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Jharkhand: यहां 120 सीढ़ियां चढ़ने पर होते हैं भोजेश्वर महादेव का दर्शन, सावन में शिवभक्तों का लगता है तांता
Fri, 31 Jul 2026 01:57 PM IST
राँची ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: राँची ब्यूरो
Updated Fri, 31 Jul 2026 01:57 PM IST
सार
झारखंड के चतरा जिले में स्थित लगभग 123 वर्ष पुराने भोजेश्वर महादेव मंदिर में सावन के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। 1903 में स्वप्न में मिले प्राचीन शिवलिंग की स्थापना के बाद से यह मंदिर क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
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भोजेश्वर महादेव
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। पूरे महीने शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और हर-हर महादेव के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। चतरा जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर भोजिया गांव की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन भोजेश्वर महादेव मंदिर भी सावन में आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है। पहाड़ी पर विराजमान बाबा भोलेनाथ के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को करीब 120 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
स्वप्न में मिले शिवलिंग की स्थापना से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय लोगों के अनुसार, भोजेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना वर्ष 1903 में हुई थी। ग्रामीण अलख सिंह बताते हैं कि उसी वर्ष गांव के भीखन सिंह को स्वप्न में भगवान भोलेनाथ के दर्शन हुए थे। स्वप्न में उन्हें खरीक गांव के सुग्गिया आहार में एक प्राचीन शिवलिंग होने की जानकारी मिली। इसके बाद ग्रामीण गाजे-बाजे के साथ सुग्गिया आहार पहुंचे और वहां मिले प्राचीन शिवलिंग को भोजिया गांव की पहाड़ी पर लाकर विधि-विधान से स्थापित किया गया। तभी से यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
कई चरणों में हुआ मंदिर का निर्माण
ग्रामीण बाबू मृत्युंजय सिंह के अनुसार, वर्ष 1964 में यदुनंदन सिंह, विशुन सिंह और अन्य ग्रामीणों के सहयोग से यहां चार पाया वाला मंदिर बनाया गया। इसके बाद वर्ष 1990 में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया और वर्ष 2003 में विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई।
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मुराद पूरी होने की है मान्यता
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि बाबा भोजेश्वर महादेव के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि आसपास के गांवों के लोग विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत भी यहां पूजा-अर्चना और बाबा के आशीर्वाद से करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
प्राचीन शिवलिंग आज भी रहस्य
ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1903 से पहले सुग्गिया आहार में यह शिवलिंग कैसे पहुंचा और उसकी पूजा कौन करता था, इसकी कोई स्पष्ट जानकारी आज तक नहीं मिल सकी है। इसे अत्यंत प्राचीन शिवलिंग माना जाता है और इससे जुड़ी कई लोक मान्यताएं आज भी प्रचलित हैं।
ये भी पढ़ें- JPSC परीक्षा पर बवाल! हजारों छात्रों का प्रदर्शन, बोले- धांधली हुई, परीक्षा रद्द कर CBI जांच कराएं
सावन में लगता है भक्तों का मेला
सावन के महीने में भोजेश्वर महादेव मंदिर का नजारा देखते ही बनता है। आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। भक्त 120 सीढ़ियां चढ़कर पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचते हैं और बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक तथा विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। पूरे सावन माह मंदिर परिसर हर-हर महादेव के जयकारों से गूंजता रहता है। भोजेश्वर महादेव मंदिर आज केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आस्था, परंपरा और धार्मिक विरासत का प्रतीक बन चुका है। सावन में यहां उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता को और भी बढ़ा देती है।
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स्वप्न में मिले शिवलिंग की स्थापना से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय लोगों के अनुसार, भोजेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना वर्ष 1903 में हुई थी। ग्रामीण अलख सिंह बताते हैं कि उसी वर्ष गांव के भीखन सिंह को स्वप्न में भगवान भोलेनाथ के दर्शन हुए थे। स्वप्न में उन्हें खरीक गांव के सुग्गिया आहार में एक प्राचीन शिवलिंग होने की जानकारी मिली। इसके बाद ग्रामीण गाजे-बाजे के साथ सुग्गिया आहार पहुंचे और वहां मिले प्राचीन शिवलिंग को भोजिया गांव की पहाड़ी पर लाकर विधि-विधान से स्थापित किया गया। तभी से यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
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कई चरणों में हुआ मंदिर का निर्माण
ग्रामीण बाबू मृत्युंजय सिंह के अनुसार, वर्ष 1964 में यदुनंदन सिंह, विशुन सिंह और अन्य ग्रामीणों के सहयोग से यहां चार पाया वाला मंदिर बनाया गया। इसके बाद वर्ष 1990 में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया और वर्ष 2003 में विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई।
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मुराद पूरी होने की है मान्यता
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि बाबा भोजेश्वर महादेव के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि आसपास के गांवों के लोग विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत भी यहां पूजा-अर्चना और बाबा के आशीर्वाद से करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
प्राचीन शिवलिंग आज भी रहस्य
ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1903 से पहले सुग्गिया आहार में यह शिवलिंग कैसे पहुंचा और उसकी पूजा कौन करता था, इसकी कोई स्पष्ट जानकारी आज तक नहीं मिल सकी है। इसे अत्यंत प्राचीन शिवलिंग माना जाता है और इससे जुड़ी कई लोक मान्यताएं आज भी प्रचलित हैं।
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सावन में लगता है भक्तों का मेला
सावन के महीने में भोजेश्वर महादेव मंदिर का नजारा देखते ही बनता है। आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। भक्त 120 सीढ़ियां चढ़कर पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचते हैं और बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक तथा विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। पूरे सावन माह मंदिर परिसर हर-हर महादेव के जयकारों से गूंजता रहता है। भोजेश्वर महादेव मंदिर आज केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आस्था, परंपरा और धार्मिक विरासत का प्रतीक बन चुका है। सावन में यहां उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता को और भी बढ़ा देती है।