WHO Reoprt: क्या अब हर परिवार पर है कैंसर का साया? आखिर कहां हो रही चूक, डब्ल्यूएचओं की रिपोर्ट ने बढ़ाई टेंशन
हर दिन दुनिया में 26 हजार से ज्यादा लोगों की मौत कैंसर से होती है। हर साल करीब 2.06 करोड़ नए मरीज सामने आते हैं, जबकि लगभग एक करोड़ लोगों की मौत इस बीमारी से हो जाती है। आखिर क्यों ये बीमारी इतनी तेजी से बढ़ती जा रही है?
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कैंसर वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है, ये बीमारी हर साल लाखों लोगों की जान ले रही है। भले ही आधुनिक चिकित्सा पद्धति और कारगर दवाओं ने अब इलाज को काफी आसान बना दिया है, पर कैंसर का नाम सुनते ही अब भी लोगों के मन में डर, चिंता और अनगिनत सवाल पैदा हो जाते हैं।
अगर हम आपसे कहें कि दुनिया के लगभग हर व्यक्ति का जीवन किसी न किसी रूप में कैंसर से प्रभावित हो सकता है, तो शायद यह बात चौंकाने वाली लगे। अब तक हम यही मानते आए हैं कि कैंसर केवल उन लोगों की बीमारी है जिनमें इसका निदान होता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं बड़ी है। अगर आपके परिवार में किसी सदस्य को कैंसर होता है, तो उसकी तकलीफ केवल उसी तक सीमित नहीं रहती। लंबा इलाज, मानसिक तनाव और आर्थिक बोझ संघर्ष पूरे घर को प्रभावित करते हैं।
इसी को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक हालिया रिपोर्ट में चिंता जताई है कि हर पांच में से एक व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी कैंसर हो सकता है। यदि परिवार और करीबी लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी शामिल किया जाए तो दुनिया के लगभग 92 प्रतिशत लोग अपने जीवन में कम से कम एक बार कैंसर के असर से प्रभावित होंगे। ये आंकड़ा केवल बीमारी का नहीं, बल्कि उस सामाजिक और आर्थिक चुनौती का भी संकेत है जो आने वाले वर्षों में और बड़ी हो सकती है।
पर सवाल ये है कि आखिर ये बीमारी इतना व्यापक और खतरनाक रूप क्यों लेती जा रही है?
गरीब और अमीर देशों में कैंसर के जांच-इलाज में बड़ा अंतर
डब्ल्यूएचओ और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) की संयुक्त रिपोर्ट ने कैंसर के बढ़ते खतरों को लेकर अलर्ट किया है। रिपोर्ट के अनुसार, कैंसर से जुड़ा अनुभव सभी लोगों के लिए समान नहीं है। गरीब और अमीर देशों के बीच इलाज, जांच व दवाओं की उपलब्धता में बड़ा अंतर है।
- हर दिन दुनिया में 26 हजार से ज्यादा लोगों की मौत कैंसर से होती है।
- हर साल करीब 2.06 करोड़ नए मरीज सामने आते हैं, जबकि लगभग एक करोड़ लोगों की मौत इस बीमारी से हो जाती है।
- हृदय रोगों के बाद कैंसर दुनिया में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है।
- उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर से पीड़ित 87 प्रतिशत महिलाएं पांच साल तक जीवित रहती हैं, जबकि कम आय वाले देशों में यह आंकड़ा सिर्फ 42 प्रतिशत है।
इसके अलावा, दुनिया के हर तीन में से केवल एक देश ने ही कैंसर के इलाज को अपनी यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का हिस्सा बनाया है। यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज का मतलब हर व्यक्ति को जरूरी इलाज सुलभ और किफायती तरीके से मिल सके।
ये है कैंसर के बढ़ते खतरों की वजह
रिपोर्ट में इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि कैंसर से निपटने के लिए देशों ने कितनी प्रगति की है? इसमें सरकारों की नीतियों, कैंसर की रोकथाम, तंबाकू नियंत्रण, टीकाकरण कार्यक्रम और इलाज में निवेश जैसे पहलुओं का विश्लेषण किया गया।
- रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में तंबाकू के उपयोग में करीब 27 प्रतिशत की कमी आई है। साथ ही 82 प्रतिशत देशों ने कैंसर से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजना बनाई है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि इसके बावजूद इन प्रयासों का असर लोगों की जान बचाने के स्तर तक नहीं पहुंच पाया है।
दवाओं की पहुंच में भी बड़ा अंतर
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाएं आज भी कई गरीब देशों के मरीजों की पहुंच से बहुत दूर हैं। कम और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में कैंसर की 20 प्रमुख दवाओं की उपलब्धता सिर्फ 9-54 प्रतिशत तक है, जबकि उच्च आय वाले देशों में यह 68-94 प्रतिशत के बीच है।
कैसे कम होगा कैंसर का बढ़ता संकट?
विशेषज्ञों ने कहा कि कैंसर का असर अब केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। इसका बोझ आर्थिक, सामाजिक और मानवीय स्तर पर लगातार बढ़ रहा है। इसलिए दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां कैंसर की रोकथाम और इलाज को लेकर बड़े और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।
रिपोर्ट में सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, सामाजिक संगठनों, निजी क्षेत्र और डब्ल्यूएचओ से मिलकर काम करने की अपील की गई है, ताकि कैंसर से प्रभावित लोगों और उनके परिवारों को बेहतर और समग्र देखभाल मिल सके।
रिपोर्ट में कुछ जरूरी सुझाव दिए गए हैं-
- कैंसर के इलाज को सभी के लिए उपलब्ध सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का हिस्सा बनाया जाए।
- कैंसर झेल चुके मरीजों और उनके परिवारों के अनुभवों को स्वास्थ्य व्यवस्था के केंद्र में रखा जाए तथा उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा दी जाए।
- कैंसर से जुड़ी नई रिसर्च और तकनीक आम लोगों की जरूरतों के अनुसार हो।
- आधुनिक और प्रभावी इलाज सभी लोगों तक समान रूप से पहुंचे, केवल अमीर देशों या संपन्न लोगों तक ही सीमित न रहे।
असम से सीख लेने की जरूरत
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में असम ने देश के लिए नई मिसाल कायम की है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल ने मंगलवार (7 जुलाई) को विधानसभा में बताया कि असम में कैंसर मरीजों का सर्वाइवल रेट 62 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो देश में सबसे अधिक है।
- यह राष्ट्रीय औसत 40 प्रतिशत से 22 प्रतिशत अधिक है।
- राज्य में विकसित विकेंद्रीकृत कैंसर उपचार प्रणाली, व्यापक स्क्रीनिंग अभियान और समय पर इलाज की व्यवस्था ने इसमें काफी मदद की है।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि हमने पूरे राज्य में अस्पतालों और उपचार केंद्रों का मजबूत नेटवर्क तैयार किया है। राज्य में 17 कैंसर अस्पतालों का नेटवर्क विकसित किया जा रहा है, जिनमें से 12 अस्पताल फिलहाल संचालित हैं। सरकार ने 1.24 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य निर्धारित किया है। अब तक करीब 47 लाख लोगों की जांच की जा चुकी है, जिससे 900 से अधिक मरीजों में शुरुआती चरण (स्टेज-1 और स्टेज-2) में कैंसर की पहचान हुई है।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, पहले ऐसे मरीज अक्सर बीमारी के अंतिम चरण में अस्पताल पहुंचते थे, जबकि अब समय रहते इलाज मिलने से उनके स्वस्थ होने और लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना काफी बढ़ गई है।
कैंसर के का जल्द पता लगाने में एआई का हो रहा इस्तेमाल
अमर उजाला में प्रकाशित एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की कैंसर के समय पर निदान में मदद ली जा रही है।
- विशेषज्ञों की टीम ने एक नई एआई आधारित स्मार्टफोन तकनीक विकसित की है, जो मिनटों में बता देगी कि आपको स्किन कैंसर तो नहीं है? इसमें एक साधारण स्मार्टफोन कैमरे की मदद से त्वचा पर मौजूद तिल, धब्बों और घावों की शुरुआती जांच जा सकती है। इसके लिए किसी महंगे कैमरे, विशेष लेंस या बड़े अस्पताल में जाने की जरूरत भी नहीं होगी।
इस एआई तकनीक को हजारों मेडिकल तस्वीरों के साथ पहले से ही ट्रेन किया गया है ताकि वह संदिग्ध निशानों को पहचानकर बता सके कि किस मरीज को तुरंत विशेषज्ञ के पास जाने की जरूरत है और किसे नहीं?
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स्रोत:
Global status report on cancer 2026: the future we choose together
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