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दतिया उपचुनाव: घनश्याम और आशुतोष में होगा दिलचस्प मुकाबला, एक को छवि का भरोसा तो दूसरे को सत्ता और संगठन का
Tue, 14 Jul 2026 08:28 AM IST
Anand Pawar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Tue, 14 Jul 2026 08:28 AM IST
सार
दतिया उपचुनाव में कांग्रेस ने पूर्व विधायक घनश्याम सिंह को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। उनकी साफ-सुथरी छवि, राजनीतिक अनुभव और सामाजिक समीकरणों के चलते उन्हें भाजपा के लिए मजबूत चुनौती माना जा रहा है।
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कांग्रेस ने घनश्याम सिंह को बनाया उम्मीदवार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने पूर्व विधायक और राजघराने से जुड़े घनश्याम सिंह पर दांव लगाकर मुकाबले को रोचक बना दिया है। भाजपा जहां पूर्व संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारकर संगठन और सरकार की ताकत के भरोसे चुनाव लड़ रही है, वहीं, कांग्रेस ने ऐसे उम्मीदवार को चुना है, जिसकी पहचान शांत, मृदुभाषी और बेदाग छवि वाले नेता के रूप में रही है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या घनश्याम सिंह भाजपा के लिए "साइलेंट चैलेंजर" साबित होंगे।
घनश्याम सिंह का राजनीतिक रिकॉर्ड भी उन्हें मजबूत दावेदार बनाता है। कांग्रेस ने उन्हें पहली बार 1993 के विधानसभा चुनाव में दतिया से उम्मीदवार बनाया था। उस चुनाव में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को 10 हजार से ज्यादा मतों से हराया था। इसके बाद 2003 के विधानसभा चुनाव में, जब पूरे प्रदेश में कांग्रेस सिर्फ 38 सीटों पर सिमट गई थी, तब भी घनश्याम सिंह ने दतिया सीट पर भाजपा के अवधेश नायक को 2,904 मतों से हराकर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की। हालांकि, 2008 में उन्हें भाजपा के डॉ. नरोत्तम मिश्रा से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस ने 2018 में उन्हें अनारक्षित सेंवढ़ा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया, जहां उन्होंने भाजपा के राधेलाल बघेल को 33,268 मतों के बड़े अंतर से हराया। 2023 के चुनाव में वे सेवढ़ा से भाजपा के प्रदीप अग्रवाल के खिलाफ 2,558 मतों से हार गए, लेकिन चुनावी राजनीति में उनकी सक्रियता बनी रही।
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कांग्रेस ने इसलिए लगाया दांव
कांग्रेस का मानना है कि घनश्याम सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत छवि है। उन्हें सहज, सरल और सभी वर्गों से संवाद रखने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। राजनीतिक विरोधियों के साथ भी उनके सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं और उन पर बड़े विवादों का कोई दाग नहीं है। सेवढ़ा से विधायक रहने के बावजूद उन्होंने दतिया क्षेत्र में लगातार सक्रियता बनाए रखी, जिससे उनका स्थानीय जनसंपर्क कमजोर नहीं पड़ा।
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10 हजार क्षत्रिय वोट
सामाजिक समीकरण भी कांग्रेस के फैसले की अहम वजह माने जा रहे हैं। घनश्याम सिंह क्षत्रिय समाज से आते हैं। दतिया विधानसभा क्षेत्र में लगभग 10 हजार क्षत्रिय मतदाता बताए जाते हैं। इसके अलावा ओबीसी मतदाताओं के बीच भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। व्यापारिक वर्ग और पारंपरिक मतदाताओं में भी उनकी स्वीकार्यता को कांग्रेस अपनी ताकत मान रही है। उनके पिता कृष्ण सिंह भी एक बार दतिया-भिंड से सांसद रहे हैं।
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भाजपा के लिए इसलिए बढ़ी चुनौती
दूसरी ओर भाजपा शुरुआत में टिकट को लेकर असंतोष से जूझती रही। पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद कार्यकर्ताओं की नाराजगी सामने आई। हालांकि, पार्टी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह और स्वयं नरोत्तम मिश्रा को एक मंच पर लाकर एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की। पर राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नरोत्तम के समर्थकों को एक मंच पर लाना अब पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती होगी। भाजपा का चुनावी अभियान केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, संगठन की मजबूती तथा दतिया में हुए विकास कार्यों पर केंद्रित है। वहीं कांग्रेस स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और सामाजिक समीकरणों के सहारे मुकाबले को रोचक बनाने की कोशिश कर रही है।
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घनश्याम सिंह का राजनीतिक रिकॉर्ड भी उन्हें मजबूत दावेदार बनाता है। कांग्रेस ने उन्हें पहली बार 1993 के विधानसभा चुनाव में दतिया से उम्मीदवार बनाया था। उस चुनाव में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को 10 हजार से ज्यादा मतों से हराया था। इसके बाद 2003 के विधानसभा चुनाव में, जब पूरे प्रदेश में कांग्रेस सिर्फ 38 सीटों पर सिमट गई थी, तब भी घनश्याम सिंह ने दतिया सीट पर भाजपा के अवधेश नायक को 2,904 मतों से हराकर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की। हालांकि, 2008 में उन्हें भाजपा के डॉ. नरोत्तम मिश्रा से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस ने 2018 में उन्हें अनारक्षित सेंवढ़ा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया, जहां उन्होंने भाजपा के राधेलाल बघेल को 33,268 मतों के बड़े अंतर से हराया। 2023 के चुनाव में वे सेवढ़ा से भाजपा के प्रदीप अग्रवाल के खिलाफ 2,558 मतों से हार गए, लेकिन चुनावी राजनीति में उनकी सक्रियता बनी रही।
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कांग्रेस ने इसलिए लगाया दांव
कांग्रेस का मानना है कि घनश्याम सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत छवि है। उन्हें सहज, सरल और सभी वर्गों से संवाद रखने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। राजनीतिक विरोधियों के साथ भी उनके सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं और उन पर बड़े विवादों का कोई दाग नहीं है। सेवढ़ा से विधायक रहने के बावजूद उन्होंने दतिया क्षेत्र में लगातार सक्रियता बनाए रखी, जिससे उनका स्थानीय जनसंपर्क कमजोर नहीं पड़ा।
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10 हजार क्षत्रिय वोट
सामाजिक समीकरण भी कांग्रेस के फैसले की अहम वजह माने जा रहे हैं। घनश्याम सिंह क्षत्रिय समाज से आते हैं। दतिया विधानसभा क्षेत्र में लगभग 10 हजार क्षत्रिय मतदाता बताए जाते हैं। इसके अलावा ओबीसी मतदाताओं के बीच भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। व्यापारिक वर्ग और पारंपरिक मतदाताओं में भी उनकी स्वीकार्यता को कांग्रेस अपनी ताकत मान रही है। उनके पिता कृष्ण सिंह भी एक बार दतिया-भिंड से सांसद रहे हैं।
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