{"_id":"6745921a33bb3933db0720fa","slug":"jain-chief-secretary-and-kailash-makwana-dgp-defeat-in-vijaypur-by-election-mean-2024-11-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"सत्ता और सियासत: सही साबित होगा सीएम का फैसला? संघ के प्रांत प्रचारक का कमाल, महाराष्ट्र में चौकड़ी का दबदबा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सत्ता और सियासत: सही साबित होगा सीएम का फैसला? संघ के प्रांत प्रचारक का कमाल, महाराष्ट्र में चौकड़ी का दबदबा
विज्ञापन
सार
MP Power and politics: महाराष्ट्र चुनाव के तीन महीने पहले जब विदर्भ के 9 जिलों की कमान मध्यप्रदेश के चार नेताओं कैलाश विजयवर्गीय, डॉ. नरोत्तम मिश्रा, प्रहलाद पटेल और विश्वास सारंग को सौंपी गई थी, तब विजयवर्गीय ने कहा था कि महाराष्ट्र की सत्ता का रास्ता विदर्भ से ही निकलेगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही।
क्या कहती है मप्र की सियासत, पढ़ें कॉलम
- फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
विस्तार
आधा काम तो इनसे आसान हो जाएगा
Trending Videos
पहले अनुराग जैन को मुख्य सचिव और अब कैलाश मकवाना को डीजीपी बनाकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपना आधा काम तो यूं ही आसान कर लिया। मुख्य सचिव से तो नतीजे भी मिलना शुरू हो गए हैं और 1 जनवरी से डीजीपी का दायित्व संभालने वाले मकवाना का आदेश जारी होने के बाद से जिस तरह की प्रतिक्रिया सामने आ रही है उससे ऐसा लग रहा है कि मुख्यमंत्री का यह चयन भी सही साबित होने वाला है। प्रशासन और पुलिस जैसे दो अहम मोर्चों पर इन दो काबिल अफसरों की मौजूदगी का सीधा फायदा सरकार को ही मिलना है। मध्यप्रदेश का पुराना इतिहास उठाकर देखें तो जिस भी मुख्यमंत्री को अच्छे मुख्य सचिव और डीजीपी मिले उसकी आधी परेशानी यूं की कम हो गई। देखते हैं इस बार क्या होता है।
संघ के नए प्रांत प्रचारक ने सबको लाइन पर ला दिया
जब से राजमोहन संघ के मालवा प्रांत के प्रांत प्रचारक बने हैं, सब लाइन पर आ गए हैं। मतलब यह है कि संघ की तय व्यवस्था के मुताबिक कामकाज होने लगा है। पुराने प्रांत प्रचारक बलिराम पटेल के दौर में संघ के कई पदाधिकारी तय व्यवस्था से इतर भी सक्रिय रहने लगे थे। नए प्रांत प्रचारक को पहले दो महीने में ही संघ पदाधिकारियों की नेतागिरी पता चल गई। धीरे-धीरे सबको यह अहसास करवा दिया गया कि यह सब चलेगा नहीं। इसके बाद जिम्मेदार लोगों को भी समझ आ गया कि जो पहले चलता था, वह अब नहीं चलने वाला। संघ के प्रांत मुख्यालय सुदर्शन भवन का नजारा भी अब बदला-बदला सा है। प्रांत प्रचारक के कड़े रुख ने यहां 'राजनीति' बंद सी करवा दी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
महाराष्ट्र में मध्यप्रदेश की चौकड़ी का दबदबा
महाराष्ट्र चुनाव के तीन महीने पहले जब विदर्भ के 9 जिलों की कमान मध्यप्रदेश के चार नेताओं कैलाश विजयवर्गीय, डॉ. नरोत्तम मिश्रा, प्रहलाद पटेल और विश्वास सारंग को सौंपी गई थी, तब विजयवर्गीय ने कहा था कि महाराष्ट्र की सत्ता का रास्ता विदर्भ से ही निकलेगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही। चारों नेताओं ने जमकर मेहनत की और स्थानीय व प्रवासी नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच ऐसा तालमेल जमाया कि संघ के गढ़ नागपुर सहित सभी 9 जिलों में विरोधी चारों खाने चित्त हो गए। स्वाभाविक है इस जीत से चारों नेताओं का कद तो बढऩा तय है ही, मध्यप्रदेश की राजनीति में भी इसका असर देखने को मिलेगा।
कई मायने हैं विजयपुर की हार के
विजयपुर उपचुनाव में वन मंत्री रामनिवास रावत की हार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली से सवाल-जवाब होना तय है। चुनाव में रावत की जीत के लिए पूरी ताकत झोंकने वाले विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के साथ ही इस क्षेत्र में 10 चुनावी सभाएं लेने वाले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर ऐसा कैसे हो गया। ऐसा ही कुछ प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा के दिमाग में भी आ रहा होगा। बहरहाल, इंतजार रावत के मुंह खोलने का है और यदि उन्होंने चुनाव से दूरी बनाए रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों को निशाने पर ले लिया तो फिर किसी को कुछ बोलने की जरूरत नहीं रहेगी।
इन्हें कंट्रोल करना किसी के बस की बात नहीं
मध्यप्रदेश में एक बात इन दिनों आम हो चुकी है, वह यह कि मुख्यमंत्री मंत्रियों पर नियंत्रण रख सकते हैं, नौकरशाहों को उनकी हैसियत बता सकते हैं, लेकिन मंत्रियों के तैनात स्टॉफ पर कंट्रोल किसी के बस की बात नहीं। प्रदेश में एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों को उनके ओएसडी और पीए चला रहे हैं। इसकी जानकारी 'सरकार' और संगठन प्रमुख दोनों को है, लेकिन बावजूद इसके इन्हें कोई कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। प्रदेश के एक उपमुख्यमंत्री और राजधानी से वास्ता रखने वाली एक मंत्री का स्टाफ इस सूची में नंबर वन पर है।
सबकी निगाहें हैं निशांत खरे की भविष्य की भूमिका पर
डॉ. निशांत खरे भले ही ऐनवक्त पर इंदौर के महापौर पद के लिए भाजपा का टिकट पाने से वंचित रह गए हों, लेकिन इन तीन साल में भाजपा संगठन में एक रणनीतिकार के रूप में तो उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। महाराष्ट्र के चुनाव में उन्हें मुंबई में तैनात कर उत्तर महाराष्ट्र की 48 सीट के साथ ही सभी 25 आदिवासी सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। कभी संघ में अहम भूमिका में रहे खरे ने जो रणनीति बनाई और मैदान में असरकारक क्रियान्वयन करवाया, उसका नतीजे अब सामने हैं। 25 में से 21 आदिवासी सीट पर महायुति के उम्मीदवार जीते और इनमें से भी तीन एक लाख से ज्यादा वोट से। उत्तर महाराष्ट्र में भाजपा ने रिकार्डतोड़ सफलता हासिल की। स्वाभाविक है इन नतीजों ने डॉ. खरे को भाजपा में मजबूत किया है। अब सबकी निगाहें उनकी भविष्य की भूमिका पर हैं।
चलते-चलते
तेजतर्रार आईपीएस अफसर अजय शर्मा सबकी पसंद होने के बावजूद मध्यप्रदेश के डीजीपी क्यों नहीं बन पाए, इसका जवाब प्रशासनिक और पुलिस दोनों हलकों में ढूंढा जा रहा है। इस पद के सबसे ज्यादा चर्चा में शर्मा का ही नाम था। परेशान वे तमाम लोग भी हैं, जिन्होंने शर्मा के डीजीपी बनने की संभावना के मद्देनजर हाथ-पांव मारना शुरू कर दिए थे। इन लोगों को यह भी मालूम है कि कैलाश मकवाना के डीजीपी रहते हुए इनके मंसूबे कभी पूरे होने वाले नहीं हैं।
पुछल्ला
इंदौर में कलेक्टर रहे आईएएस अफसर विवेक अग्रवाल इन दिनों दिल्ली में अहम भूमिका में हैं। वे जब मध्यप्रदेश में थे, तब भी उनकी तूती बोलती थी। अफसरों की एक बड़ी लॉबी तब भी उनका विरोध करती थी और आज भी। अंदरखाने की खबर यह है कि इसी लॉबी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने इंदौर के बीआरटीएस का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया कि मुख्यमंत्री को इंदौर में ही इसे हटाने की घोषणा करना पड़ी। वह भी उस समय जब इंदौर में विदेश मंत्रालय का एक बड़ा आयोजन होने वाला था, जिसके सारे सूत्र अग्रवाल के हाथों में ही थे।

कमेंट
कमेंट X