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UCC: एमपी में 2023 के बाद फिर यूसीसी की तैयारी, गुजरात के बाद तेज हुई कवायद; चुनौतियां भी कम नहीं
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Wed, 08 Apr 2026 11:43 AM IST
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सार
मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। गुजरात में यूसीसी बिल पास होने और भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं के असम में दिए बयान के बाद प्रदेश में इसकी तैयारी फिर शुरू की गई है।
मध्य प्रदेश में यूसीसी की कवायद तेज
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। वर्ष 2023 से पहले भी इस दिशा में प्रयास शुरू हुए थे, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ पाया। अब गुजरात विधानसभा में मार्च 2026 में यूसीसी विधेयक पारित होने और असम चुनाव में इसे लेकर दिए गए राजनीतिक संकेतों के बाद प्रदेश में भी प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ ली है। भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख मुद्दों में राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और यूसीसी लंबे समय से शामिल रहे हैं। पार्टी इसे राष्ट्रीय एकता, समानता और महिला सशक्तिकरण से जोड़कर देखती है।
मध्यप्रदेश में फिलहाल यूसीसी को लेकर ड्राफ्टिंग और अध्ययन का काम तेज हो रहा है। मध्यप्रदेश में मानसून सत्र या उसके बाद विधानसभा में विधेयक पेश किया जा सकता है। हालांकि, कानून बनाना जितना महत्वपूर्ण होगा, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण उसका जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन होगा।
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2029 से पहले भाजपा शासित राज्यों में लागू करने की रणनीति
भाजपा अब यूसीसी को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की रणनीति पर काम कर रही है। बताया जा रहा है कि इसके लिए केंद्र से सभी भाजपा शासित राज्यों को कहा गया है। लक्ष्य यह माना जा रहा है कि 2029 लोकसभा चुनाव से पहले अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू किया जाए। स्वतंत्र भारत में उत्तराखंड में सबसे पहले यूसीसी लागू किया गया है। यहां पर विधानसभा में 2024 में विधेयक पारित किया गया और 2025 में लागू किया गया। मार्च 2026 में गुजरात विधानसभा में बिल पास किया गया।
ये भी पढ़ें- MP News: मध्य प्रदेश में UCC की तैयारी तेज, 2026 के मानसून सत्र में विधेयक ला सकती है मोहन सरकार
एमपी में पहले भी शुरू हुई थी प्रक्रिया
प्रदेश में यूसीसी को लेकर पहल नई नहीं है। 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ड्राफ्ट तैयार करने के लिए कमेटी बनाने की बात कही थी, लेकिन मामला चर्चा में आने के बाद ठंडे बस्ते में चला गया। फिर 2023 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद कवायद शुरू हुई, लेकिन प्रारंभिक स्तर पर ही चर्चा और तैयारी तक सीमित रही, कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। अब एक बार फिर गृह विभाग के स्तर पर ड्राफ्ट तैयार करने की प्रक्रिया को गति दी जा रही है। इसके लिए उत्तराखंड और गुजरात के मॉडल का अध्ययन करने को कहा गया है।
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भाजपा के कोर एजेंडे का हिस्सा
राम मंदिर, धारा-370 के साथ ही यूसीसी भाजपा की केंद्र सरकार के कोर एजेंडे का हिस्सा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह कई मंचों से इसे संविधान की भावना बताते हुए लागू करने की बात कह चुके हैं। अप्रैल 2024 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मध्य प्रदेश में यूसीसी को प्रधानमंत्री मोदी की गारंटी बताया था। हाल ही में असम चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने यूसीसी लागू करने का वादा किया है, जिसके बाद इसकी चर्चा फिर तेज हो गई है।
प्रदेश में लागू करना चुनौतीपूर्ण?
मध्यप्रदेश में यूसीसी लागू करना आसान नहीं माना जा रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ कानून हैं। यहां सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता है। वहीं, प्रदेश की कुल आबादी के 22 प्रतिशत आदिवासी वर्ग पर प्रभाव की आशंका है। इससे राजनीतिक नुकसान की संभावना भी है। हालांकि, उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों में आदिवासी समुदाय को इस कानून से छूट दी गई है। इसी मॉडल को एमपी में भी अपनाने की संभावना जताई जा रही है।
क्या है यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया?
यूसीसी लागू करने के लिए सरकार को कई चरणों से गुजरना होता है। इसके लिए राज्य स्तर पर विशेषज्ञों की कमेटी का गठन किया जाता है। इसमें विभिन्न धार्मिक कानूनों का अध्ययन करने के लिए अलग-अलग विशेषज्ञों को शामिल किया जाता है। यह कमेटी विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों का अध्ययन करती है और फिर ड्राफ्ट तैयार करती है। इसके बाद अंतिम ड्राफ्ट को कैबिनेट से मंजूरी के बाद विधानसभा में पेश किया जाता है, जहां से पारित होने के बाद यह कानून बनता है।
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2029 से पहले भाजपा शासित राज्यों में लागू करने की रणनीति
भाजपा अब यूसीसी को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की रणनीति पर काम कर रही है। बताया जा रहा है कि इसके लिए केंद्र से सभी भाजपा शासित राज्यों को कहा गया है। लक्ष्य यह माना जा रहा है कि 2029 लोकसभा चुनाव से पहले अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू किया जाए। स्वतंत्र भारत में उत्तराखंड में सबसे पहले यूसीसी लागू किया गया है। यहां पर विधानसभा में 2024 में विधेयक पारित किया गया और 2025 में लागू किया गया। मार्च 2026 में गुजरात विधानसभा में बिल पास किया गया।
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एमपी में पहले भी शुरू हुई थी प्रक्रिया
प्रदेश में यूसीसी को लेकर पहल नई नहीं है। 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ड्राफ्ट तैयार करने के लिए कमेटी बनाने की बात कही थी, लेकिन मामला चर्चा में आने के बाद ठंडे बस्ते में चला गया। फिर 2023 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद कवायद शुरू हुई, लेकिन प्रारंभिक स्तर पर ही चर्चा और तैयारी तक सीमित रही, कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। अब एक बार फिर गृह विभाग के स्तर पर ड्राफ्ट तैयार करने की प्रक्रिया को गति दी जा रही है। इसके लिए उत्तराखंड और गुजरात के मॉडल का अध्ययन करने को कहा गया है।
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भाजपा के कोर एजेंडे का हिस्सा
राम मंदिर, धारा-370 के साथ ही यूसीसी भाजपा की केंद्र सरकार के कोर एजेंडे का हिस्सा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह कई मंचों से इसे संविधान की भावना बताते हुए लागू करने की बात कह चुके हैं। अप्रैल 2024 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मध्य प्रदेश में यूसीसी को प्रधानमंत्री मोदी की गारंटी बताया था। हाल ही में असम चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने यूसीसी लागू करने का वादा किया है, जिसके बाद इसकी चर्चा फिर तेज हो गई है।
प्रदेश में लागू करना चुनौतीपूर्ण?
मध्यप्रदेश में यूसीसी लागू करना आसान नहीं माना जा रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ कानून हैं। यहां सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता है। वहीं, प्रदेश की कुल आबादी के 22 प्रतिशत आदिवासी वर्ग पर प्रभाव की आशंका है। इससे राजनीतिक नुकसान की संभावना भी है। हालांकि, उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों में आदिवासी समुदाय को इस कानून से छूट दी गई है। इसी मॉडल को एमपी में भी अपनाने की संभावना जताई जा रही है।
क्या है यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया?
यूसीसी लागू करने के लिए सरकार को कई चरणों से गुजरना होता है। इसके लिए राज्य स्तर पर विशेषज्ञों की कमेटी का गठन किया जाता है। इसमें विभिन्न धार्मिक कानूनों का अध्ययन करने के लिए अलग-अलग विशेषज्ञों को शामिल किया जाता है। यह कमेटी विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों का अध्ययन करती है और फिर ड्राफ्ट तैयार करती है। इसके बाद अंतिम ड्राफ्ट को कैबिनेट से मंजूरी के बाद विधानसभा में पेश किया जाता है, जहां से पारित होने के बाद यह कानून बनता है।

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