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कफ सिरप कांड: 'अंजाम पता था फिर भी बच्चों को बांटा जहर, राहत दी तो उठ जाएगा भरोसा', हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Tue, 17 Feb 2026 06:11 PM IST
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सार
छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड में 30 बच्चों की मौत को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने डॉ. प्रवीण सोनी, उनकी पत्नी सहित अन्य आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि चेतावनी के बावजूद दूषित सिरप लिखना और सबूत नष्ट करना लोक स्वास्थ्य के साथ गंभीर अपराध है।
आरोपी डॉक्टर प्रवीण सोनी।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड में हुई 30 बच्चों की मौत को गंभीर और संवेदनशील मामला मानते हुए हाईकोर्ट ने डॉ. प्रवीण सोनी, उनकी पत्नी सहित दो अन्य की जमानत आवेदन खारिज कर दिए हैं। हाईकोर्ट जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल ने अपने आदेश में कहा है कि आरोपी को जमानत का लाभ दिया जाता है तो जनता का न्याय से भरोसा बहुत कम हो जाएगा। कफ सिरप एक्शन के संबंध में जानकारी होने के बावजूद भी डॉक्टर कमीशन लेकर बच्चों को दूषित कफ सिरप प्रिस्क्राइब करता रहा। केन्द्र सरकार के द्वारा नोटिफिकेशन के बावजूद भी आवेदक ने चार साल से कम बच्चों को फिक्स्ड डोज़ कंपाउंड सिरप दिया गया। सह आरोपियों ने आवेदक डॉक्टर को बचाने के लिए कफ सिरप से जुडे़ सबूत नष्ट कर दिए।
छिंडवाड़ा सिरप कांड मामले में गिरफतार डॉ. प्रवीण सोनी, उनकी पत्नी ज्योति सोनी सहित दो अन्य की तरफ से हाईकोर्ट में जमानत आवेदन दायर किया गया था। आवेदन में कहा गया था कि आवेदक डॉ. प्रवीण सोनी कम्युनिटी हेल्थ सेंटर परासिया, जिला छिंदवाड़ा में चाइल्ड स्पेशलिस्ट के तौर पर पदस्थ थे और विगत पांच अक्तूबर से न्यायिक हिरासत में हैं। कफ सिरप को बनाने में उसका कोई रोल नहीं था। वह विगत 20 साल से यह दवा लिख रहे हैं। कफ सिरप श्रीसन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड ने बनाया और बेचा था। उन्हें इस बात की जानकारी नही थी कि उसमें कोई मिलावट की गई है। आवेदक ने जिस समय दवा लिखी थी उस पर कोई रोक नहीं थी। दवा पर पहली बार 4 अक्टूबर 2025 को रोक लगाई गई थी। बिना जांच के प्रैक्टिशनर डॉक्टर के खिलाफ क्रिमिनल केस दर्ज नहीं किया जाना चाहिए।
रिएक्शन की संभावना के बाद भी दी गई दवा
सरकार की तरफ से जमानत आवेदन का विरोध करते हुए बताया गया कि ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. अंकित सेहलम की शिकायत पर पुलिस ने धारा 105, 276 और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 27(।) के तहत प्रकरण दर्ज किया था। आवेदक डॉ. प्रवीण सोनी के दिए गए कफ सिरप के कारण बच्चों की किडनी रिएक्शन से फेल हो गई। जिसकी वजह से कुछ बच्चों की मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल नागपुर (महाराष्ट्र) रेफर किए जाने के बाद मौत हो गई। यह दवा सह आरोपियों ने बेची, जो मौजूदा एप्लीकेंट के मालिकाना हक वाले मेडिकल स्टोर में काम करता थे। जिसकी मालिक उसकी पत्नी ज्योति सोनी हैं, जो इस मामले में सह-आरोपी भी हैं। आवेदक डॉक्टर ढाई वर्षीय बालक को उक्त कफ सिरप दिया था। हालत में सुधार नहीं होने के कारण उसे नागपुर ने जाया गया था। नागपुर के डॉक्टर प्रवीण खापेकर 11 सितम्बर 2025 की रात को डॉ. प्रवीण सोनी को बुलाकर बच्चे के माता-पिता के सामने बात की थी। उन्होंने बताया था कि 1998 में दिल्ली में डीईजी कॉन्टैमिनेटेड कफ सिरप की वजह से 33 बच्चों की मौत हो गई थी और शायद इस बार भी ऐसा ही रिएक्शन होने की संभावना है। सीनियर डॉक्टर प्रवीण खापेकर द्वारा दी गई जानकारी के बावजूद, मौजूदा आवेदक कफ सिरप लिखता रहा।
कफ सिरप में 46.28 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकॉल
सरकारी लैबोरेटरी और ड्रग डिपार्टमेंट की रिपोर्ट से यह साफ पता चलता है कि उस कफ सिरप में 46.28 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकॉल था, जबकि इसकी फार्माकोपिया लिमिट 0.1ः प्रतिशत है। डायथिलीन ग्लाइकॉल एक जाना-माना नेफ्रोटॉक्सिक है, जो बच्चों के लिए खास तौर पर जानलेवा है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन द्वारा 18.12.2023 को जारी सर्कुलर के अनुसार, फिक्स्ड डोज़ कंपाउंड चार साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंधित थी। इसके बावजूद आवेदक डॉक्टरों ने चार साल से कम बच्चों को कफ सिरप दिया जो फिक्स्ड डोज़ कंपाउंड है। आवेदक को पहले से जानलेवा घटना की जानकारी थी। आवेदक को कथित कफ सिरप खिलने पर हर बोतल पर 10 प्रतिशत कमीशन मिलता था और सह-आरोपी को हर बोतल पर 23 रुपये का फायदा होता था। आवेदक को पता चला कि इस दवा की वजह से बच्चों की मौत हो रही है, तो आवेदक ने सह-आरोपी के साथ मिलकर कफ सिरप से जुड़े सबूत मिटा दिए।
ये भी पढ़ें- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: 11.14 प्रतिशत की दर से बढ़ी अर्थव्यवस्था, प्रति व्यक्ति आय बढ़कर हुई 1,69,050 रुपये
चेतावनी के बावजूद लिखी गई कफ सिरप
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि डॉ. प्रवीण खापेकर कर चेतावनी के बावजूद आवेदक डॉक्टर कफ सिरप लिखता रहा, जिसकी वजह से 4-5 साल से कम उम्र के 26 से अधिक मासूम बच्चों की मौत हो गई। कथित कफ सिरप ने बड़े पैमाने पर लोक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाया और उन्होंने कप सिरप लिखने के लिए कमीशन भी मिला। दूसरे सह-आरोपियों ने मौजूदा आवेदक डॉक्टर को बचाने के लिए कफ सिरप से जुड़े सबूत नष्ट कर दिये। एक सक्षम अधिकारी (ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर) ने रिपोर्ट दर्ज की है कि आवेदक डॉक्टर ने बच्चों को फिक्स्ड डोज़ कंपाउंड दिया था। जिस पर सरकार के सर्कुलर जारी कर प्रतिबंध लगा दिया गया था। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ जमानत याचिका को निरस्त कर दिया। सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता एच एस रूपराह तथा अधिवक्ता सी एम तिवारी ने पैरवी की।
5 अक्टूबर 2025 को हुई थी गिरफ्तारी
गौरतलब है कि छिंदवाड़ा पुलिस ने मुख्य आरोपी डॉक्टर को 5 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार कर निचली अदालत में पेश किया था। वहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था। बाद में जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन अब याचिका खारिज कर दी गई है।
पूरे प्रदेश की नजर
इस मामले ने प्रदेशभर में चिकित्सा व्यवस्था और दवा वितरण प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए थे। 30 बच्चों की मौत के बाद से ही यह केस सुर्खियों में बना हुआ है। हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने साफ संकेत दिया है कि अदालत इस प्रकरण को लेकर बेहद गंभीर है। अब मामले की आगे की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी। पीड़ित परिवारों और आम जनता की नजर अगली न्यायिक कार्रवाई पर टिकी हुई है।
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रिएक्शन की संभावना के बाद भी दी गई दवा
सरकार की तरफ से जमानत आवेदन का विरोध करते हुए बताया गया कि ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. अंकित सेहलम की शिकायत पर पुलिस ने धारा 105, 276 और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 27(।) के तहत प्रकरण दर्ज किया था। आवेदक डॉ. प्रवीण सोनी के दिए गए कफ सिरप के कारण बच्चों की किडनी रिएक्शन से फेल हो गई। जिसकी वजह से कुछ बच्चों की मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल नागपुर (महाराष्ट्र) रेफर किए जाने के बाद मौत हो गई। यह दवा सह आरोपियों ने बेची, जो मौजूदा एप्लीकेंट के मालिकाना हक वाले मेडिकल स्टोर में काम करता थे। जिसकी मालिक उसकी पत्नी ज्योति सोनी हैं, जो इस मामले में सह-आरोपी भी हैं। आवेदक डॉक्टर ढाई वर्षीय बालक को उक्त कफ सिरप दिया था। हालत में सुधार नहीं होने के कारण उसे नागपुर ने जाया गया था। नागपुर के डॉक्टर प्रवीण खापेकर 11 सितम्बर 2025 की रात को डॉ. प्रवीण सोनी को बुलाकर बच्चे के माता-पिता के सामने बात की थी। उन्होंने बताया था कि 1998 में दिल्ली में डीईजी कॉन्टैमिनेटेड कफ सिरप की वजह से 33 बच्चों की मौत हो गई थी और शायद इस बार भी ऐसा ही रिएक्शन होने की संभावना है। सीनियर डॉक्टर प्रवीण खापेकर द्वारा दी गई जानकारी के बावजूद, मौजूदा आवेदक कफ सिरप लिखता रहा।
कफ सिरप में 46.28 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकॉल
सरकारी लैबोरेटरी और ड्रग डिपार्टमेंट की रिपोर्ट से यह साफ पता चलता है कि उस कफ सिरप में 46.28 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकॉल था, जबकि इसकी फार्माकोपिया लिमिट 0.1ः प्रतिशत है। डायथिलीन ग्लाइकॉल एक जाना-माना नेफ्रोटॉक्सिक है, जो बच्चों के लिए खास तौर पर जानलेवा है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन द्वारा 18.12.2023 को जारी सर्कुलर के अनुसार, फिक्स्ड डोज़ कंपाउंड चार साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंधित थी। इसके बावजूद आवेदक डॉक्टरों ने चार साल से कम बच्चों को कफ सिरप दिया जो फिक्स्ड डोज़ कंपाउंड है। आवेदक को पहले से जानलेवा घटना की जानकारी थी। आवेदक को कथित कफ सिरप खिलने पर हर बोतल पर 10 प्रतिशत कमीशन मिलता था और सह-आरोपी को हर बोतल पर 23 रुपये का फायदा होता था। आवेदक को पता चला कि इस दवा की वजह से बच्चों की मौत हो रही है, तो आवेदक ने सह-आरोपी के साथ मिलकर कफ सिरप से जुड़े सबूत मिटा दिए।
ये भी पढ़ें- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: 11.14 प्रतिशत की दर से बढ़ी अर्थव्यवस्था, प्रति व्यक्ति आय बढ़कर हुई 1,69,050 रुपये
चेतावनी के बावजूद लिखी गई कफ सिरप
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि डॉ. प्रवीण खापेकर कर चेतावनी के बावजूद आवेदक डॉक्टर कफ सिरप लिखता रहा, जिसकी वजह से 4-5 साल से कम उम्र के 26 से अधिक मासूम बच्चों की मौत हो गई। कथित कफ सिरप ने बड़े पैमाने पर लोक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाया और उन्होंने कप सिरप लिखने के लिए कमीशन भी मिला। दूसरे सह-आरोपियों ने मौजूदा आवेदक डॉक्टर को बचाने के लिए कफ सिरप से जुड़े सबूत नष्ट कर दिये। एक सक्षम अधिकारी (ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर) ने रिपोर्ट दर्ज की है कि आवेदक डॉक्टर ने बच्चों को फिक्स्ड डोज़ कंपाउंड दिया था। जिस पर सरकार के सर्कुलर जारी कर प्रतिबंध लगा दिया गया था। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ जमानत याचिका को निरस्त कर दिया। सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता एच एस रूपराह तथा अधिवक्ता सी एम तिवारी ने पैरवी की।
5 अक्टूबर 2025 को हुई थी गिरफ्तारी
गौरतलब है कि छिंदवाड़ा पुलिस ने मुख्य आरोपी डॉक्टर को 5 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार कर निचली अदालत में पेश किया था। वहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था। बाद में जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन अब याचिका खारिज कर दी गई है।
पूरे प्रदेश की नजर
इस मामले ने प्रदेशभर में चिकित्सा व्यवस्था और दवा वितरण प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए थे। 30 बच्चों की मौत के बाद से ही यह केस सुर्खियों में बना हुआ है। हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने साफ संकेत दिया है कि अदालत इस प्रकरण को लेकर बेहद गंभीर है। अब मामले की आगे की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी। पीड़ित परिवारों और आम जनता की नजर अगली न्यायिक कार्रवाई पर टिकी हुई है।
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