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रोग से थे अनजान, नेट से 130 एचआईवी और हेपेटाइटिस रोगियों की हुई पहचान
अमर उजाला ब्यूरो, झांसी
Published by: सचिन सोनी
Updated Mon, 14 Jul 2025 01:57 AM IST
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सार
साल भर में ही नेट यानी न्यूक्लिक एसिड टेस्ट से एचआईवी, हेपेटाइटिस बी-सी के 130 मरीज पकड़ में आए हैं। खास बात कि इन मरीजों को अपने रोग के बारे में जानकारी नहीं थी। जब वे मेडिकल कॉलेज में रक्तदान करने आए, उसके बाद हुई जांच में मर्ज पहचान में आया है।
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विस्तार
प्रशांत शर्मा
झांसी। मेडिकल कॉलेज के रक्तकोष में रक्तदान करने वालों के नमूने की नेट जांच के लिए अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज भेजा जाता है। रोजाना औसतन 15 नमूने अलीगढ़ भेजे जाते हैं। वहां से अगले दिन रिपोर्ट आती है। रिपोर्ट में सबकुछ ठीक मिलने पर ही रक्त मरीजों को चढ़ाया जाता है। जबकि, किसी तरह के वायरस/बीमारी की पुष्टि होने पर रक्त को नष्ट कर दिया जाता है।
झांसी मेडिकल कॉलेज के एक अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 तक के आंकड़े देखें तो साल भर में 5376 नमूने जांच के लिए अलीगढ़ भेजे गए। इनमें से 119 मरीजों में हेपेटाइटिस बी की पुष्टि हुई है। जबकि, आठ रोगी हेपेटाइटिस सी के मिले हैं। तीन लोग एचआईवी संक्रमित मिले हैं। रैपिड किट, एलाइजा की तुलना में नेट टेस्ट से वायरस की जल्दी पहचान हो जाती है। ऐसे में जरूरतमंद मरीज को संक्रमित व्यक्ति का खून नहीं चढ़ पाता है और वह संक्रमित होने से बच जाता है। बताया गया कि सामान्य विधि से जांच में हेपेटाइटिस-सी बीमारी पता लगाने में 60 दिन लगा सकते हैं। वहीं, नेट में चौथे दिन ही पकड़ में आ सकता है।
रैपिड किट, एलाइजा और नेट से हेपेटाइटिस बी व सी, एचआईवी और वायरस जनित रोगों की जांच की जा सकती है। इसमें नेट सबसे आधुनिक विधि है। इससे वायरस की जल्दी पहचान हो जाती है और दूसरों को खून नहीं चढ़ पाता है। जिले में सिर्फ झांसी मेडिकल कॉलेज की ब्लड बैंक ही नमूनों का न्यूक्लिक एसिड टेस्ट करवाती है। - डॉ. एमएल आर्य, ब्लड बैंक प्रभारी, मेडिकल कॉलेज।
फोन कर दी गई बीमारी जानकारी
रक्तदान के दौरान मरीज से फॉर्म भरवाया जाता है। इसमें उनका नाम, पता और मोबाइल नंबर भी होता है। नेट में एचआईवी और हेपेटाइटिस बी या सी बीमारी की पुष्टि होने के बाद उन रक्तदाताओं को मेडिकल कॉलेज के स्टाफ की ओर से फोन करके बीमारी की जानकारी भी दी गई।
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झांसी। मेडिकल कॉलेज के रक्तकोष में रक्तदान करने वालों के नमूने की नेट जांच के लिए अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज भेजा जाता है। रोजाना औसतन 15 नमूने अलीगढ़ भेजे जाते हैं। वहां से अगले दिन रिपोर्ट आती है। रिपोर्ट में सबकुछ ठीक मिलने पर ही रक्त मरीजों को चढ़ाया जाता है। जबकि, किसी तरह के वायरस/बीमारी की पुष्टि होने पर रक्त को नष्ट कर दिया जाता है।
झांसी मेडिकल कॉलेज के एक अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 तक के आंकड़े देखें तो साल भर में 5376 नमूने जांच के लिए अलीगढ़ भेजे गए। इनमें से 119 मरीजों में हेपेटाइटिस बी की पुष्टि हुई है। जबकि, आठ रोगी हेपेटाइटिस सी के मिले हैं। तीन लोग एचआईवी संक्रमित मिले हैं। रैपिड किट, एलाइजा की तुलना में नेट टेस्ट से वायरस की जल्दी पहचान हो जाती है। ऐसे में जरूरतमंद मरीज को संक्रमित व्यक्ति का खून नहीं चढ़ पाता है और वह संक्रमित होने से बच जाता है। बताया गया कि सामान्य विधि से जांच में हेपेटाइटिस-सी बीमारी पता लगाने में 60 दिन लगा सकते हैं। वहीं, नेट में चौथे दिन ही पकड़ में आ सकता है।
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रैपिड किट, एलाइजा और नेट से हेपेटाइटिस बी व सी, एचआईवी और वायरस जनित रोगों की जांच की जा सकती है। इसमें नेट सबसे आधुनिक विधि है। इससे वायरस की जल्दी पहचान हो जाती है और दूसरों को खून नहीं चढ़ पाता है। जिले में सिर्फ झांसी मेडिकल कॉलेज की ब्लड बैंक ही नमूनों का न्यूक्लिक एसिड टेस्ट करवाती है। - डॉ. एमएल आर्य, ब्लड बैंक प्रभारी, मेडिकल कॉलेज।
फोन कर दी गई बीमारी जानकारी
रक्तदान के दौरान मरीज से फॉर्म भरवाया जाता है। इसमें उनका नाम, पता और मोबाइल नंबर भी होता है। नेट में एचआईवी और हेपेटाइटिस बी या सी बीमारी की पुष्टि होने के बाद उन रक्तदाताओं को मेडिकल कॉलेज के स्टाफ की ओर से फोन करके बीमारी की जानकारी भी दी गई।
| वायरस | सामान्य विधि | नेट |
| एचआईवी | 22 दिन | आठ दिन |
| हेपेटाइटिस-बी | 45 दिन | 16 दिन |
| हेपेटाइटिस-सी | 60 दिन | चार दिन |