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Jharkhand: तीन बैठकों के बाद भी नहीं निकला समाधान, जेटेट भाषा विवाद पर फंसी समिति; सीएम लेंगे अंतिम फैसला

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: राँची ब्यूरो Updated Wed, 03 Jun 2026 09:09 PM IST
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सार

झारखंड में जेटेट भाषा विवाद पर बनी मंत्रिमंडलीय समिति तीन दौर की बैठकों के बाद भी किसी सर्वसम्मत निर्णय पर नहीं पहुंच सकी है। भोजपुरी, मगही और अंगिका को जेटेट में शामिल करने को लेकर मंत्रियों के बीच मतभेद सामने आए हैं।

Jharkhand Congress splits over JTET language dispute, with three ministers in favour and two against
बैठक में समिति के सदस्य
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विस्तार

 झारखंड में जेटेट भाषा विवाद को लेकर राज्य सरकार द्वारा गठित मंत्रिमंडलीय समिति के भीतर ही अलग-अलग राय सामने आने लगी हैं। इस मुद्दे पर अब तक तीन दौर की बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन समिति किसी सर्वसम्मत निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है। अब इस विवाद के समाधान की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अंतिम निर्णय पर आ टिकी है।

वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अध्यक्षता में हुई बैठक में भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषाओं को लेकर गहन चर्चा हुई। समिति में शामिल कांग्रेस कोटे के तीन मंत्री इन भाषाओं को जेटेट में शामिल करने के पक्ष में हैं, जबकि कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की और मंत्री हाफिजुल हसन ने इसका विरोध किया है। इस मतभेद के कारण समिति किसी ठोस निर्णय तक नहीं पहुंच सकी।

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'अब मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा मामला'
बैठक के बाद राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि मामला अब मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा और अंतिम फैसला उन्हीं को करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल संख्या बल के आधार पर निर्णय नहीं होना चाहिए, बल्कि समर्थन और विरोध दोनों पक्षों के तर्कों का गंभीरता से मूल्यांकन कर जनहित में फैसला लिया जाना चाहिए।

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उन्होंने सुझाव दिया कि जिन जिलों में भोजपुरी, मगही और अंगिका का व्यापक रूप से प्रयोग होता है, वहां के विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए हिंदी को द्वितीय भाषा के रूप में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है। उनके अनुसार, इससे क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर उत्पन्न विवाद कम होगा और छात्रों को भी बेहतर अवसर मिल सकेंगे।


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यह संवेदनशील मुद्दा बन चुका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जेटेट भाषा विवाद अब केवल शिक्षा नीति का विषय नहीं रह गया है। यह झारखंड की भाषाई पहचान, स्थानीयता और राजनीतिक संतुलन से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। ऐसे में मुख्यमंत्री का फैसला न केवल शिक्षा व्यवस्था, बल्कि राज्य की राजनीति पर भी प्रभाव डाल सकता है।

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