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घने जंगल, पथरीले रास्ते और बंदूकों की गड़गड़ाहट: सबसे आगे था जांबाज टायसन, दुश्मन की चाल पढ़कर दी सटीक जानकारी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: विकास कुमार Updated Sun, 22 Feb 2026 10:06 PM IST
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सार

गोली लगने के बाद टायसन को तत्काल रेस्क्यू कर एयरलिफ्ट किया गया और उधमपुर स्थित सेना के कमांड अस्पताल में भर्ती कराया गया है। सेना के अधिकारियों के मुताबिक उसकी हालत स्थिर है और बेहतर इलाज जारी है।

 

Tyson hero of Operation Trashi Gave army terrorist exact location
भारतीय सेना का कुत्ता टायसन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

 जम्मू-कश्मीर में किश्तवाड़ जिले के छात्रू में सुरक्षाबलों को रविवार को बड़ी कामयाबी मिली। घने जंगल में हुई भीषण मुठभेड़ में जैश-ए-मोहम्मद का टॉप पाकिस्तानी कमांडर समेत तीन आतंकवादी मार गिराए गए। सुरक्षाबलों ने इनके ठिकाने (ढोक) पर रॉकेट दागकर आतंकियों का समूल नाश कर दिया। धमाके में एक आतंकी की खोपड़ी पूरी तरह उड़ गई है। तीनों आतंकियों के शव पूरी तरह जल चुके हैं और इन्हें बरामद कर लिया गया है। इनमें से एक 10 लाख का इनामी आतंकी कमांडर सैफुल्लाह के होने का संदेह है। मुठभेड़ स्थल से दो एके-47 राइफलें और भारी मात्रा में युद्धक सामग्री बरामद हुई है। इस ऑपरेशन के सफल होने के पीछे भारतीय सेना के कुत्ते टायसन का बड़ा हाथ रहा। अगर टायसन आतंकियों की सटीक लोकेशन न बताता तो यह ऑपरेशन अभी और लंबा चलता। 

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मुठभेड़ में दिखाया अदम्य साहस
मुठभेड़ की सफलता में टायसन का बड़ा अहम योगदान रहा। सेना की दो-पैरा के9 यूनिट के जांबाज आर्मी डॉग टायसन ने मुठभेड़ में अदम्य साहस दिखाया। जब ढोक में आतंकियों के छिपे होने का शक हुआ तो इनकी सटीक लोकेशन व मौजूदगी पक्की करने के लिए टायसन को आगे भेजा गया। टायसन ने निडर होकर आतंकियों के ठिकाने के करीब जाकर उनकी मौजूदगी पक्की की। घबराए आतंकियों ने फायरिंग शुरू कर दी। आतंकियों की पहली गोली टायसन के पैर में जा लगी फिर भी वह नहीं डिगा। घायल टायसन को रेस्क्यू कर एयरलिफ्ट कर उधमपुर स्थित सेना के कमांड अस्पताल ले जाया गया है।

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36 दिनों तक संयम व साहस के बल पर जवानों को मिली निर्णायक जीत
36 दिन...घने जंगल और पथरीले रास्ते...समुद्र तल से पांच हजार फीट की ऊंचाई पर किश्तवाड़ के छात्रू की बर्फीली चोटियों पर सुरक्षाबल के जांबाज दृढ़ संकल्प के साथ देश के दुश्मनों का लगातार पीछा करते रहे। एक माह से चल रहे इस ऑपरेशन के बावजूद जवानों के हौसले बुलंद थे। रविवार को पासरकोट-वानीपुरा के दुर्गम पहाड़ों में मुठभेड़ के बाद जब बंदूकों की गड़गड़ाहट व धमाकों की आवाज शांत हुई तो जवानों के चेहरे पर थकान नहीं बल्कि बड़ी उपलब्धि का संतोष था।

सैफुल्लाह का खात्मा बड़ी सफलता
किश्तवाड़ के छात्रू इलाके में छिपे आतंकियों को मार गिराने के लिए सेना, पुलिस, सीआरपीएफ के जवान 18 जनवरी से लगातार तलाशी अभियान चला रहे हैं। इसे ऑपरेशन त्राशी-1 नाम दिया गया है। 22 फरवरी को ऑपरेशन त्राशी का ये निर्णायक प्रहार रहा जिसने पिछले 36 दिनों से जारी आतंकियों की लुका-छिपी के खेल को खत्म कर दिया। तीन पाकिस्तानी आतंकी मार गिराए। इनमें से एक अगर जैश-ए-मोहम्मद का कमांडर सैफुल्ला है तो सुरक्षाबलों की ये सफलता इस क्षेत्र में जैश के नेटवर्क की कमर तोड़ने में अहम भूमिका निभाएगी।

भूलभुलैया से कम नहीं  70 किलोमीटर का यह पहाड़ी क्षेत्र
छात्रू उपमंडल का क्षेत्र भंडारकोट से शुरू होकर सिंथन टॉप तक फैला करीब 70 किलोमीटर का यह पहाड़ी क्षेत्र किसी भूलभुलैया से कम नहीं है। ये किश्तवाड़ जिला मुख्यालय से करीब 85 किलोमीटर दूर है। इस इलाके में ऑक्सीजन कम है और चुनौतियां अपार। ऊंचे पहाड़, घने जंगल, भारी बर्फबारी और सर्द मौसम इस इलाके को सुरक्षा अभियानों के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।

36 घंटे गुफाओं में रहे जवान
यहां के जंगल इतने घने हैं कि दिन के उजाले में भी सर्च ऑपरेशन चलाना जोखिम भरा हो जाता है। शून्य से नीचे के तापमान और तीन फीट से अधिक जमी बर्फ के बीच जवानों ने 36 दिनों तक पत्थरों और गुफाओं में भी रातें बिताईं लेकिन आतंकियों को मार गिराने के लिए पीछा करना नहीं छोड़ा।

90 के दशक में आतंक के जख्म नहीं भूलते यहां लोग
वर्ष 1990 से 2010 तक छात्रू का ये इलाका आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित रहा। वर्ष 2004 से 2010 के बीच यहां लगभग 30 स्थानीय आतंकवादी सक्रिय बताए जाते थे। समय बदला तो स्थानीय भर्ती गई तो हताश पाकिस्तान ने अपनी चाल बदली। इस नए षड्यंत्र के तहत किश्तवाड़ में स्थानीय लोगों के बजाय प्रशिक्षित पाकिस्तानी आतंकियों को भेजा जाने लगा। इन्हें इस इलाके में हिंसा फैलाने और सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के मकसद से भेजा गया।

ओजीडब्ल्यू नेटवर्क के सहारे रहे अब तक जिंदा
पिछले ढाई से तीन वर्षों में इन आतंकियों ने छात्रू क्षेत्र के जंगलों और ऊंचाई वाले इलाकों में अस्थायी ठिकाने बना लिए थे। सूत्र बताते हैं कि कुछ ओवर ग्राउंड वर्कर्स की मदद से उन्हें जंगलों में राशन और अन्य सामग्री पहुंचाई जाती रही जिससे वे लंबे समय तक सक्रिय बने रहे। सुरक्षा एजेंसियों ने इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए जनवरी से व्यापक सर्च ऑपरेशन शुरू किया था। इसके तहत सुरक्षाबलों ने पहले इनकी सप्लाई लाइन को काटा और फिर उन्हें अपने ठिकानों से बाहर निकलने पर मजबूर किया। जब आतंकी बिल से बाहर निकलने लगे तो इन्हें ट्रैक करना आसान हो गया। इससे पहले दच्छन इलाके में हुई मुठभेड़ में आतंकी आदिल को मार गिराया गया था जबकि अन्य की तलाश जारी रही और अब जैश कमांडर समेत तीन आतंकी मार गिराए गए।

जब तक छात्रू आतंकमुक्त नहीं...जारी रहेगा ऑपरेशन
एक सुरक्षा अधिकारी ने कहा कि ये सफलता छात्रू क्षेत्र को आतंकमुक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। फिलहाल घेराबंदी और तलाशी अभियान जारी है ताकि किसी भी बचे हुए आतंकी को पकड़ने या मार गिराने की कार्रवाई पूरी की जा सके। अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक पूरे क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित और आतंकमुक्त घोषित नहीं कर दिया जाता। छात्रू इलाके में लंबे समय तक आतंकियों का प्रभाव रहा है। एक समय शेरखान आतंकी यहां सक्रिय था। उसने बाद में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की। दो वर्ष पहले उसने तिरंगा फहराकर सामान्य जीवन अपनाने का संदेश भी दिया।

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