिरी जैसे कामों में बड़ी संख्या में जुड़े हैं। कश्मीर में बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के श्रमिक सेब बागानों, खेती, ईंट-भट्ठों और निर्माण कार्य की मजबूत कड़ी बन चुके हैं। बेहतर मजदूरी और नियमित काम मिलने के कारण इनमें से कई श्रमिक हर साल सीजन शुरू होते ही वापस लौट आते हैं।
सुरक्षा का भरोसा बना रहेगा तो नहीं थमेगी रफ्तार
जम्मू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की प्रो. विश्व रक्षा का कहना है कि प्रवासी श्रमिक अब केवल अस्थायी कामगार नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की श्रम व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। निर्माण, उद्योग, बागवानी और सेवा क्षेत्र के अनेक काम उनकी उपलब्धता पर निर्भर करते हैं।
जम्मू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की प्रो. विश्व रक्षा का कहना है कि प्रवासी श्रमिक अब केवल अस्थायी कामगार नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की श्रम व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। निर्माण, उद्योग, बागवानी और सेवा क्षेत्र के अनेक काम उनकी उपलब्धता पर निर्भर करते हैं।
उनके मन में असुरक्षा की भावना बढ़ी तो सबसे पहले श्रम बाजार प्रभावित होगा और इसका असर धीरे-धीरे उत्पादन, कारोबार तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा। उसुरक्षित और भरोसेमंद माहौल केवल पर्यटन के लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों को निरंतर बनाए रखने के लिए भी जरूरी है।
लश्कर आतंकी लतीफ ने की थी कुलगाम में श्रमिकों की हत्या, आशिक को भी इसी ने मारा
कुलगाम जिले के केलम में शुक्रवार शाम छत्तीसगढ़ के दो श्रमिकों की हत्या लश्कर-ए-ताइबा के स्थानीय आतंकी कमांडर मोहम्मद लतीफ भट ने की है। लतीफ ने ही गत 22 जुलाई को अनंतनाग के लाल चौक पर अमरनाथ यात्रा में तैनात पुलिस के हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन को गोली मारी थी। उसने अकेले ही दोनों वारदातों को अंजाम दिया और भाग निकला। सुरक्षाबलों ने इस आतंकी को ढेर करने के लिए पूरे दक्षिण कश्मीर में व्यापक तलाशी अभियान छेड़ दिया है।
कुलगाम जिले के केलम में शुक्रवार शाम छत्तीसगढ़ के दो श्रमिकों की हत्या लश्कर-ए-ताइबा के स्थानीय आतंकी कमांडर मोहम्मद लतीफ भट ने की है। लतीफ ने ही गत 22 जुलाई को अनंतनाग के लाल चौक पर अमरनाथ यात्रा में तैनात पुलिस के हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन को गोली मारी थी। उसने अकेले ही दोनों वारदातों को अंजाम दिया और भाग निकला। सुरक्षाबलों ने इस आतंकी को ढेर करने के लिए पूरे दक्षिण कश्मीर में व्यापक तलाशी अभियान छेड़ दिया है।
केलम में आतंकियों ने ईंट भट्ठे पर काम करने वाले दो श्रमिकों 28 वर्षीय भूपेंद्र भैना और 24 वर्षीय दीपक रात्रे पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दी थीं। हमले में दीपक की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि भूपेंद्र ने शनिवार सुबह स्किम्स श्रीनगर में दम तोड़ दिया। दोनों श्रमिकों का अंतिम संस्कार केलम के पालपोरा में स्वजन, पुलिस अधिकारियों व प्रशासन की मौजूदगी में किया गया।
आतंकी वारदात से आहत एलजी मनोज सिन्हा ने शनिवार को उच्च स्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक बुलाई। इसमें उन्होंने आतंकियों के सफाये के लिए अधिकारियों को सटीक एवं प्रभावी आतंकरोधी अभियान तेजी से चलाने के निर्देश दिए। वारदात को अंजाम देने वाले आतंकियों को दबोचने व मार गिराने के लिए सुरक्षाबलों ने शुक्रवार रात से व्यापक तलाशी अभियान चला रखा है।
एके-47 से अकेले ही टारगेट किलिंग को अंजाम दिया
सूत्रों ने बताया कि लश्कर आतंकी लतीफ ने अकेले ही श्रमिकों की टारगेट किलिंग को अंजाम दिया और एके-47 का इस्तेमाल किया। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। 21 वर्षीय मोहम्मद लतीफ कुलगाम जिले के ही नई बस्ती (खेवन चद्दर) का रहने वाला है। वह पिछले साल 19 नवंबर को घर से लापता हो गया था। परिवार ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। सूत्रों के अनुसार, लापता होने के बाद उसने लश्कर में ऑपरेशन कमांडर की जिम्मेदारी संभाल ली। शनिवार को उसके घर की तलाशी ली गई। परिवार के सदस्यों व गांव के कई युवाओं से पूछताछ की गई है।
सूत्रों ने बताया कि लश्कर आतंकी लतीफ ने अकेले ही श्रमिकों की टारगेट किलिंग को अंजाम दिया और एके-47 का इस्तेमाल किया। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। 21 वर्षीय मोहम्मद लतीफ कुलगाम जिले के ही नई बस्ती (खेवन चद्दर) का रहने वाला है। वह पिछले साल 19 नवंबर को घर से लापता हो गया था। परिवार ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। सूत्रों के अनुसार, लापता होने के बाद उसने लश्कर में ऑपरेशन कमांडर की जिम्मेदारी संभाल ली। शनिवार को उसके घर की तलाशी ली गई। परिवार के सदस्यों व गांव के कई युवाओं से पूछताछ की गई है।
सुरक्षा बेहद कड़ी
अभियान में एसओजी, सेना के विशेष दस्ते और खोजी कुत्ते लगाए गए हैं। आने-जाने वाले संदिग्ध वाहनों और लोगों की गहन जांच-पड़ताल की जा रही है। हमले के बाद न केवल कुलगाम, बल्कि श्रीनगर समेत पूरे कश्मीर और राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षा बेहद कड़ी कर दी गई है। श्रीनगर के प्रवेश और निकास द्वारों, प्रमुख चौराहों और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त नाके लगाए गए हैं। निगरानी बढ़ा दी गई है।
अभियान में एसओजी, सेना के विशेष दस्ते और खोजी कुत्ते लगाए गए हैं। आने-जाने वाले संदिग्ध वाहनों और लोगों की गहन जांच-पड़ताल की जा रही है। हमले के बाद न केवल कुलगाम, बल्कि श्रीनगर समेत पूरे कश्मीर और राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षा बेहद कड़ी कर दी गई है। श्रीनगर के प्रवेश और निकास द्वारों, प्रमुख चौराहों और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त नाके लगाए गए हैं। निगरानी बढ़ा दी गई है।
पूछताछ के लिए कार्ड ओजीडब्ल्यू हिरासत में
सूत्रों ने बताया, सुरक्षाबलों ने कई संदिग्ध ओजीडब्ल्यू को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। डीजीपी नलिन प्रभात और पुलिस तथा अन्य सुरक्षाबलों के वरिष्ठ अधिकारियों ने घटनास्थल का दौरा किया और सुरक्षा स्थिति का जायजा लिया है। पिछले 10 दिनों में यह दूसरा बड़ा आतंकी हमला है। 22 जुलाई को हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन को गोली मार दी थी।
सूत्रों ने बताया, सुरक्षाबलों ने कई संदिग्ध ओजीडब्ल्यू को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। डीजीपी नलिन प्रभात और पुलिस तथा अन्य सुरक्षाबलों के वरिष्ठ अधिकारियों ने घटनास्थल का दौरा किया और सुरक्षा स्थिति का जायजा लिया है। पिछले 10 दिनों में यह दूसरा बड़ा आतंकी हमला है। 22 जुलाई को हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन को गोली मार दी थी।
मृतकों के परिवार को 36-36 लाख रुपये की मदद
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दोनों मृतकों के परिवारों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का एलान किया है। छत्तीसगढ़ सरकार 20-20 लाख रुपये सहायता देगी। इसके अलावा कुलगाम जिला प्रशासन की ओर छह लाख रुपये की तत्काल राहत राशि भी दी गई है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दोनों मृतकों के परिवारों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का एलान किया है। छत्तीसगढ़ सरकार 20-20 लाख रुपये सहायता देगी। इसके अलावा कुलगाम जिला प्रशासन की ओर छह लाख रुपये की तत्काल राहत राशि भी दी गई है।