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3 कुलपति 3 बड़े विवाद फिर भी नहीं बदली RGPV की तस्वीर: करोड़ों के घोटाले से नैक फर्जीवाड़ा और प्रश्नपत्र चोरी

Wed, 08 Jul 2026 05:29 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari Sandeep Kumar Tiwari
Updated Wed, 08 Jul 2026 05:29 PM IST
सार

दो वर्षों में तीन कुलपति बदलने के बावजूद राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय विवादों से नहीं उबर सका। वित्तीय घोटाले, नैक विवाद के बाद अब प्रश्नपत्र चोरी का मामला सामने आने से विश्वविद्यालय की व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

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Three Vice-Chancellors, three major controversies, yet the face of RGPV remains unchanged: from multi-crore sc
पूर्व कुलपित सुनील गुप्ता, राजीव त्रिपाठी और कुलपित आलोक शर्मा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश के लाखों इंजीनियरिंग, फार्मेसी, वास्तुकला, प्रबंधन और पॉलिटेक्निक विद्यार्थियों का भविष्य तय करने वाला राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय एक बार फिर सुर्खियों में है। पिछले दो वर्षों में विश्वविद्यालय ने तीन कुलपति देखे, लेकिन हर बार किसी न किसी बड़े विवाद ने संस्थान की साख को झटका दिया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर नेतृत्व बदलने के बावजूद विश्वविद्यालय की कार्यशैली क्यों नहीं बदल रही।
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पहला झटका: 19.48 करोड़ रुपये का वित्तीय घोटाला
विश्वविद्यालय का सबसे चर्चित मामला 19.48 करोड़ रुपये के वित्तीय घोटाले का रहा। इस मामले में तत्कालीन कुलपति प्रो. सुनील कुमार गुप्ता को 11 अप्रैल 2024 को भोपाल पुलिस ने रायपुर से गिरफ्तार किया था। अगले दिन उन्हें अदालत में पेश कर जेल भेजा गया। बाद में मई 2024 में उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। इस मामले ने विश्वविद्यालय की वित्तीय पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।
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दूसरा विवाद: नैक ग्रेडिंग में कथित फर्जीवाड़ा
वित्तीय घोटाले के बाद विश्वविद्यालय की कमान प्रो. राजीव त्रिपाठी के हाथों में आई। नवंबर 2025 में विश्वविद्यालय पर राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद की स्व-अध्ययन रिपोर्ट में कथित रूप से गलत और भ्रामक जानकारी देकर सर्वोच्च ए प्लस प्लस ग्रेड हासिल करने के आरोप लगे। इस मुद्दे पर छात्र संगठनों, विशेषकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, ने लगातार आंदोलन किया। बढ़ते विरोध और अकादमिक पारदर्शिता पर उठे सवालों के बीच प्रो. त्रिपाठी ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
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लंबे इंतजार के बाद हुई तीसरे कुलपति की नियुक्ति
नैक विवाद के बाद लंबे समय तक नियमित कुलपति की नियुक्ति का इंतजार रहा। आखिरकार मई 2026 में राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने प्रो. आलोक शर्मा को चार वर्ष के लिए विश्वविद्यालय का नया कुलपति नियुक्त किया। इससे पहले वे ग्वालियर स्थित भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान के निदेशक थे। सरकार ने उन्हें विश्वविद्यालय में हुए करोड़ों रुपये के घोटाले के बाद व्यवस्था सुधारने और संस्थान की साख बहाल करने की जिम्मेदारी सौंपी थी।

नई नियुक्ति के कुछ ही समय बाद प्रश्नपत्र चोरी
नए कुलपति के पदभार संभालने के कुछ ही समय बाद विश्वविद्यालय एक और बड़े विवाद में घिर गया। विश्वविद्यालय शिक्षण विभाग में स्नातकोत्तर परीक्षाओं के नौ विषयों के सीलबंद प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही गायब हो गए। मामला सामने आते ही परीक्षाएं स्थगित करनी पड़ीं। विश्वविद्यालय ने पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई, आंतरिक जांच समिति बनाई और परीक्षा नियंत्रक से जवाब तलब किया। इस घटना ने नए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

तीन कुलपति, लेकिन नहीं बदली व्यवस्था
पिछले दो वर्षों में विश्वविद्यालय में तीन अलग-अलग कुलपति रहे। पहले कार्यकाल में वित्तीय घोटाला सामने आया, दूसरे कार्यकाल में नैक ग्रेडिंग विवाद हुआ और अब तीसरे कुलपति के कार्यकाल में प्रश्नपत्र चोरी जैसी गंभीर घटना सामने आ गई। लगातार बदलते नेतृत्व के बावजूद विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रणाली, प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।

लाखों विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर
राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से प्रदेश के सैकड़ों इंजीनियरिंग, फार्मेसी, वास्तुकला, प्रबंधन और पॉलिटेक्निक महाविद्यालय संबद्ध हैं। विश्वविद्यालय की हर प्रशासनिक चूक का सीधा असर लाखों विद्यार्थियों की परीक्षा, परिणाम, डिग्री और रोजगार पर पड़ता है। यही वजह है कि लगातार सामने आ रहे विवादों ने छात्रों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है।


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अब कार्रवाई से तय होगी साख
प्रश्नपत्र चोरी मामले की पुलिस और विश्वविद्यालय स्तर पर जांच जारी है। लेकिन इससे पहले भी कई मामलों में जांच तो हुई, पर उनके नतीजों और दोषियों पर कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब शिक्षा जगत और विद्यार्थियों की नजर इस बात पर है कि क्या इस बार केवल जांच होगी या फिर जिम्मेदार लोगों पर ऐसी कार्रवाई होगी, जिससे विश्वविद्यालय की व्यवस्था में वास्तव में स्थायी सुधार दिखाई दे।
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