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ओंकारेश्वर में गूंजा अद्वैत का शंखनाद, 700 शंकरदूतों ने लिया संकल्प, विश्व पटल पर छाएगा एकात्म धाम का संदेश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर
Published by: Ashutosh Pratap Singh
Updated Tue, 21 Apr 2026 08:07 PM IST
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सार
ओंकारेश्वर स्थित 'एकात्म धाम' में आयोजित पांच दिवसीय 'शंकर प्रकटोत्सव एकात्म पर्व' का मंगलवार को भव्य समापन हुआ। इस समारोह में जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि और स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती सहित कई दिग्गज संत और विद्वान उपस्थित रहे।
ओंकारेश्वर में अद्वैत पर्व का समापन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ओंकारेश्वर में स्थित एकात्म धाम में आयोजित शंकर प्रकटोत्सव एकात्म पर्व का समापन मंगलवार को जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि, चिन्मय मिशन के पूर्व वैश्विक प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती, प्रदेश के संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी, दक्षिणामूर्ति मठ के प्रमुख स्वामी पूर्णानंद गिरि, मां पूर्ण प्रज्ञा, प्रख्यात शिक्षाविद् गौतम भाई पटेल, महंत मंगलदास त्यागी तथा वेंकटेश्वर वेद विज्ञान पीठम् के प्राचार्य ब्रह्मर्षि कुप्प शिव सुब्रमण्यम अवधानी की उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम में 700 शंकरदूतों ने एकात्मता का संकल्प लिया। इस मौके पर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने एकात्मता के वैश्विक संदेश को प्रसारित करने का आह्वान किया।
स्वामी अवधेशानंद ने स्वीकार किया कि अब तक हम अपने धर्म और दर्शन का वैश्विक स्तर पर पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं कर सके, परंतु अब यह सीमा तोड़ने का समय है। उन्होंने आचार्य शंकर के योगदान की तुलना द्वापर युग के वेदव्यास से करते हुए कहा कि जिस प्रकार वेदव्यास ने ज्ञान को व्यवस्थित किया, उसी प्रकार शंकराचार्य ने उसे पुनर्जीवित कर समाज तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब शंकरदूत केवल भारत तक सीमित न रहें, बल्कि आचार्य शंकर का संदेश लेकर विश्व के प्रत्येक कोने तक पहुंचें।
श्रृंगेरी के शंकराचार्य ने दिए आशीवर्चन
कार्यक्रम में वीडियो के माध्यम से जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य विधुशेखर भारती के आशीर्वचन भी हुए। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रकल्पों की आज अत्यंत आवश्यकता है, जो आदि शंकराचार्य के विचारों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाएं। शंकराचार्य ने पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने के लिए चारों दिशाओं में पीठों की स्थापना की, जहाँ से एकता और अद्वैत का संदेश प्रसारित हुआ। आज उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ऐसे प्रयास जरूरी हैं, जो उनके दर्शन को जन-जीवन में स्थापित करें और विश्व पटल पर प्रभावी रूप से प्रस्तुत करें।
शंकर न होते तो तमस में रहता ज्ञान : तेजोमयानंद
बीज वक्तव्य में स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने कहा कि यदि शंकराचार्य का प्राकट्य न हुआ होता, तो ज्ञान अज्ञान के अंधकार में ही डूबा रहता। प्रकट न होते श्री शंकर तो, तमस में रहता ज्ञान, उनकी कृपा हो हम सब पर हो और रहे कृपा का भान।
पुनर्जागरण का समय : लोधी
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि आज का दिन केवल उत्सव नहीं, भारत की पारंपरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है। मात्र 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत होना, उनके ईश्वरीय स्वरूप का प्रमाण है। जब वह संन्यासी होकर निकले तो उनके दिव्य चरण यहीं ओंकारेश्वर की धरती पर आ पहुंचे। नर्मदा के तट पर जब भगवत्पाद गोविंद ने उसने पूछा कि तुम कौन हो तो उन्होंने जवाब में कहा "चिदानंद रूपः, शिवोहम शिवोहम"। उन्होंने कहा कि एकात्म धाम को मप्र शासन द्वारा एकात्मता के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करते हुए 2400 करोड़ की लागत से एकात्म धाम का निर्माण किया जा रहा है।
अद्वैत के आलोक स्तंभों का सम्मान
इस अवसर पर शैक्षणिक जगत की दो प्रखर विभूतियों को सम्मानित किया गया जिसमे चिन्मय मिशन के पूर्व प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद जी को उनकी अखंड अद्वैत निष्ठा के लिए सम्मानित किया गया। पद्म भूषण से विभूषित स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने 'उपनिषद गंगा' और विभिन्न ग्रंथों की व्याख्या के माध्यम से वेदांत को जन-जन तक पहुंचाया है। साथ ही प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर गौतम भाई पटेल को संस्कृत वांग्मय और अद्वैत दर्शन में उनके अतुलनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। प्रो. पटेल ने आचार्य शंकर की संपूर्ण कृतियों का पहली बार गुजराती भाषा में अनुवाद करने का ऐतिहासिक संकल्प लिया है। साथ ही पंच दिवसीय एकात्म पर्व में वैदिक अनुष्ठान एवं श्रौत कर्मानुष्ठान हेतु हैदराबाद से पधारे परम पूज्य ज्येष्ठ ब्रह्मश्री वेदमूर्ति कुप्पा रामगोपाल वाजपेयया तथा उनकी धर्मपत्नी कुप्पा कल्पकाम्बा सोमपीठनी को श्रुति परंपरा एवं वैदिक अनुष्ठान के प्रति उनके अपार समर्पण के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए न्यास द्वारा उन्हें आदिगुरु शंकराचार्य की प्रतिमा, जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि द्वारा भेंट स्वरूप प्रदान की गई। ये दोनों शृंगेरी के शंकराचार्य जगद्गुरु विधुशेखर भारती महास्वामी के पूर्वाश्रम के पितामह-पितामही हैं।
700 शंकर दूत हुए दीक्षित
वैशाख शुक्ल पंचमी पर आदि शंकराचार्य जयंती के मौके पर जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि एवं अन्य संतों की उपस्थिति में प्रातः 6 बजे नर्मदा तट पर आयोजित दीक्षा समारोह में देश-विदेश के 700 से अधिक युवा शंकरदूत के रूप में दीक्षित हुए। इनमें नेपाल, बांग्लादेश के युवा भी शामिल हैं।
लगातार आयोजित हो रहे शिविर
इनके प्रशिक्षण के लिए लगातार शिविरों में देश-विदेश के युवा एवं नागरिक बड़ी संख्या में सम्मिलित हो रहे हैं। वर्ष 2020 से शुरू हुए इन शिविरों में अभी तक स्पेन, इंडोनेशिया, नीदरलैंड, बांग्लादेश, टर्की, नेपाल, अमेरिका एवं भारत के 25 से अधिक राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के आईआईटीइन/प्रोफेसर्स/ प्रोफेशनल्स/डॉक्टर/आर्टिस्ट/ वैज्ञानिक/आर्मी ऑफिसर्स/ प्रशासनिक अधिकारी/शोधार्थी सहित 1800 से अधिक युवा एवं जिज्ञासु सहभागिता कर चुके है। अभी तक कुल 45 नियमित शिविर तथा 3 एडवांस्ड शिविरों का आयोजन हो चुका है, इनमें लगभग 1800 से अधिक शंकरदूत तैयार हुए हैं।
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स्वामी अवधेशानंद ने स्वीकार किया कि अब तक हम अपने धर्म और दर्शन का वैश्विक स्तर पर पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं कर सके, परंतु अब यह सीमा तोड़ने का समय है। उन्होंने आचार्य शंकर के योगदान की तुलना द्वापर युग के वेदव्यास से करते हुए कहा कि जिस प्रकार वेदव्यास ने ज्ञान को व्यवस्थित किया, उसी प्रकार शंकराचार्य ने उसे पुनर्जीवित कर समाज तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब शंकरदूत केवल भारत तक सीमित न रहें, बल्कि आचार्य शंकर का संदेश लेकर विश्व के प्रत्येक कोने तक पहुंचें।
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श्रृंगेरी के शंकराचार्य ने दिए आशीवर्चन
कार्यक्रम में वीडियो के माध्यम से जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य विधुशेखर भारती के आशीर्वचन भी हुए। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रकल्पों की आज अत्यंत आवश्यकता है, जो आदि शंकराचार्य के विचारों को वैश्विक स्तर तक पहुंचाएं। शंकराचार्य ने पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने के लिए चारों दिशाओं में पीठों की स्थापना की, जहाँ से एकता और अद्वैत का संदेश प्रसारित हुआ। आज उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ऐसे प्रयास जरूरी हैं, जो उनके दर्शन को जन-जीवन में स्थापित करें और विश्व पटल पर प्रभावी रूप से प्रस्तुत करें।
शंकर न होते तो तमस में रहता ज्ञान : तेजोमयानंद
बीज वक्तव्य में स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने कहा कि यदि शंकराचार्य का प्राकट्य न हुआ होता, तो ज्ञान अज्ञान के अंधकार में ही डूबा रहता। प्रकट न होते श्री शंकर तो, तमस में रहता ज्ञान, उनकी कृपा हो हम सब पर हो और रहे कृपा का भान।
पुनर्जागरण का समय : लोधी
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि आज का दिन केवल उत्सव नहीं, भारत की पारंपरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है। मात्र 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत होना, उनके ईश्वरीय स्वरूप का प्रमाण है। जब वह संन्यासी होकर निकले तो उनके दिव्य चरण यहीं ओंकारेश्वर की धरती पर आ पहुंचे। नर्मदा के तट पर जब भगवत्पाद गोविंद ने उसने पूछा कि तुम कौन हो तो उन्होंने जवाब में कहा "चिदानंद रूपः, शिवोहम शिवोहम"। उन्होंने कहा कि एकात्म धाम को मप्र शासन द्वारा एकात्मता के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करते हुए 2400 करोड़ की लागत से एकात्म धाम का निर्माण किया जा रहा है।
अद्वैत के आलोक स्तंभों का सम्मान
इस अवसर पर शैक्षणिक जगत की दो प्रखर विभूतियों को सम्मानित किया गया जिसमे चिन्मय मिशन के पूर्व प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद जी को उनकी अखंड अद्वैत निष्ठा के लिए सम्मानित किया गया। पद्म भूषण से विभूषित स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने 'उपनिषद गंगा' और विभिन्न ग्रंथों की व्याख्या के माध्यम से वेदांत को जन-जन तक पहुंचाया है। साथ ही प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर गौतम भाई पटेल को संस्कृत वांग्मय और अद्वैत दर्शन में उनके अतुलनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। प्रो. पटेल ने आचार्य शंकर की संपूर्ण कृतियों का पहली बार गुजराती भाषा में अनुवाद करने का ऐतिहासिक संकल्प लिया है। साथ ही पंच दिवसीय एकात्म पर्व में वैदिक अनुष्ठान एवं श्रौत कर्मानुष्ठान हेतु हैदराबाद से पधारे परम पूज्य ज्येष्ठ ब्रह्मश्री वेदमूर्ति कुप्पा रामगोपाल वाजपेयया तथा उनकी धर्मपत्नी कुप्पा कल्पकाम्बा सोमपीठनी को श्रुति परंपरा एवं वैदिक अनुष्ठान के प्रति उनके अपार समर्पण के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए न्यास द्वारा उन्हें आदिगुरु शंकराचार्य की प्रतिमा, जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि द्वारा भेंट स्वरूप प्रदान की गई। ये दोनों शृंगेरी के शंकराचार्य जगद्गुरु विधुशेखर भारती महास्वामी के पूर्वाश्रम के पितामह-पितामही हैं।
700 शंकर दूत हुए दीक्षित
वैशाख शुक्ल पंचमी पर आदि शंकराचार्य जयंती के मौके पर जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि एवं अन्य संतों की उपस्थिति में प्रातः 6 बजे नर्मदा तट पर आयोजित दीक्षा समारोह में देश-विदेश के 700 से अधिक युवा शंकरदूत के रूप में दीक्षित हुए। इनमें नेपाल, बांग्लादेश के युवा भी शामिल हैं।
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लगातार आयोजित हो रहे शिविर
इनके प्रशिक्षण के लिए लगातार शिविरों में देश-विदेश के युवा एवं नागरिक बड़ी संख्या में सम्मिलित हो रहे हैं। वर्ष 2020 से शुरू हुए इन शिविरों में अभी तक स्पेन, इंडोनेशिया, नीदरलैंड, बांग्लादेश, टर्की, नेपाल, अमेरिका एवं भारत के 25 से अधिक राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के आईआईटीइन/प्रोफेसर्स/ प्रोफेशनल्स/डॉक्टर/आर्टिस्ट/ वैज्ञानिक/आर्मी ऑफिसर्स/ प्रशासनिक अधिकारी/शोधार्थी सहित 1800 से अधिक युवा एवं जिज्ञासु सहभागिता कर चुके है। अभी तक कुल 45 नियमित शिविर तथा 3 एडवांस्ड शिविरों का आयोजन हो चुका है, इनमें लगभग 1800 से अधिक शंकरदूत तैयार हुए हैं।

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