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Weight Loss & Cancer: वेट लॉस हमेशा अच्छी खबर नहीं, 10% से ज्यादा वजन घटना कहीं कैंसर की तरफ तो नहीं है इशारा?

Sun, 16 Aug 2026 01:41 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Sun, 16 Aug 2026 01:41 PM IST
सार

बिना कोशिश 10% से ज्यादा वजन कम होना अच्छी फिटनेस का संकेत नहीं, बल्कि आंत के कैंसर की और इशारा हो सकता है। रिसर्च में ऐसे मरीजों में कैंसर से मौत और बीमारी के दोबारा लौटने का खतरा ज्यादा पाया गया।

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latest study says Losing over 10 percent of body weight may raise your risk of dying from bowel cancer
वजन घटना कैंसर का हो सकता है संकेत - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

मौजूदा समय की सबसे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की बात की जाए तो वजन बढ़ना और मोटापा उनमें सबसे पहले नंबर पर आएगा। मोटापा सिर्फ शरीर के लुक को ही खराब नहीं करता है बल्कि इससे कई तरह की क्रॉनिक बीमारियों जैसे हृदय रोग, डायबिटीज, गठिया की समस्या से लेकर कैंसर होने तक का खतरा काफी बढ़ जाता है। यही कारण है कि वेट लॉस के लिए लोग तरह-तरह के उपाय करते रहते हैं। वजन कम होना सुनते ही चेहरे पर खुशी आ जाती है। लेकिन क्या हर बार वजन कम होना अच्छी खबर है?

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अमर उजाला में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट में हमने बताया था कि फिटनेस का मतलब सिर्फ पतला होना नहीं होता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर बिना किसी कोशिश के आपका वजन तेजी से कम हो रहा है तो चिंता और भी बढ़ जाती है। ये कई तरह की बीमारियों का संकेत भी हो सकता है।
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इसी को लेकर एक हालिया रिपोर्ट ने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जर्मनी में हुए अध्ययन में आंत के कैंसर से जूझ रहे हजारों लोगों का डेटा देखा गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि बीमारी की पहचान से पहले जिन लोगों का वजन 10 फीसदी से ज्यादा कम हो गया था, उनमें आगे चलकर मौत का खतरा काफी ज्यादा था। इतना ही नहीं, ऐसे मरीजों में कैंसर के दोबारा लौटने की आशंका भी बढ़ी हुई मिली।
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तो अगर आपका वजन भी बिना किसी मेहनत के तेजी से कम होता जा रहा है तो ये खुश होने से ज्यादा चिंता का कारण हो सकता है।

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तेजी से हो रहा वेट लॉस तो हो जाएं अलर्ट - फोटो : Freepik.com

तेजी से वजन घटने को न माने अच्छा संकेत

यहां समझना जरूरी है कि विशेषज्ञ यह नहीं कह रहे हैं कि वजन बढ़ाना कैंसर से बचाएगा। उल्टा, वैज्ञानिकों का इशारा इस ओर है कि बिना कोशिश के लगातार वजन कम होना  शरीर में छिपी किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है।

यही बात कैंसर और वजन के बीच मौजूद एक पुराने रहस्य को भी समझने में मदद करती है। कुछ अध्ययनों में ऐसा दिखाई देता रहा है कि कैंसर से जूझ रहे ज्यादा वजन वाले मरीज कभी-कभी सामान्य वजन वाले मरीजों से बेहतर रिकवरी कर रहे होते हैं। इसे 'ओबेसिटी पैराडॉक्स' यानी मोटापे का विरोधाभास कहा जाता है।
 

  • अध्ययनकर्ता कहते हैं, वजन कम होना आमतौर पर सेहत के लिए अच्छा संकेत माना जाता है। लेकिन अगर आपका वजन बिना कोशिश के काफी कम हो रहा है, तो ये ज्यादा परेशानियों का संकेत हो सकता है।
  • जर्मनी में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों का वजन 10 फीसदी से ज्यादा कम हुआ था, उनमें आंत के कैंसर यानी बाउल कैंसर से मौत का खतरा, अन्य लोगों की तुलना में करीब 50 फीसदी ज्यादा था।
  • जिन मरीजों को पहले से बाउल कैंसर था, उनमें वजन कम होने से  कैंसर के दोबारा लौटने का खतरा 33 फीसदी ज्यादा पाया गया।

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बाउल कैंसर का जोखिम - फोटो : Freepik.com

बाउल कैंसर और इसका खतरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अचानक या बहुत ज्यादा वजन कम होना आमतौर पर कैंसर की पहचान का एक संकेत हो सकता है, जिसपर अक्सर लोग ध्यान नहीं देते हैं। बाउल कैंसर के मामले में ये दिक्कत और भी देखी जाती रही है।

दुनियाभर में 50 साल से कम उम्र के लोगों में बड़ी आंत के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अमर उजाला में प्रकाशित एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि शरीर में आयरन की कमी बने रहना भी कई मामलों में इस कैंसर की तरफ इशारा हो सकता है।
 

  • बाउल (आंत का) कैंसर दुनियाभर में तीसरा सबसे आम कैंसर है और कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। 'इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर' के आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में दुनियाभर में इसके अनुमानित 19 लाख (1.9 मिलियन) नए मामले सामने आए और 9 लाख से ज्यादा मौतें हुईं।
  • अनुमान है कि साल 2040 तक हर साल इसके करीब 32 लाख नए मामले सामने आ सकते हैं।
  • विशेषज्ञ कहते हैं, यह पहले से पता है कि मोटापा कम से कम 13 तरह के कैंसर का खतरा बढ़ाता है, जिनमें बाउल कैंसर भी शामिल है। हालांकि इसके साथ 'ओबेसिटी पैराडॉक्स' को समझना भी जरूरी है। 


'ओबेसिटी पैराडॉक्स' क्या है?

कई अध्ययनों में एक अजीब स्थिति सामने आई है, जिसे 'ओबेसिटी पैराडॉक्स' यानी मोटापे का विरोधाभास कहा जाता है। इसमें देखा गया कि कुछ मामलों में ज्यादा वजन या मोटापे वाले कैंसर के मरीज सामान्य वजन वाले मरीजों की तुलना में ज्यादा समय तक जीवित रहे।
 

  • विशेषज्ञों का मानना था कि संभवत: ज्यादा वजन वाले मरीज कैंसर और उसके कठिन इलाज से होने वाले शारीरिक नुकसान को बेहतर तरीके से सहन कर पाते हैं।
  • एक और वजह यह हो सकती है कि मोटापे से जूझ रहे लोगों में अक्सर डायबिटीज, स्लीप एपनिया और हाई ब्लड प्रेशर जैसी दूसरी समस्याओं का खतरा अधिक होता है, इसलिए वे डॉक्टर के पास जाते रहते हैं। इससे कैंसर की पहचान भी अपेक्षाकृत जल्दी हो सकती है।

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कैंसर के मामले को लेकर अध्ययन - फोटो : Adobe stock photos

अध्ययन में क्या पता चला?

जामा नेटवर्क ओपन जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट में जर्मन कैंसर रिसर्च सेंटर के शोधकर्ताओं ने बाउल कैंसर के 5,521 मरीजों के आंकड़ों का अध्ययन किया। इन मरीजों पर करीब पांच साल तक नजर रखी गई।
 

  • मरीजों से कैंसर की पहचान के समय उनकी लंबाई और वजन के बारे में जानकारी ली गई।
  • साथ ही, जीवन के पहले के वर्षों में उनके वजन की जानकारी भी जुटाई गई।
  • इससे शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिली कि कैंसर की पहचान से 5 से 14 साल पहले तक उनके वजन में कितना बदलाव आया था।
  • जिन मरीजों का वजन बीमारी की पहचान से पहले 10 फीसदी से ज्यादा कम हुआ था, उनमें किसी भी कारण से मौत का खतरा कंट्रोल वजन वाले मरीजों की तुलना में 55 फीसदी ज्यादा था।


स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी और शराब का सेवन लंबे समय में इस बीमारी का खतरा बढ़ाने वाला माना जाता रहा है। कुछ समय पहले तक यह माना जाता था कि बाउल कैंसर मुख्य रूप से उम्र बढ़ने के साथ होने वाली बीमारी है। लेकिन अब 45 साल से कम उम्र के लोगों में भी इसका जोखिम देखा जा रहा है।

वजन को कंट्रोल रखने से बाउल कैंसर के साथ कई अन्य तरह के कैंसर के खतरे को रोका जा सकता है, हालांकि अगर आपका वजन बिना किसी प्रयास के तेजी से कम हो रहा है तो इसे अनदेखा भी नहीं करना चाहिए, ये हेल्दी नहीं है।




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स्रोत:
Colorectal cancer statistics, 2026


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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