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MP: अपनों से सताए बुजुर्ग का अनोखा विरोध, जिंदा रहते खुद कर रहा अपनी तेरहवीं, कार्ड पर लिखा चौंकाने वाला संदेश

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिवपुरी Published by: Dinesh Sharma Updated Thu, 14 May 2026 04:27 PM IST
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सार

शिवपुरी जिले के करैरा के 72 वर्षीय कल्याण सिंह पाल ने पारिवारिक उपेक्षा और रिश्तों में आई दूरियों से आहत होकर जीवित रहते अपनी त्रयोदशी का आयोजन तय किया। उन्होंने 16 मई 2026 के भोज के निमंत्रण कार्ड बांटे, जिनमें अपनी पीड़ा भी लिखवाई। मामला समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा पर सवाल खड़े कर रहा है।

MP News: Hurt by Family Neglect, Elderly Man Organises His Own Terahvi While Alive Inside Story
गांव में ये कार्ड चर्चा का विषय बना हुआ है। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

शिवपुरी जिले में रिश्तों में बढ़ती दूरियों और अपनों की उपेक्षा से आहत एक बुजुर्ग का मामला सामने आया है। जिले के करैरा के ग्राम हाजीनगर निवासी 72 वर्षीय बुजुर्ग कल्याण सिंह पाल ने जिंदा रहते ही अपनी त्रयोदशी का आयोजन तय कर दिया है। 16 मई 2026, शनिवार को होने वाले इस भोज के लिए बुजुर्ग ने समाज के लोगों को निमंत्रण कार्ड भी बांट दिए हैं। अब यह कार्ड सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
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कार्ड में छपवाई अपनी पीड़ा
कार्ड पर छपी पंक्तियां ‘मुझे तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था, मेरी कश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था’ बुजुर्ग की भीतर की पीड़ा को साफ बयां कर रही हैं। कार्ड में आयोजक के रूप में खुद कल्याण सिंह का नाम और ‘जिन्दा भण्डारा’ लिखा है, जिसने लोगों को और चौंका दिया है।
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पारिवारिक कलह और उपेक्षा से तंग आकर बुजुर्ग ने कदम उठाया 
ग्रामीणों के अनुसार, कल्याण सिंह के दो बेटे और परिवार है, लेकिन वे बुजुर्ग से अलग रहते हैं। पारिवारिक कलह और उपेक्षा से तंग आकर ही बुजुर्ग ने यह कदम उठाया है। गांव में आयोजन की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। कल्याण सिंह खुद सभी व्यवस्थाएं देख रहे हैं।

इस संबंध में जब बुजुर्ग से उनके मोबाइल पर संपर्क कर आयोजन का कारण जानना चाहा तो उन्होंने नाराजगी भरे लहजे में कहा, “अब इस दुनिया में मेरा कोई नहीं बचा। सबने मुंह फेर लिया है। इसलिए जिंदा रहते अपनी त्रयोदशी खुद करना चाहता हूं। मरने के बाद पता नहीं कोई करेगा भी या नहीं।”

समाज में बुजुर्गों की बढ़ती उपेक्षा और टूटते पारिवारिक मूल्य
इस मामले में नाम न छापने के अनुरोध पर गांव के लोगों ने बताया कि बुजुर्ग स्वजनों के व्यवहार से बेहद दुखी हैं। कई बार पंचायत भी हुई, लेकिन रिश्तों में सुधार नहीं आया। इसी नाराजगी में उन्होंने समाज को संदेश देने के लिए यह अनोखा आयोजन रखा है। यह घटना केवल एक बुजुर्ग की पीड़ा नहीं, बल्कि समाज में बुजुर्गों की बढ़ती उपेक्षा और टूटते पारिवारिक मूल्यों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। प्रशासन और समाजसेवियों को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।
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