{"_id":"68850294759cfa0352025ca7","slug":"50-thousand-rupees-fine-imposed-on-district-judge-for-making-baseless-allegations-jabalpur-news-c-1-1-noi1229-3214079-2025-07-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"Jabalpur News: जिला न्यायाधीश के विरुद्ध निरर्थक आरोप पर लगाने पर 50 हजार का जुर्माना, हाईकोर्ट का रवैया सख्त","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Jabalpur News: जिला न्यायाधीश के विरुद्ध निरर्थक आरोप पर लगाने पर 50 हजार का जुर्माना, हाईकोर्ट का रवैया सख्त
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Sun, 27 Jul 2025 08:39 AM IST
विज्ञापन
सार
मप्र हाईकोर्ट ने जिला जज पर शिकायत कर लंबित अपील को प्रभावित करने के प्रयास को गंभीर माना। याचिका खारिज कर 50 हजार का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने कहा, न्यायाधीशों पर दबाव बनाना निंदनीय है, शिकायतकर्ता को प्रशासनिक कार्रवाई में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
- फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
विस्तार
मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन व जस्टिस अमित सेठ की युगलपीठ ने जिला न्यायाधीश के विरुद्ध निरर्थक आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में प्रशासनिक स्तर पर शिकायत किए जाने के रवैये को गंभीरता से लिया है। युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता ने संबंधित न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की है। लंबित अपील के आदेश को प्रभावित करने उसकी तरफ से शिकायात पेश की गई है। युगलपीठ ने याचिकाकर्ता पर 50 हजार की कॉस्ट लगाते हुए उसे खारिज कर दिया।
Trending Videos
उमरिया निवासी याचिकाकर्ता रजनीश चतुर्वेदी की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि उसके विरुद्ध वर्ष 2015 में शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न करने का अपराध दर्ज किया गया था। प्रकरण की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने दो गवाहों को पक्ष-विरोधी घोषित कर दिया था। एक गवाह का प्रतिपरीक्षण नहीं हो पाया और उसकी मृत्यु हो गई। जिला जज ने आश्वासन दिया था कि बचाच पक्ष के किसी गवाह को पेश करना आवश्यक नहीं है। अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह ने उसे दोषी नहीं ठहराया है। इसके बावजूद दिसंबर 2022 को उसे धारा 294 तथा 506 के तहत दोषमुक्त करते हुए धारा 332 में सजा से दंडित कर दिया। इसके विरुद्ध उसने उमरिया जिला सत्र न्यायालय में अपील दायर की है। याचिकाकर्ता के अनुसार महिला जिला न्यायाधीश के विरुद्ध उसने फरवरी 2024 में हाईकोर्ट में शिकायत की थी। उसकी शिकायत को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा गया। उसे बताया गया कि मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर शिकायत को निरस्त कर दिया गया है। शिकायत को निरस्त किए जाने के कारण का कोई उल्लेख नहीं किया गया था। इसके कारण हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के न्यायदृष्टांतों हवाला देते हुए कहा गया कि शिकायत निरस्त किए जाने का उसके कारण का उल्लेख किया जाना आवश्यक है।
विज्ञापन
विज्ञापन
ये भी पढ़ें- बिजली विभाग ने तीन दिनों में काटे आठ हजार कनेक्शन, कोरोना काल के बाद भी नहीं चुकाए गए बिल
हाईकोर्ट ने सभी पहलुओं पर गौर करने के बाद अपने आदेश में कहा कि एक शिकायतकर्ता जिला न्यायाधीश से हुई गलती को हाईकोर्ट के ध्यान में लाकर केवल एक संदेशवाहक का काम करता है। शिकायतकर्ता की भूमिका हाईकोर्ट के समक्ष शिकायत प्रस्तुत होने के साथ ही समाप्त हो जाती है। जिला न्यायपालिका के न्यायाधीश के विरुद्ध प्रशासनिक पक्ष द्वारा कार्रवाई करना या न करना आंतरिक मसला है। शिकायतकर्ता को इस सिलसिले में आपत्ति उठाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट को अनुच्छेद-227 के तहत यह विशेषाधिकार प्राप्त है। हाईकोर्ट ही जिला न्यायपालिका के न्यायाधीश के विरुद्ध आरोपों की जांच और निर्णय कर सकता है।
ये भी पढ़ें- कुपोषण पर मप्र हाईकोर्ट सख्त: सभी जिला कलेक्टरों से मांगी रिपोर्ट, राज्य शासन और मुख्य सचिव को दिया नोटिस
हाईकोर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि इस समय मध्य प्रदेश की जिला न्यायपालिका के न्यायाधीश खुद को दुविधा में पाते हैं। एक ओर जिला न्यायपालिका की गर्दन से हाईकोर्ट सांस ले रहा है। न्यायिक आदेशों के कारण हाईकोर्ट की प्रशासनिक कार्रवाई का एक अनुचित भय पैदा कर न्यायपालिका पर जमानत दोषमुक्त करने का दबाव बनाया जाता है। जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों पर दबाव बनाने के लिए हाईकोर्ट की मानसिकता का फायदा उठाया जाता है। यह अत्यंत निंदनीय है और इससे सख्ती से निपटने की आवश्यकता है।

कमेंट
कमेंट X