Jabalpur: साइबर ठगी की जांच में देरी पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र के दो सचिव, तीन राज्यों के DGP और गृह सचिव तलब
जबलपुर में कथित साइबर ठगी के मामले में जांच में देरी पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जांच में विलंब से आरोपियों को रकम ठिकाने लगाने का मौका मिलता है और साइबर अपराधों से निपटने के लिए बेहतर संस्थागत समन्वय व समयबद्ध व्यवस्था जरूरी है।
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जबलपुर में छह लाख रुपये की कथित साइबर ठगी के मामले में पुलिस-प्रशासन की सुस्त कार्रवाई पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। मामले की जांच में हो रही देरी पर कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
कोर्ट ने कहा कि जांच में देरी से न केवल विवेचना प्रभावित होती है, बल्कि आरोपियों को ठगी की रकम ठिकाने लगाने का भी मौका मिल जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को यह बताना चाहिए कि साइबर फ्रॉड की जांच के दौरान बैंकों द्वारा समय पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कौन-कौन से नियामकीय सुरक्षा उपाय लागू हैं।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, लेकिन इस मामले ने गंभीर संस्थागत कमियों को उजागर किया है। विभिन्न राज्यों की पुलिस, जांच एजेंसियों और बैंकिंग संस्थानों के बीच, साथ ही राज्य और केंद्र सरकार की एजेंसियों के बीच समन्वय की चिंताजनक कमी दिखाई देती है। साइबर धोखाधड़ी की जांच के लिए तत्काल, समन्वित और तकनीक आधारित कार्रवाई आवश्यक है, जबकि वर्तमान मामला प्रक्रियात्मक देरी और संस्थागत असमन्वय को दर्शाता है।
कोर्ट ने कहा कि साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में बैंक बचाव की पहली पंक्ति हैं। ग्राहकों के प्रति उनकी जिम्मेदारी है कि वे समय पर लेनदेन की सूचना दें, संदिग्ध खातों को तत्काल फ्रीज करें, जांच एजेंसियों के साथ खातों की जानकारी तेजी से साझा करें और संदिग्ध लेनदेन की रिपोर्ट करें। लेकिन अक्सर बैंक आवश्यक तत्परता नहीं दिखाते। धोखाधड़ी के बाद बीतने वाला हर घंटा पीड़ित की रकम वापस मिलने की संभावना को कम कर देता है।
एकलपीठ ने कहा कि आरोपी इसी समन्वय की कमी का लाभ उठाते हैं। तकनीक ने अपराधियों को राज्य की सीमाओं से परे आसानी से अपराध करने में सक्षम बना दिया है, जबकि जांच एजेंसियां अब भी प्रशासनिक सीमाओं में बंधी हुई हैं। साइबर अपराध अब केवल राज्य का विषय नहीं रह गया है। इसके लिए राज्य पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों, बैंकिंग संस्थानों, वित्तीय नियामकों और दूरसंचार विभाग के बीच निर्बाध सहयोग आवश्यक है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अब 'प्रीतम और पेड्रो' के एक साथ आने का समय है। साइबर अपराध की प्रभावी जांच तभी संभव है, जब तकनीकी विशेषज्ञता और पारंपरिक पुलिसिंग पूरी तत्परता और समन्वय के साथ काम करें। साइबर अपराधी क्षेत्रीय सीमाओं से परे काम करते हैं, जबकि जांच एजेंसियां अब भी प्रशासनिक दायरों में सीमित हैं। यह व्यवस्था न तो प्रभावी है और न ही टिकाऊ।
इसलिए न्यायालय ने कहा कि साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की जांच के लिए एक केंद्रीकृत, तकनीक-सक्षम और समयबद्ध प्रोटोकॉल तैयार करने हेतु राज्य सरकारों, केंद्र सरकार, बैंकिंग नियामकों, वित्तीय संस्थानों, दूरसंचार प्राधिकरणों और जांच एजेंसियों के बीच संयुक्त विचार-विमर्श आवश्यक है। एकलपीठ ने याचिकाकर्ता, प्रतिवादियों, न्याय मित्र और अधिवक्ताओं से इस संबंध में ठोस सुझाव देने का अनुरोध किया है, ताकि साइबर अपराध के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए एक प्रभावी संस्थागत ढांचा तैयार किया जा सके।
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मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई को निर्धारित की गई है। कोर्ट ने असम, पश्चिम बंगाल और झारखंड के पुलिस महानिदेशकों, संबंधित राज्यों के गृह सचिवों, केंद्र सरकार के गृह सचिव, दूरसंचार विभाग के केंद्रीय सचिव, जबलपुर पुलिस अधीक्षक तथा मामले से जुड़े जांच अधिकारियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं। साथ ही चेतावनी दी है कि बिना उचित कारण आदेश का पालन नहीं करने को गंभीरता से लिया जाएगा और आवश्यक आदेश पारित किए जाएंगे।
