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Kashmir vs Jammu: सियासतदां कुछ भी कहें... हक के लिए जम्मू को हमेशा लड़ना पड़ा, एनएलयू को लेकर भड़की सियासत

प्रवेश कुमारी अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: निकिता गुप्ता Updated Wed, 14 Jan 2026 12:08 PM IST
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सार

जम्मू में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू) को लेकर सियासत तेज है, जहां लोग कश्मीर में स्थापित संस्थानों के साथ तुलना कर भेदभाव पर सवाल उठा रहे हैं। इतिहास बताता है कि जम्मू को अपने हक के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ा, जबकि कश्मीर में संस्थान आसानी से स्थापित किए गए।

 

Whatever politicians say Jammu has always had to fight for its rights.
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला - फोटो : ANI
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विस्तार
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केंद्र शासित प्रदेश में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू) को लेकर सियासत जारी है। जम्मू में हो रहे विरोध को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अनुचित बताया तो भाजपा विधायक शाम लाल ने इस पर तत्काल पलटवार किया। इस बीच सोशल मीडिया पर लोगों ने कश्मीर संभाग में खुले संस्थानों की सूचियां जारी कर सवाल पूछना शुरू कर दिया है।

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पड़ताल में पता चला है कि जम्मू को अपने हक के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ा है। कश्मीर केंद्रित दल जब सत्ता में रहे तो उन्होंने कश्मीर को तवज्जो दिया। वहीं, जिन संस्थानों के लिए जम्मू को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी, वही कश्मीर में आसानी से स्थापित कर दिए गए थे।

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राज्य सरकारों के भेदभाव के बीच केंद्र ने की संतुलन की कोशिश
प्रदेश में जम्मू के साथ राज्य सरकारों के भेदभाव के बीच केंद्र ने संतुलन की कोशिश की। कश्मीर में पहले से ही राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों की मौजूदगी के बीच आईआईटी और आईआईएम की स्थापना जम्मू में की गई। अभी तक केवल कश्मीर की सोचने वाली सरकारों में पहले भी मुखिया रहे वर्तमान उमर अब्दुल्ला ने इन दोनों संस्थानों के जम्मू में स्थापित किए जाने पर सवाल उठाए हैं।

हकीकत ये है कि ये दोनों संस्थान राज्यपाल शासन में मिले हैं। जिस वक्त इनके एमओयू को लेकर तैयारी शुरू हुई तब यहां एनएन वोहरा गवर्नर थे। सात जनवरी 2016 को मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद सीएम का पद खाली था। इसी दाैरान राज्यपाल शासन था और तभी आईआईटी और आईआईएम जम्मू में खोलने की भूमिका बनी। चार अप्रैल 2016 को मुख्यमंत्री के रूप में महबूबा मुफ्ती ने काम संभाला और करीब तीन हफ्ते बाद एक मई 2016 को एमओयू हो गया। इसके बाद छह अगस्त 2016 को इसका विधिवत शुभारंभ हुआ।

पर रवैया नहीं बदला : ये संघर्ष का ही नतीजा है कि सरकार को जम्मू और कश्मीर दोनों को एक आंख से देखने पर मजबूर होना पड़ा। वर्ष 2005 में कश्मीर में इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलाॅजी की स्थापना हुई तो जम्मू के राजोरी में बाबा गुलाम बडशाह यूनिवर्सिटी बनी। दूसरे राज्यों में केंद्रीय विवि खुले तो जम्मू ने भी मांगा। इस पर वर्ष 2009 में केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू खुला तो कश्मीर में भी ये मिला। 2016 में क्लस्टर विवि जम्मू बना तो साथ-ही-साथ क्लस्टर विवि कश्मीर भी लेकिन इस बीच जब-जब मौका मिला कश्मीर केंद्रित सरकारों ने अपना भेदभावपूर्ण रवैया दिखाने में कसर नहीं छोड़ी।

जम्मू विवि के लिए 21 साल इंतजार, चार शहीद भी हुए
कश्मीर विश्वविद्यालय की स्थापना 1948 में हुई। उस वक्त वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला रियासत के प्रधानमंत्री (यह पद 1965 में समाप्त कर दिया गया) थे। जम्मू के लोगों को एक अदद विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए करीब 21 साल इंतजार करना पड़ा।

1966 में जम्मू में विश्वविद्यालय की मांग को लेकर भीम सिंह की अगुवाई में छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ। पुराने छात्र नेता डॉ. सुरेश अजय मगोत्रा बताते हैं कि फायरिंग के दौरान सिटी चौक पर चार छात्रों बृजमोहन शर्मा, सुभाष चंद्र, गुलशन हांडा और गुरचरन सिंह को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। आखिरकार गुलाम मोहम्मद सादिक के नेतृत्व वाली सरकार झुकी और तब जम्मू के लोगों को जम्मू विश्वविद्यालय मिला। मारे गए चार छात्रों की याद में आज भी शहीदी दिवस मनाया जाता है।

कश्मीर के 17 साल बाद जम्मू को कृषि विश्वविद्यालय मिला
कश्मीर में कृषि विज्ञान, तकनीक एवं अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1982 में शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं तकनीकी विश्वविद्यालय यानी स्कॉस्ट की स्थापना हुई। उस वक्त प्रदेश में नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला की सरकार थी।

उस वक्त इससे कश्मीरी छात्रों को कृषि से जुड़े नए कोर्स करने, तकनीक सीखने और नौकरी करने के अवसर मुहैया हुए लेकिन जम्मू के छात्रों के साथ भेदभाव हुआ। उन्हें इसके लिए भी संघर्ष करना पड़ा। लगातार 17 साल मांग उठाने के बाद 1999 में जम्मू में कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना का सपना पूरा हो सका लेकिन इच्छित रूप में नहीं। उसका नाम शेर-ए-कश्मीर के नाम पर रखा गया जबकि स्थानीय लोगों की मांग थी कि इसका नामकरण बाबा जित्तो सिंह के नाम पर हो। विश्वविद्यालय में कोर्स शुरू करने से लेकर उन्हें मान्यता दिलाना भी बेहद मुश्किल भरा रहा। उनके लिए लगातार पेच फंसाया जाता रहा। 

एम्स पहले कश्मीर को दिया जम्मू को आवाज उठानी पड़ी
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी एम्स की घोषणा भी पहले कश्मीर के लिए हुई। वह 2015 का साल था। इसे अवंतीपोरा में स्थापित किया जाना था। जम्मू को इसके लिए भी आवाज बुलंद करनी पड़ी। कभी गुज्जरों के आवास स्थल उजड़ने का बहाना बनाया गया तो कभी प्रशासनिक बाधाएं खड़ी की गईं। कभी निर्माण को लेकर अड़ंगा लगाया गया। तमाम मुश्किलों के बीच वर्ष 2020 में सांबा के विजयपुर में एम्स स्थापित हुआ। आज ये काम कर रहा है। इसके ठीक विपरीत कश्मीर का एम्स अभी पूरी तरह क्रियाशील नहीं हो सका है।

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