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Child Health: मां की ये गलती बच्चों के दिमागी विकास को कर सकती है बाधित, एडीएचडी बीमारी का बढ़ा देती है खतरा

Sun, 12 Jul 2026 01:28 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Sun, 12 Jul 2026 01:28 PM IST
सार

जिन बच्चों को जन्म के बाद कम से कम छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाया गया, उनमें आगे चलकर एडीएचडी यानी ध्यान केंद्रित न कर पाने और बिना सोचे-समझे तुरंत प्रतिक्रिया देने जैसी समस्या होने का खतरा कम देखा गया। ये रिपोर्ट सभी माताओं को जरूर पढ़नी चाहिए।

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बच्चों में एडीएचडी की समस्या का खतरा - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

किसी भी बच्चे के जीवन की नींव गर्भावस्था में ही पड़ जाती है, वहीं जन्म के बाद के शुरुआती वर्षों में उसे मिलने वाला पोषण तय करता है कि बच्चे का मस्तिष्क, शरीर और प्रतिरक्षा तंत्र कैसा होगा। विशेषज्ञ कहते हैं, यदि गर्भावस्था के दौरान मां को संतुलित आहार, नियमित स्वास्थ्य जांच और तनावमुक्त माहौल मिलता है, तो ये बच्चे के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है।

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जन्म के बाद शुरुआती वर्षों में सही पोषण, समय पर टीकाकरण, बातचीत और खेल-कूद बच्चे के दिमागी विकास, सीखने की क्षमता और भावनात्मक मजबूती को आकार देते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ गर्भावस्था से लेकर बचपन के शुरुआती वर्षों को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण मानते हैं। 
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जब बच्चों के पोषण की बात हो तो शुरुआती छह महीनों में विशेषज्ञ केवल मां का दूध पिलाने की सलाह देते हैं। मां का दूध सिर्फ नवजात शिशु की भूख नहीं मिटाता बल्कि ये शरीर को मजूबत और रोगों से लड़ने में भी मदद करता है।
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इसी को लेकर एक हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि  जिन बच्चों को जन्म के बाद कम से कम छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाया जाता है, उनमें आगे चलकर एडीएचडी यानी अटेंशन-डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिजीज होने का खतरा कम होता है। गौरतलब है कि एडीएचडी की समस्या बच्चों में तेजी से बढ़ती जा रही है, जिसका असर उनके पूरे जीवन पर हो सकता है।

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बच्चों में बढ़ती एडीएचडी की समस्या - फोटो : Freepik.com

बच्चों में बढ़ती एडीएचडी की समस्या

अटेंशन-डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर एक प्रकार की मस्तिष्क संबंधी विकृति है, जिसके कारण बच्चों को ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत होते है।  
 

  • बच्चे का ध्यान बार-बार भटकता है, वह एक जगह शांत बैठने में परेशानी महसूस करता है और कई बार बिना सोचे-समझे फैसले लेने या व्यवहार करने लगता है।
  • यह समस्या पढ़ाई, खेल, सामाजिक रिश्तों और रोजमर्रा की जिंदगी को भी प्रभावित कर सकती है।इसके लक्षण आमतौर पर 12 साल की उम्र से पहले दिखाई देने लगते हैं।


विशेषज्ञ कहते हैं, लंबे समय से माना जाता रहा है कि मां का दूध बच्चों की सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है। अब इसके बच्चों के मस्तिष्क संबंधी गंभीर समस्या को कम करने के भी संकेत मिले हैं।

कई पश्चिमी देशों जैसे ब्रिटेन में ज्यादातर महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती दो महीनों तक स्तनपान ही कराती हैं। छह महीने पूरे होने तक लगभग हर 10 में से 4 मांएं स्तनपान बंद कर देती हैं और बच्चे को फॉर्मूला मिल्क (बाजार में मिलने वाला शिशु दूध) देना शुरू कर देती हैं।

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ब्रेस्ट फीडिंग (स्तनपान) के कई सारे लाभ - फोटो : Adobe Stock

मां का दूध बच्चों के ब्रेन के लिए जरूरी

बायोलॉजिकल साइकेट्री जर्नल में प्रकाशित इस शोध में पाया गया कि जितने लंबे समय तक बच्चे को केवल मां का दूध पिलाया गया, उनमें एडीएचडी सहित कई अन्य दिमागी समस्याओं का खतरा उतना ही कम हो सकता है।

अध्ययन करने वाले नॉर्वे के शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी यह साफ नहीं है कि मां का दूध यह सुरक्षा कैसे देता है। लेकिन अनुमान है कि मां के दूध में ऐसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो बच्चे के मस्तिष्क के सही विकास के लिए बेहद जरूरी हैं।

  • यह शोध ऐसे समय आया है, जब एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2018 के बाद से ब्रिटेन में एडीएचडी वाले बच्चों की संख्या करीब 25 प्रतिशत बढ़ गई है।
  • दुनियाभर में, यह लगभग 8% बच्चों और 2.5% किशोरों और 5% वयस्कों को प्रभावित करता है। 



अध्ययन में क्या पता चला?

नॉर्वे के यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गेन के शोधकर्ताओं ने इसके लिए 37,643 बच्चों और उनकी माताओं से डेटा का विश्लेषण किया।  शोधकर्ताओं का मकसद यह जानना था कि किसी बच्चे को कितने महीनों तक स्तनपान कराने से एडीएचडी के लक्षणों का खतरा कम हो सकता है। बच्चे के जन्म के छह महीने बाद माताओं से कई जानकारियां एकत्रित की गईं।
 

  • उन्होंने बच्चे को कितने समय तक सिर्फ स्तनपान कराया।
  • कितने समय तक मां के दूध और फॉर्मूला मिल्क दोनों का इस्तेमाल किया।
  • बच्चे को पहली बार पानी, जूस या कोई अन्य तरल पदार्थ कब दिया।
  • ठोस भोजन यानी दाल, खिचड़ी, दलिया या अन्य खाने की शुरुआत कब की गई।

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बच्चों के लिए जरूरी है मां का दूध - फोटो : Freepik.com

क्या कहती हैं शोधकर्ता?

अध्ययन की मुख्य लेखिका और मनोचिकित्सक डॉ. बेरिट स्क्रेटिंग सोलबर्ग कहती हैं, हमने पाया कि जितने लंबे समय तक बच्चे को केवल मां का दूध पिलाया गया (अधिकतम छह महीने तक) उनमें मस्तिष्क विकारों का खतरा उतना कम था। लड़कों और लड़कियों दोनों में ये समान रूप से देखा गया।
 
इससे पहले साल 2025 में अमेरिका में हुई एक बड़ी समीक्षा में पाया गया था कि स्तनपान कराने से शिशु की मृत्यु का खतरा कम होता है। इसके अलावा स्तनपान के और भी कई लाभ हो सकते हैं।
 

  • बच्चे का जरूरत से ज्यादा तेजी से वजन बढ़ने का खतरा कम होता है।
  • संक्रमण और बार-बार होने वाली बीमारियां कम होती हैं।
  • एलर्जी होने की आशंका भी कम होती है।




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स्रोत:
Breastfeeding and Development of Attention-Deficit/Hyperactivity Disorder Symptoms Across Childhood


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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