कफ सिरप कांड: 20 से अधिक बच्चों की मौत मामले में डॉक्टरों को नहीं मिली जमानत, कोर्ट ने खारिज की याचिका
छिंदवाड़ा जहरीले कफ सिरप कांड में 20 से अधिक बच्चों की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी डॉक्टरों की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि प्रतिबंध के बावजूद कम उम्र के बच्चों को दवा देना गंभीर लापरवाही का मामला है।
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छिंदवाड़ा के बहुचर्चित जहरीले कफ सिरप कांड में 20 से अधिक बच्चों की मौत के मामले में आरोपी बनाए गए डॉक्टरों को राहत नहीं मिली है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकलपीठ ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल ने अपने आदेश में कहा कि सरकार द्वारा जारी प्रतिबंध संबंधी निर्देशों के बावजूद चार वर्ष से कम आयु के बच्चों को निश्चित खुराक वाला फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (एफडीसी) कफ सिरप दिया गया, जिसके गंभीर परिणाम सामने आए और कई मासूमों की जान चली गई।
याचिकाकर्ता डॉक्टर की ओर से दलील दी गई कि वह पिछले 45 वर्षों से परासिया में बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। उन्हें कफ सिरप में किसी प्रकार की मिलावट या खराबी की जानकारी नहीं थी। उन्होंने मरीजों को सद्भावना के आधार पर दवा लिखी थी और इसके लिए निर्माता या वितरक से कोई लाभ या कमीशन प्राप्त नहीं किया। दवा के भंडारण, वितरण या नष्ट करने में भी उनकी कोई भूमिका नहीं थी।
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आवेदक ने यह भी कहा कि उसके खिलाफ आरोप है कि उसने चार बच्चों का उपचार किया था, जिनकी बाद में मृत्यु हो गई। जबकि चार्जशीट में केवल दो बच्चों का ही उल्लेख है। उसका नाम पूरक चार्जशीट में जोड़ा गया है। बच्चों की मौत फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन के कारण नहीं, बल्कि दवा में कथित जहरीले पदार्थ की मिलावट के कारण हुई। दवा के नमूनों की जांच रिपोर्ट 4 अक्टूबर 2025 को प्राप्त हुई थी, जिसमें कोल्ड्रिफ कफ सिरप में डायथिलीन ग्लाइकोल की मौजूदगी पाई गई। जबकि उसने यह दवा 23 अगस्त और 26 सितंबर को लिखी थी, इसलिए उसे मिलावट की जानकारी नहीं थी।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंधित दवा लिखना गंभीर लापरवाही का मामला है। इससे लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। सरकार ने यह भी माना कि मामले में कुछ अधिकारियों ने भी अपने कर्तव्यों का समुचित निर्वहन नहीं किया, लेकिन आरोपी डॉक्टर की भूमिका प्रथम दृष्टया गंभीर है। ऐसे संवेदनशील मामले में जमानत दिए जाने से जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा प्रभावित हो सकता है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने जमानत आवेदन खारिज कर दिया।

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