जापान में कोविड-19 की तबाही कम क्यों रही? यह एक बड़ा सवाल है जिसके कई जवाब हो सकते हैं। अब वजह चाहे जापानियों के रहन-सहन के तरीके हों या फिर उनकी 'बेहतर इम्युनिटी' यानी शरीर की बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता। केवल जापान में कोविड-19 से मृत्यु दर उस क्षेत्र के देशों में सबसे कम नहीं है। दक्षिण कोरिया, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और वियतनाम में भी मृत्यु दर काफी कम है। लेकिन 2020 की शुरुआत में, जापान में कोविड-19 से औसत से भी कम मौत हुई।
Coronavirus: क्या जापान ने 100 साल पुराने तरीके से किया कोरोना को कंट्रोल?
जापान में क्या हुआ?
फरवरी में जिस वक्त चीनी शहर वुहान संक्रमण के मामले में अपने चरम पर था, वुहान के अस्पताल पूरी तरह भर चुके थे और अधिकांश देशों ने चीनी यात्रियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए थे, तब भी जापान ने अपनी सीमाएं नहीं बंद कीं। कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के काफी शुरू में ही ये बात स्पष्ट हो गई थी कि कोविड-19 बुजुर्गों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। खासकर तब, जब वे सीधे तौर पर किसी संक्रमित इंसान के संपर्क में आ जाएं।
जापान में अन्य देशों की तुलना में बुजुर्गों की संख्या भी सबसे अधिक है और अधिकांश लोग बड़े-भीड़भाड़ वाले शहरों में बसे हैं। ग्रेटर टोक्यो में करीब तीन करोड़ सत्तर लाख लोग रहते हैं जो शहर में आने-जाने के लिए भीड़भाड़ वाली ट्रेनों का सहारा लेते हैं। फिर जापान ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की 'टेस्ट, टेस्ट और टेस्ट' करने की सलाह को भी नहीं माना। अभी भी, जापान में कुल साढ़े तीन लाख पीसीआर टेस्ट हुए हैं जो वहां की आबादी का सिर्फ 0.27 प्रतिशत है। और ना ही जापान ने यूरोप की तरह कठोर लॉकडाउन लागू किया।
अप्रैल में, जापान सरकार ने देश में इमर्जेंसी लागू करने का आदेश दिया था, लेकिन लोगों से 'घरों में रहने की गुजारिश' स्वैच्छिक आधार पर की गई थी। इसके लिए सरकार की ओर से जबरदस्ती नहीं की गई। हालांकि, गैर-जरूरी व्यापार बंद करने को कहा गया था, लेकिन उन्हें खोलने पर भी कोई जुर्माना नहीं था।
न्यूजीलैंड और वियतनाम, जिन्होंने इस महामारी के खिलाफ सफलता हासिल की है और इसे नियंत्रण में करके दिखाया है, उनकी तरह सीमाएं बंद करने, लॉकडाउन या क्वारंटीन के सख्त नियम बनाने और व्यापक स्तर पर कोविड-19 की टेस्टिंग करने जैसे कदम भी जापान ने नहीं उठाए।
इसके बावजूद, जापान में कोरोना संक्रमण का पहला केस सामने आने के पांच महीने बाद वहां 20 हजार मामलों की पुष्टि हुई है और कोविड-19 की वजह से 1000 से कुछ अधिक मौत हुई है। जापान में इमर्जेंसी हटा ली गई है और सामान्य जीवन बहुत तेजी से पटरी पर लौट रहा है। कई वैज्ञानिक प्रमाण भी मिले हैं कि जापान ने वाकई संक्रमण के फैलाव को रोक दिया है। कम से कम फिलहाल तो यही माना जा रहा है।
जापान में टेलिकॉम कंपनी सॉफ्टबैंक ने अपने 40 हजार कर्मचारियों के कोविड-19 एंटी-बॉडी टेस्ट करवाए, जिससे पता चला कि सिर्फ 0.24 प्रतिशत कर्मचारी ही कोरोना वायरस के संपर्क में आए। टोक्यो में आकस्मिक टेस्टिंग के अंतर्गत करीब आठ हजार लोगों के टेस्ट किए गए थे, जिसमें सिर्फ 0.1 प्रतिशत लोगों को ही कोरोना पॉजिटिव पाया गया। पिछले महीने, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने इमर्जेंसी हटाए जाने की घोषणा करते हुए बड़े गर्व से 'जापान मॉडल' की बात की थी और कहा था कि 'अन्य देशों को भी जापान से सीखना चाहिए।'
जापान के मामले में क्या खास है?
अगर आप जापान के उप-प्रधानमंत्री टारो असो की बात सुनें, तो यह जापानियों की 'उच्च गुणवत्ता वाली जीवन शैली' के कारण संभव हुआ है। इस मामले में उनका कहना है कि 'जापान के लोग अन्य किसी भी देश की तुलना में ज्यादा बेहतर जीवन जीते हैं और ऐसा सांस्कृतिक रूप से बेहतर होने की वजह से है।'
बहुत से लोगों ने उप-प्रधानमंत्री टारो असो के इस बयान की यह कहते हुए आलोचना की है कि 'उनका यह बयान अपनी नस्ल को बाकियों से बेहतर समझने वाली सोच की वजह से आया और ये अंधराष्ट्रीयता की निशानी है।' लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि कई जापानी और कुछ वैज्ञानिक, सोचते हैं कि 'कुछ तो है जो जापान में अलग है'- जिसे कई बार 'एक्स-फैक्टर' कह दिया जाता है, जो कोविड-19 महामारी के दौर में भी वहां के लोगों को बचा गया।
एक संभावना तो ये है कि जापानी समाज में गले मिलने या मिलने पर एक-दूसरे को चूमने जैसे रिवाज नहीं हैं, इसलिए लोगों में एक-दूसरे से काफी हद तक दूरी बनी रहती है। इसे फिजिकल डिस्टेन्सिंग कह सकते हैं या जिसे महामारी के दौर में सोशल डिस्टेन्सिंग का नाम दिया गया है और जापान में सामान्य तौर पर इसका पालन हो पाता है। हालांकि विशेषज्ञ इसे जापान में संक्रमण सीमित रहने का सही जवाब नहीं मानते।
