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एशिया का नामी मत्स्य केंद्र बदहाली की कगार पर: 45 करोड़ बीज का लक्ष्य, कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा संस्थान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मैहर
Published by: मैहर ब्यूरो
Updated Mon, 08 Jun 2026 05:35 PM IST
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सार
मैहर स्थित पोंडी मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र, जिसे कभी एशिया के प्रमुख मत्स्य संस्थानों में गिना जाता था, आज कर्मचारियों की भारी कमी, रिक्त प्रशासनिक पदों, घटती भूमि, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था और जर्जर अधोसंरचना जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। उत्पादन लक्ष्य लगातार बढ़ रहे हैं।
सांकेतिक फोटो
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
कभी मध्य प्रदेश के मत्स्य विकास की रीढ़ माने जाने वाले पोंडी मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र की स्थिति आज चिंता का विषय बन चुकी है। एशिया के प्रमुख मत्स्य बीज उत्पादन केंद्रों में शुमार यह संस्थान कर्मचारियों की भारी कमी, रिक्त प्रशासनिक पदों, सिकुड़ते संसाधनों और जर्जर हो चुकी अधोसंरचना के कारण गंभीर संकट से गुजर रहा है। हालात ऐसे हैं कि प्रदेश और देश के मत्स्य क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखने वाला यह केंद्र अब अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती से जूझ रहा है।
प्रदेश में मत्स्य पालन को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई थी
करीब चार दशक पहले स्थापित इस केंद्र ने प्रदेश में मत्स्य पालन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहां तैयार होने वाले मत्स्य बीज और स्पॉन ने हजारों मत्स्य पालकों को रोजगार और उत्पादन बढ़ाने में मदद की। लेकिन समय के साथ बढ़ती जिम्मेदारियों और घटते संसाधनों ने केंद्र की कार्यक्षमता को प्रभावित कर दिया है।
लक्ष्य बढ़ते गए, लेकिन संसाधन नहीं
पोंडी मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र की स्थापना वर्ष 1982 में हुई थी। उस समय इसका वार्षिक उत्पादन लक्ष्य 6 से 8 करोड़ मत्स्य बीज के बीच था। मत्स्य पालन के बढ़ते दायरे और मांग को देखते हुए यह लक्ष्य लगातार बढ़ाया गया और वर्तमान में वर्ष 2026 के लिए केंद्र को 45 करोड़ मत्स्य बीज उत्पादन का लक्ष्य दिया गया है।
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पर्याप्त मानव संसाधन और आधुनिक सुविधाएं
हालांकि, उत्पादन लक्ष्य तो कई गुना बढ़ा, लेकिन कर्मचारियों, तकनीकी संसाधनों और आधारभूत सुविधाओं में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई। इसका परिणाम यह रहा कि बीते वर्ष केंद्र निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, लगभग 42 करोड़ मत्स्य बीज उत्पादन के लक्ष्य के मुकाबले केवल 32 से 33 करोड़ बीज ही तैयार किए जा सके। वहीं, 2 करोड़ 25 लाख स्पॉन उत्पादन के लक्ष्य के विरुद्ध करीब 1 करोड़ 60 लाख स्पॉन का ही उत्पादन हो पाया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्याप्त मानव संसाधन और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तो यह केंद्र कहीं अधिक उत्पादन क्षमता हासिल कर सकता है।
ये भी पढ़ें- MP Rajya Sabha Election: नटराजन के सामने केवट, खरीद-फरोख्त की आशंका के बीच क्या बोले कांग्रेस के दिग्गज?
16 में से 15 फिशरमैन रिटायर, एक कर्मचारी के भरोसे संचालन
केंद्र की सबसे बड़ी समस्या कर्मचारियों की कमी बन चुकी है। मत्स्य बीज उत्पादन का कार्य अत्यंत तकनीकी और श्रम आधारित माना जाता है, जिसके लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत होती है केंद्र में फिशरमैन के 16 स्वीकृत पद हैं, लेकिन इनमें से 15 कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वर्तमान में केवल एक फिशरमैन कार्यरत है, जो विशाल परिसर और उत्पादन गतिविधियों के बीच अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा है। ऐसे में विभाग को दैनिक मजदूरों के सहारे कई कार्यों का संचालन करना पड़ रहा है कर्मचारियों का कहना है कि इतने बड़े केंद्र का संचालन केवल एक नियमित फिशरमैन के भरोसे करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है।
अधिकारियों के पद खाली, प्रशासनिक ढांचा कमजोर
स्थिति केवल तकनीकी कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर भी केंद्र गंभीर स्टाफ संकट का सामना कर रहा है उप संचालक और सहायक संचालक जैसे महत्वपूर्ण पद लंबे समय से रिक्त हैं। सहायक मत्स्य अधिकारी के चार स्वीकृत पदों में से केवल दो अधिकारी कार्यरत हैं और वे भी आगामी महीनों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। मत्स्य निरीक्षक की पदस्थापना होने के बावजूद उन्हें दूसरे जिले में अटैच कर दिया गया है। कार्यालयीन कार्यों का भार भी सीमित कर्मचारियों पर है, जहां दो बाबू और दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पूरे प्रशासनिक ढांचे को संभाल रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि वर्तमान प्रभारी सहायक संचालक एस.एस. बघेल भी इसी वर्ष नवंबर में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में यदि समय रहते नियुक्तियां नहीं हुईं तो प्रशासनिक व्यवस्था और अधिक प्रभावित हो सकती है।
जिला निर्माण के बाद कम हुई जमीन, घटी उत्पादन क्षमता
पोंडी केंद्र की स्थापना के समय लगभग 300 एकड़ भूमि उपलब्ध थी, जिसमें मत्स्य विभाग के नाम 152 एकड़ भूमि दर्ज थी। लेकिन मैहर जिला बनने के बाद विभिन्न प्रशासनिक निर्माण कार्यों के लिए केंद्र की भूमि का उपयोग किया गया। कलेक्ट्रेट भवन निर्माण के लिए करीब 14 एकड़ भूमि ली गई, जिससे केंद्र की 15 सक्रिय नर्सरियां समाप्त हो गईं। इसके अलावा कर्मचारियों के आवास और अन्य निर्माण कार्यों के लिए भी भूमि हस्तांतरित की गई।
मत्स्य बीज का उत्पादन
भूमि में हुई इस कटौती का सीधा असर मत्स्य बीज उत्पादन क्षमता पर पड़ा है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि उपलब्ध भूमि कम होने से विस्तार और नई उत्पादन इकाइयों के विकास की संभावनाएं भी प्रभावित हुई हैं।
सुरक्षा व्यवस्था नदारद, बढ़ रही चोरी की घटनाएं
करोड़ों रुपये की परिसंपत्तियों और विशाल क्षेत्रफल वाले इस केंद्र में सुरक्षा व्यवस्था लगभग नहीं के बराबर है। परिसर में कोई स्थायी सुरक्षा गार्ड तैनात नहीं है और अधिकांश क्षेत्र खुला पड़ा हुआ है। बाउंड्रीवॉल के अभाव में असामाजिक तत्वों की आवाजाही बनी रहती है। कर्मचारियों के अनुसार कई बार उपकरण और अन्य सामग्री चोरी होने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। लेकिन सुरक्षा संसाधनों और स्टाफ की कमी के कारण प्रभावी निगरानी संभव नहीं हो पा रही है।
करोड़ों का प्रशिक्षण भवन बना उपेक्षा का शिकार
मत्स्य पालकों को आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से यहां करोड़ों रुपये की लागत से प्रशिक्षण भवन बनाया गया था। एक समय यह भवन प्रदेशभर के मत्स्य पालकों के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी का प्रमुख केंद्र था, लेकिन वर्षों से उचित रखरखाव न होने के कारण यह भवन अब जर्जर हो चुका है। नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम बंद हैं और भवन का अधिकांश हिस्सा उपयोग से बाहर हो गया है।
ये भी पढ़ें- MP News: अधिक मास में ओंकारेश्वर में उमड़ा आस्था का सैलाब, कोटितीर्थ घाट तक लगी श्रद्धालुओं की कतार
प्रदेशभर में पहुंचता है यहां का मत्स्य बीज
संकटों के बावजूद पोंडी केंद्र आज भी प्रदेश के मत्स्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। केंद्र में वर्तमान में 8 ग्रोवर पोंड, 54 संवर्धन नर्सरियां और 6 पृथक्करण पोखर संचालित हैं। यहां तैयार होने वाला मत्स्य बीज सागर, ग्वालियर, शहडोल, सीधी, सिंगरौली सहित प्रदेश के कई जिलों में भेजा जाता है। अन्य राज्यों में भी इसकी मांग बनी हुई है। प्रभारी सहायक संचालक एस.एस. बघेल का कहना है कि सीमित संसाधनों और कर्मचारियों के बावजूद केंद्र का संचालन किया जा रहा है, लेकिन रिक्त पदों की पूर्ति और आधारभूत सुविधाओं के विकास के बिना भविष्य में उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
क्या बच पाएगा प्रदेश की पहचान बना यह केंद्र?
मत्स्य विभाग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि यदि जल्द भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं हुई, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं की गई और अधोसंरचना के सुधार पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह केंद्र और गंभीर संकट में फंस सकता है। कभी प्रदेश के मत्स्य विकास का प्रमुख केंद्र रहा पोंडी आज सरकारी उपेक्षा और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। यह केवल एक संस्थान का संकट नहीं, बल्कि उन हजारों मत्स्य पालकों की चिंता भी है जिनकी आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस केंद्र से जुड़ी हुई है। अब सवाल यह है कि क्या शासन इस ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण संस्थान को बचाने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाएगा, या फिर यह केंद्र धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता चला जाएगा।
प्रदेश में मत्स्य पालन को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई थी
करीब चार दशक पहले स्थापित इस केंद्र ने प्रदेश में मत्स्य पालन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहां तैयार होने वाले मत्स्य बीज और स्पॉन ने हजारों मत्स्य पालकों को रोजगार और उत्पादन बढ़ाने में मदद की। लेकिन समय के साथ बढ़ती जिम्मेदारियों और घटते संसाधनों ने केंद्र की कार्यक्षमता को प्रभावित कर दिया है।
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लक्ष्य बढ़ते गए, लेकिन संसाधन नहीं
पोंडी मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र की स्थापना वर्ष 1982 में हुई थी। उस समय इसका वार्षिक उत्पादन लक्ष्य 6 से 8 करोड़ मत्स्य बीज के बीच था। मत्स्य पालन के बढ़ते दायरे और मांग को देखते हुए यह लक्ष्य लगातार बढ़ाया गया और वर्तमान में वर्ष 2026 के लिए केंद्र को 45 करोड़ मत्स्य बीज उत्पादन का लक्ष्य दिया गया है।
पर्याप्त मानव संसाधन और आधुनिक सुविधाएं
हालांकि, उत्पादन लक्ष्य तो कई गुना बढ़ा, लेकिन कर्मचारियों, तकनीकी संसाधनों और आधारभूत सुविधाओं में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई। इसका परिणाम यह रहा कि बीते वर्ष केंद्र निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, लगभग 42 करोड़ मत्स्य बीज उत्पादन के लक्ष्य के मुकाबले केवल 32 से 33 करोड़ बीज ही तैयार किए जा सके। वहीं, 2 करोड़ 25 लाख स्पॉन उत्पादन के लक्ष्य के विरुद्ध करीब 1 करोड़ 60 लाख स्पॉन का ही उत्पादन हो पाया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्याप्त मानव संसाधन और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तो यह केंद्र कहीं अधिक उत्पादन क्षमता हासिल कर सकता है।
ये भी पढ़ें- MP Rajya Sabha Election: नटराजन के सामने केवट, खरीद-फरोख्त की आशंका के बीच क्या बोले कांग्रेस के दिग्गज?
16 में से 15 फिशरमैन रिटायर, एक कर्मचारी के भरोसे संचालन
केंद्र की सबसे बड़ी समस्या कर्मचारियों की कमी बन चुकी है। मत्स्य बीज उत्पादन का कार्य अत्यंत तकनीकी और श्रम आधारित माना जाता है, जिसके लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत होती है केंद्र में फिशरमैन के 16 स्वीकृत पद हैं, लेकिन इनमें से 15 कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वर्तमान में केवल एक फिशरमैन कार्यरत है, जो विशाल परिसर और उत्पादन गतिविधियों के बीच अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा है। ऐसे में विभाग को दैनिक मजदूरों के सहारे कई कार्यों का संचालन करना पड़ रहा है कर्मचारियों का कहना है कि इतने बड़े केंद्र का संचालन केवल एक नियमित फिशरमैन के भरोसे करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है।
अधिकारियों के पद खाली, प्रशासनिक ढांचा कमजोर
स्थिति केवल तकनीकी कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर भी केंद्र गंभीर स्टाफ संकट का सामना कर रहा है उप संचालक और सहायक संचालक जैसे महत्वपूर्ण पद लंबे समय से रिक्त हैं। सहायक मत्स्य अधिकारी के चार स्वीकृत पदों में से केवल दो अधिकारी कार्यरत हैं और वे भी आगामी महीनों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। मत्स्य निरीक्षक की पदस्थापना होने के बावजूद उन्हें दूसरे जिले में अटैच कर दिया गया है। कार्यालयीन कार्यों का भार भी सीमित कर्मचारियों पर है, जहां दो बाबू और दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पूरे प्रशासनिक ढांचे को संभाल रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि वर्तमान प्रभारी सहायक संचालक एस.एस. बघेल भी इसी वर्ष नवंबर में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में यदि समय रहते नियुक्तियां नहीं हुईं तो प्रशासनिक व्यवस्था और अधिक प्रभावित हो सकती है।
जिला निर्माण के बाद कम हुई जमीन, घटी उत्पादन क्षमता
पोंडी केंद्र की स्थापना के समय लगभग 300 एकड़ भूमि उपलब्ध थी, जिसमें मत्स्य विभाग के नाम 152 एकड़ भूमि दर्ज थी। लेकिन मैहर जिला बनने के बाद विभिन्न प्रशासनिक निर्माण कार्यों के लिए केंद्र की भूमि का उपयोग किया गया। कलेक्ट्रेट भवन निर्माण के लिए करीब 14 एकड़ भूमि ली गई, जिससे केंद्र की 15 सक्रिय नर्सरियां समाप्त हो गईं। इसके अलावा कर्मचारियों के आवास और अन्य निर्माण कार्यों के लिए भी भूमि हस्तांतरित की गई।
मत्स्य बीज का उत्पादन
भूमि में हुई इस कटौती का सीधा असर मत्स्य बीज उत्पादन क्षमता पर पड़ा है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि उपलब्ध भूमि कम होने से विस्तार और नई उत्पादन इकाइयों के विकास की संभावनाएं भी प्रभावित हुई हैं।
सुरक्षा व्यवस्था नदारद, बढ़ रही चोरी की घटनाएं
करोड़ों रुपये की परिसंपत्तियों और विशाल क्षेत्रफल वाले इस केंद्र में सुरक्षा व्यवस्था लगभग नहीं के बराबर है। परिसर में कोई स्थायी सुरक्षा गार्ड तैनात नहीं है और अधिकांश क्षेत्र खुला पड़ा हुआ है। बाउंड्रीवॉल के अभाव में असामाजिक तत्वों की आवाजाही बनी रहती है। कर्मचारियों के अनुसार कई बार उपकरण और अन्य सामग्री चोरी होने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। लेकिन सुरक्षा संसाधनों और स्टाफ की कमी के कारण प्रभावी निगरानी संभव नहीं हो पा रही है।
करोड़ों का प्रशिक्षण भवन बना उपेक्षा का शिकार
मत्स्य पालकों को आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से यहां करोड़ों रुपये की लागत से प्रशिक्षण भवन बनाया गया था। एक समय यह भवन प्रदेशभर के मत्स्य पालकों के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी का प्रमुख केंद्र था, लेकिन वर्षों से उचित रखरखाव न होने के कारण यह भवन अब जर्जर हो चुका है। नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम बंद हैं और भवन का अधिकांश हिस्सा उपयोग से बाहर हो गया है।
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प्रदेशभर में पहुंचता है यहां का मत्स्य बीज
संकटों के बावजूद पोंडी केंद्र आज भी प्रदेश के मत्स्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। केंद्र में वर्तमान में 8 ग्रोवर पोंड, 54 संवर्धन नर्सरियां और 6 पृथक्करण पोखर संचालित हैं। यहां तैयार होने वाला मत्स्य बीज सागर, ग्वालियर, शहडोल, सीधी, सिंगरौली सहित प्रदेश के कई जिलों में भेजा जाता है। अन्य राज्यों में भी इसकी मांग बनी हुई है। प्रभारी सहायक संचालक एस.एस. बघेल का कहना है कि सीमित संसाधनों और कर्मचारियों के बावजूद केंद्र का संचालन किया जा रहा है, लेकिन रिक्त पदों की पूर्ति और आधारभूत सुविधाओं के विकास के बिना भविष्य में उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
क्या बच पाएगा प्रदेश की पहचान बना यह केंद्र?
मत्स्य विभाग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि यदि जल्द भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं हुई, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं की गई और अधोसंरचना के सुधार पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह केंद्र और गंभीर संकट में फंस सकता है। कभी प्रदेश के मत्स्य विकास का प्रमुख केंद्र रहा पोंडी आज सरकारी उपेक्षा और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। यह केवल एक संस्थान का संकट नहीं, बल्कि उन हजारों मत्स्य पालकों की चिंता भी है जिनकी आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस केंद्र से जुड़ी हुई है। अब सवाल यह है कि क्या शासन इस ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण संस्थान को बचाने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाएगा, या फिर यह केंद्र धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता चला जाएगा।
