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Holi 2026: करीब 300 वर्षों से इंदौर के राजवाड़ा के सम्मुख हो रहा होलिका दहन, पहले थी राजसी परंपरा; अब सरकारी

Kamlesh Sen कमलेश सेन
Updated Mon, 02 Mar 2026 07:59 AM IST
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सार

राजवाड़ा पर करीब 300 साल पुरानी होलिका दहन परंपरा 2 मार्च को फिर निभाई जाएगी। मल्हारराव होलकर काल से चली आ रही यह सरकारी होली, गौ-काष्ठ से गोधूलि वेला में राजपरिवार की पूजा के साथ संपन्न होगी।

Holi 2026: Holika Dahan has been taking place in front of the Rajwada for nearly 300 years news in hindi
होलिका दहन आज - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

ऐतिहासिक राजवाड़ा करीब 300 वर्षों से होलिका दहन का साक्षी बन रहा है। इस बार फिर 2 मार्च की शाम को यहां होलकर राजवंश की परंपरा के अनुसार होलिका दहन होगा। अब होलकर राजवंश के न वे राजा रहे और न ही उनकी रियासत, लेकिन सरकारी स्तर पर यह परंपरा जारी है। राजवाड़ा पर जलने वाली होली का इंतजाम सरकार की तरफ से होता है, इसीलिए इसे सरकारी होली भी कहा जाता है। इसकी प्रथम पूजा होलकर राजवंश के सदस्य उदय सिंह राव होलकर करेंगे, इसके बाद अन्य श्रद्धालु पूजन करेंगे।

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देशभर के राजमहलों और रजवाड़ों में होलिका दहन की गौरवशाली परंपरा रही है और कई स्थानों पर यह आज भी जारी है। महाराजा मल्हारराव होलकर के कार्यकाल (1728-1766) से राजवाड़ा के मुख्य द्वार के सामने गोधूलि वेला में होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई थी।
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290 से 300 साल पुराना सिलसिला
कुछ इतिहासकार राजवाड़ा के सामने होलिका दहन की परंपरा को 298 वर्ष प्राचीन मानते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रघुवीर सिंह के अनुसार गौतमा बाई साहब के इंदौर आने और राजवाड़े का निर्माण आरंभ होने के साथ ही यह परंपरा शुरू हुई होगी। इस तरह राजवाड़ा के सामने होलिका दहन की परंपरा करीब 290 से 300 वर्ष पुरानी है।
15 दिन चलता था होली उत्सव

राजवाड़े पर होलिका दहन का उत्सव राजशाही ठाठ से पंद्रह दिनों तक चलता था। राजवाड़े के अंदर रंग-बिरंगे मंडप लगाए जाते थे। गीत संगीत और आट्या-पाट्या खेल का आयोजन होता था। होल्कर नरेश, सरदार और दरबारी होलिका दहन के लिए बैंड-बाजे के साथ जाकर राजवाड़े के समीप स्थित मुदबक से अग्नि लाते थे और इसी अग्नि से होलिका दहन होता था। होली के दूसरे दिन वीर निकालने की परंपरा भी थी जो आजादी के बाद समाप्त हो गई।
दो दिन रहता था अवकाश

होल्कर राज्य एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट 1925 के अनुसार होलिकोत्सव पर होने वाला खर्च सरकारी कोषालय से किया जाता था। होली पर दो दिन राजकीय अवकाश रहता था। राज्य में होली उत्सव की भव्य परंपरा का उल्लेख 1907 में प्रकाशित कैप्टन सी. ई. लुआर्ड ने अपने इंदौर जिला गजेटियर में भी किया है। 1931 में एल.सी. धारीवाल के इंदौर स्टेट गजेटियर में उल्लेख है कि होलिका उत्सव सभी धर्म के लोग हिलमिल कर मनाते थे। यह पर्व आपसी प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता था। गौ काष्ठ की जलेगी होली राजवाड़े के सामने प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी सोमवार 2 मार्च को गोधूलि वेला में गौ-काष्ठ (कंडों) की होलिका का दहन होगा। इस कार्यक्रम को राज परिवार के राजपुरोहित द्वारा परंपरागत रूप से संपन्न करवाया जाता है। होलकर राज परिवार की ओर से पूजा में प्रतिनिधि सम्मिलित होता है।

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राजवाड़ा कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह
1728 में महाराजा मल्हारराव होलकर को इंदौर और आसपास की 12 महाल जागीर पुणे के पेशवा से प्राप्त हुए थे। मल्हारराव होलकर की पत्नी गौतमा बाई को 1734 में खासगी जागीर में अन्य स्थानों के साथ इंदौर की सनद मिली थी। इसमें मालवा और खानदेश के गांव शामिल थे। मल्हारराव होलकर की पत्नी गौतमबाई (द्वारिका बाई और बजाबाई उप-पत्नियां) ने इंदौर को अपना स्थाई निवास बनाया।

1734 के बाद इंदौर में प्रथम होलकर शासक मल्हारराव होलकर ने इंदौर में भव्य राजप्रासाद यानी महल बनाने का निर्णय लिया। इंदौर नगर का मध्य स्थल राजबाड़ा, होलकर रियासत के भवनों में प्रमुख रहा था। यह आज भी इंदौर की शान है। ऐसा माना जाता है कि 1734 से 1744 के मध्य राजबाड़ा का निर्माण आरंभ हुआ होगा। राजवाड़ा ने अपने निर्माण से पूर्ण होने तक कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1818 के बाद इसके निर्माण में गति आई थी।

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