CAG की रिपोर्ट का खुलासा: झारखंड में 1.60 लाख करोड़ के उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित, वित्तीय जवाबदेही पर चिंता
झारखंड में सीएजी की रिपोर्ट ने सरकारी वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक करीब 1.60 लाख करोड़ रुपये की सरकारी राशि के उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
झारखंड में अब तक के सबसे लंबे समय तक हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री रहे हैं, जबकि सबसे कम कार्यकाल के लिए उनके पिता शिबू सोरेन मुख्यमंत्री रहे थे। इसके अलावा, झारखंड ने लंबे समय तक बीजेपी के मुख्यमंत्रियों को देखा है और निर्दलीय मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का कार्यकाल भी देखा है।
प्रदेश में अब तक कई मुख्यमंत्री रहे हैं, जिनमें बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, रघुवर दास, मधु कोड़ा और शिबू सोरेन शामिल हैं। वहीं, सीएजी ने मंगलवार को खुलासा किया कि 1.60 लाख करोड़ रुपये का हिसाब-किताब नहीं मिल पा रहा है। इतनी बड़ी राशि के उपयोगिता प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य गठन के बाद से 31 मार्च 2025 तक करीब 1.60 लाख करोड़ रुपये की सरकारी राशि के खर्च का उपयोगिता प्रमाण पत्र सरकार की ओर से उपलब्ध नहीं कराया गया है। इतनी बड़ी राशि के उपयोग का प्रमाण लंबित रहने से सरकारी खर्च की निगरानी और वित्तीय जवाबदेही पर सवाल खड़े होते हैं।
सीएजी ने जताई चिंता
सीएजी ने उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित रहने को लेकर चिंता जताई है। हालांकि, केवल उपयोगिता प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं होने को राशि के दुरुपयोग या गबन का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता। संबंधित विभागों से आवश्यक दस्तावेज मिलने और आगे की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के लिए हुआ या नहीं।
निगरानी व्यवस्था पर सवाल
नियमों के अनुसार, किसी वित्तीय वर्ष में सरकारी योजना या कार्य के लिए जारी राशि खर्च होने के बाद संबंधित विभाग या एजेंसी को उसका उपयोगिता प्रमाण पत्र उपलब्ध कराना होता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी राशि का इस्तेमाल उसी कार्य के लिए किया गया, जिसके लिए उसे जारी किया गया था। ऐसे में लंबे समय से बड़ी राशि के उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित रहने से वित्तीय पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सीएजी की रिपोर्ट में एसी बिल और डीसी बिल से जुड़े वित्तीय अनुशासन का भी उल्लेख किया गया है। सरकारी व्यवस्था में आवश्यक परिस्थितियों में ट्रेजरी से अग्रिम राशि एसी बिल के माध्यम से निकाली जा सकती है। हालांकि, बाद में उस राशि के वास्तविक खर्च का पूरा विवरण डीसी बिल के माध्यम से देना अनिवार्य होता है।
खर्च का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक 4,531 करोड़ रुपये की अग्रिम निकासी के खर्च का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया था। इससे भी सरकारी वित्तीय प्रबंधन और जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं। डीसी बिल के जरिए यह स्पष्ट होता है कि अग्रिम निकाली गई राशि किस मद में और किस उद्देश्य से खर्च की गई।
सीएजी की रिपोर्ट में झारखंड की आर्थिक स्थिति से जुड़े कुछ सकारात्मक आंकड़े भी सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में झारखंड के जीएसडीपी में 2023-24 की तुलना में 10.87 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, देश के कुल जीडीपी में झारखंड की हिस्सेदारी 2024-25 में 1.56 प्रतिशत रही।
ये भी पढ़ें- JPSC Exam: हेमंत सरकार का बड़ा फैसला, 14वीं जेपीएससी PT समेत 2023-25 की कई परीक्षाएं होंगी रद्द
राज्य के राजस्व में भी वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, 2023-24 की तुलना में 2024-25 में झारखंड के राजस्व में 7.46 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
इस तरह सीएजी की रिपोर्ट में एक ओर राज्य की अर्थव्यवस्था और राजस्व में वृद्धि के आंकड़े सामने आए हैं, वहीं दूसरी ओर 1.60 लाख करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाण पत्र और 4,531 करोड़ रुपये की अग्रिम निकासी के खर्च का विवरण लंबित रहने का मुद्दा भी गंभीरता से सामने आया है। अब सरकार के सामने लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्र और डीसी बिल उपलब्ध कराने तथा सीएजी की आपत्तियों पर आवश्यक कार्रवाई करने की चुनौती है।