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Hoshangabad: सिकलसेल का फैलाव रोकने सारिका घारू चलाएंगी जागरूकता अभियान, बिना दक्षिणा के सिखाएंगी कुंडली मिलान
Mon, 30 May 2022 11:57 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, होशंगाबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, होशंगाबाद
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Mon, 30 May 2022 11:57 AM IST
सार
होशंगाबाद जिले की विज्ञान प्रसारक सारिका सिकलसेल के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए स्वैच्छित जागरूकता अभियान चलाएंगी। सारिका घारू जनजातीय टोलों में बिना दक्षिणा के लोगों को विवाह पूर्व सिकलसेल वैज्ञानिक कुंडली मिलान सिखाएंगी।
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सारिका घारू चलाएंगी सिकलसेल जागरूकता अभियान।
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
होशंगाबाद जिले की विज्ञान प्रसारक सारिका सिकलसेल के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए स्वैच्छित जागरूकता अभियान चलाएंगी। सारिका घारू जनजातीय टोलों में बिना दक्षिणा के लोगों को विवाह पूर्व सिकलसेल वैज्ञानिक कुंडली मिलान सिखाएंगी। आमतौर पर हिन्दू परिवारों में विवाह पूर्व जन्म कुंडली मिलान पर विश्वास किया जाता है।
इन्हीं प्रयासों के पहले चरण में सारिका ने 7 गीतों का वीडियो एल्बम तैयार किया है। इस एल्बम एवं जागरूकता गतिविधियों की जानकारी सारिका ने आल इंडिया इंस्टीटयूट ऑफ मेडिकल साइंसेस एम्स नई दिल्ली के डायरेक्टर प्रोफेसर रणदीप गुलेरिया को भेंट की। डॉ रणदीप गुलेरिया ने सारिका के गीतों के अवलोकन के बाद कहा कि ये वीडियो गीत आम लोगों में सिकलसेल के कारण, लक्षण एवं बचाव के उपायों को सरल तरीके से पहुंचा सकेंगे।
सारिका ने कहा कि यह किसी वायरस, मच्छर या गंदगी से होने वाली संक्रामक बीमारी नहीं है। यह सिर्फ बीमार माता-पिता से बच्चों में अनुवांशिक रूप से जाती है। विवाह एवं बच्चे जन्म के पहले जागरूकता के द्वारा इस बीमारी की रोकथाम 100 प्रतिशत की जा सकती है। आदिवासी बहुल जिलों में फैले इस जन्मजात रोग के फैलाव को कम करने के लिये किये जा रहे बड़े प्रयासों के साथ अपना एक स्वैच्छिक योगदान दे रही हैं। वे 1 जून से मध्य प्रदेश के 22 प्रभावित जिलों में अपने खर्च पर जाकर जागरूकता का कार्य करेंगी। ये वीडियो एल्बम भी उन्होंने अपने खर्च पर तैयार किया है।
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सारिका ने बताया कि सिकल सेल रोगी दो प्रकार के होते हैं - एक रोगी और दूसरा वाहक। यदि माता-पिता दोनों सिकल सेल रोगी हैं, तो उनके सभी बच्चे सिकल सेल रोगी होंगे। अगर माता-पिता में से एक रोगी और दूसरा सामान्य है तो बच्चे रोग वाहक होंगे। अतः सिकल सेल रोगी या वाहक किसी सामान्य पार्टनर से विवाह करेगा, तो इस रोग का फैलाव रोका जा सकता है।
सिकलसेल के लक्षण
सारिका ने बताया कि इस जन्मजात बीमारी में रेड ब्लड सेल कठोर और चिपचिपी हो जाती हैं और उनका आकार गोल न होकर हंसिया या सिकल की तरह हो जाता है। ये जल्दी नष्ट हो जाती हैं कई बार धमनियों में जम कर रक्त प्रवाह में रूकावट करती हैं जो कि दर्द के साथ जानलेवा भी हो जाता है। बीमारी का पता जन्म के एक साल के अंदर ही लग जाता है। संक्रमण, सीने में दर्द, जोड़ों में दर्द जैसे लक्षण दिखने लगते हैं।
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इन्हीं प्रयासों के पहले चरण में सारिका ने 7 गीतों का वीडियो एल्बम तैयार किया है। इस एल्बम एवं जागरूकता गतिविधियों की जानकारी सारिका ने आल इंडिया इंस्टीटयूट ऑफ मेडिकल साइंसेस एम्स नई दिल्ली के डायरेक्टर प्रोफेसर रणदीप गुलेरिया को भेंट की। डॉ रणदीप गुलेरिया ने सारिका के गीतों के अवलोकन के बाद कहा कि ये वीडियो गीत आम लोगों में सिकलसेल के कारण, लक्षण एवं बचाव के उपायों को सरल तरीके से पहुंचा सकेंगे।
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सारिका ने कहा कि यह किसी वायरस, मच्छर या गंदगी से होने वाली संक्रामक बीमारी नहीं है। यह सिर्फ बीमार माता-पिता से बच्चों में अनुवांशिक रूप से जाती है। विवाह एवं बच्चे जन्म के पहले जागरूकता के द्वारा इस बीमारी की रोकथाम 100 प्रतिशत की जा सकती है। आदिवासी बहुल जिलों में फैले इस जन्मजात रोग के फैलाव को कम करने के लिये किये जा रहे बड़े प्रयासों के साथ अपना एक स्वैच्छिक योगदान दे रही हैं। वे 1 जून से मध्य प्रदेश के 22 प्रभावित जिलों में अपने खर्च पर जाकर जागरूकता का कार्य करेंगी। ये वीडियो एल्बम भी उन्होंने अपने खर्च पर तैयार किया है।
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सारिका ने बताया कि सिकल सेल रोगी दो प्रकार के होते हैं - एक रोगी और दूसरा वाहक। यदि माता-पिता दोनों सिकल सेल रोगी हैं, तो उनके सभी बच्चे सिकल सेल रोगी होंगे। अगर माता-पिता में से एक रोगी और दूसरा सामान्य है तो बच्चे रोग वाहक होंगे। अतः सिकल सेल रोगी या वाहक किसी सामान्य पार्टनर से विवाह करेगा, तो इस रोग का फैलाव रोका जा सकता है।
सिकलसेल के लक्षण
सारिका ने बताया कि इस जन्मजात बीमारी में रेड ब्लड सेल कठोर और चिपचिपी हो जाती हैं और उनका आकार गोल न होकर हंसिया या सिकल की तरह हो जाता है। ये जल्दी नष्ट हो जाती हैं कई बार धमनियों में जम कर रक्त प्रवाह में रूकावट करती हैं जो कि दर्द के साथ जानलेवा भी हो जाता है। बीमारी का पता जन्म के एक साल के अंदर ही लग जाता है। संक्रमण, सीने में दर्द, जोड़ों में दर्द जैसे लक्षण दिखने लगते हैं।
