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Jabalpur: ‘MP की न्यायपालिका में जातिवादी सोच-सामंती ढांचे की झलक’, क्यों की हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी? जानें
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: हिमांशु प्रियदर्शी
Updated Fri, 25 Jul 2025 08:53 PM IST
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सार
Jabalpur News: एमपी हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी कर कहा कि मध्यप्रदेश न्यायपालिका में जातिवादी सोच और सामंती ढांचे की झलकती है। अदालत ने यह टिप्पणी विशेष न्यायाधीश जगत मोहन चतुर्वेदी की बर्खास्तगी मामले की सुनवाई करते हुए की। साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन पर जुर्माना भी ठोंका है।
एमपी हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश की बर्खास्तगी को रद्द किया
- फोटो : सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य की न्यायिक प्रणाली पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि यहां आज भी जातिवादी व्यवस्था और सामंती मानसिकता गहराई तक जमी हुई है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रदेश की न्यायिक संरचना में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को ‘सवर्ण’ और जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों को ‘शूद्र’ तथा ‘दुर्भाग्यशाली’ (Les Misérables) के रूप में देखा जाता है। यह एक सामाजिक बीमारी है जो न्याय व्यवस्था में असमानता और भय का माहौल पैदा करती है।
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हाईकोर्ट-जिला न्यायालयों के बीच एक सामंती और सेवक की तरह संबंध
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति डी. के. पालीवाली की खंडपीठ ने 14 जुलाई को दिए अपने आदेश में कहा कि मध्यप्रदेश में उच्च न्यायालय और जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों के बीच का संबंध 'जमींदार और सेवक' जैसा है, जहां उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जिला न्यायाधीशों के मन में जानबूझकर भय और हीनता की भावना भरते हैं। यह संबंध पारस्परिक सम्मान पर आधारित नहीं, बल्कि मानसिक दासता पर टिका है।
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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दिए चौंकाने वाले उदाहरण
कोर्ट ने अपने आदेश में कई चौंकाने वाले उदाहरण दिए, जिनमें बताया गया कि जिला न्यायाधीशों को हाईकोर्ट के न्यायाधीशों का रेलवे स्टेशन पर स्वागत करना पड़ता है। उन्हें जलपान कराना होता है और जब वे हाईकोर्ट में डिप्टीशन पर होते हैं तो उन्हें बैठने तक को नहीं कहा जाता। ऐसे में न्यायपालिका की गरिमा और आत्मसम्मान पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
विशेष न्यायाधीश जगत मोहन चतुर्वेदी की बर्खास्तगी को रद्द किया
यह टिप्पणी उस फैसले में की गई जिसमें विशेष न्यायालय (अनुसूचित जाति/जनजाति मामलों) के पूर्व न्यायाधीश जगत मोहन चतुर्वेदी की सेवा समाप्ति को अवैध करार देते हुए कोर्ट ने उन्हें न्याय दिलाया। चतुर्वेदी को 19 अक्तूबर 2015 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। उनके द्वारा पारित जमानत आदेशों को आधार बनाकर उन्हें हटाया गया, जबकि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई प्रमाण नहीं था।
राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन पर पांच लाख का जुर्माना
कोर्ट ने राज्य सरकार के विधि विभाग और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल पर पांच लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। साथ ही यह भी कहा कि चतुर्वेदी को इस अन्याय के कारण समाज में अपमान का सामना करना पड़ा और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी बुरा असर पड़ा।
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सेवा लाभ और बकाया वेतन देने का आदेश
हाईकोर्ट ने चतुर्वेदी के पेंशन लाभ बहाल करने, सेवा समाप्ति की तिथि से सेवानिवृत्ति की वास्तविक तिथि तक का बकाया वेतन सात प्रतिशत ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया है। यह राशि आदेश के वेबसाइट पर अपलोड होने की तिथि से 90 दिनों के भीतर दी जानी है, अन्यथा अवमानना याचिका दायर की जा सकती है।
न्यायपालिका में भय का माहौल
कोर्ट ने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि जिला न्यायपालिका निरंतर भय के वातावरण में कार्य करती है। यह घटना दर्शाती है कि यदि कोई न्यायाधीश निचली अदालत में आरोपियों को जमानत देता है या निर्दोष को बरी करता है, तो उस पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। इससे निचली अदालतों में न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

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