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Raisen: रायसेन के जंगलों में दिखीं गिद्धों की चार दुर्लभ प्रजातियां, वन विभाग की रिपोर्ट से खुलेंगे बड़े राज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायसेन
Published by: रायसेन ब्यूरो
Updated Fri, 22 May 2026 07:05 PM IST
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सार
Raisen: रायसेन वन मंडल में ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना का दूसरा चरण शुरू हो गया है। 140 चिन्हित साइटों पर वन विभाग की टीमें गिद्धों की संख्या और गतिविधियों का रिकॉर्ड तैयार कर रही हैं। इस बार जिले में गिद्धों की चार देसी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जो संरक्षण के लिहाज से सकारात्मक संकेत मानी जा रही हैं।
रायसेन में शुरू हुई गिद्ध गणना
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जंगल के सफाईकर्मी कहे जाने वाले गिद्धों की मौजूदा स्थिति जानने के लिए रायसेन वन मंडल में शुक्रवार सुबह से ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना का दूसरा चरण शुरू हो गया। वन विभाग की टीमें सूरज की पहली किरण के साथ जिले की 140 चिन्हित साइटों पर पहुंचीं और दूरबीन व कैमरों से आसमान और पेड़ों पर गिद्धों की तलाश शुरू की। यह अभियान 22 मई से 24 मई तक लगातार तीन दिन चलेगा।
सुबह 6 से 10 बजे तक हो रही गणना
एसडीओ सुधीर पटले ने बताया कि गिद्धों की गतिविधियां सूर्योदय के बाद सबसे ज्यादा रहती हैं। इसलिए गणना का समय सुबह 6 बजे से 10 बजे तक तय किया गया है। इस दौरान वनकर्मी चिन्हित पेड़ों, ऊंची चट्टानों और जलस्रोतों के आसपास गिद्धों की संख्या, उनके घोंसलों और व्यवहार का रिकॉर्ड तैयार कर रहे हैं। गणना दल में वन परिक्षेत्र अधिकारी प्रवेश पाटीदार सहित पूरा अमला शामिल है।
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रायसेन में मिलीं गिद्धों की चार देसी प्रजातियां
इस बार की गणना में रायसेन के जंगलों के लिए सुखद खबर सामने आई है। एसडीओ पटले के अनुसार जिले में गिद्धों की चार देसी प्रजातियां दर्ज की गई हैं। इनमें लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध, व्हाइट-रम्प गिद्ध, इजिप्शियन गिद्ध और रेड-हेडेड गिद्ध शामिल हैं। इन प्रजातियों का मिलना वन मंडल के लिए संरक्षण की दृष्टि से अहम संकेत माना जा रहा है। इससे पता चलता है कि यहां का पर्यावरण अभी भी गिद्धों के अनुकूल है।
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साल में दो बार होती है गिद्ध गणना
वन विभाग के मुताबिक गिद्ध गणना साल में दो बार की जाती है। शीतकालीन गणना में स्थानीय गिद्धों के साथ हिमालय और मध्य एशिया से आने वाले प्रवासी गिद्ध भी शामिल होते हैं। वहीं ग्रीष्मकालीन गणना में केवल स्थानीय या देसी प्रजातियों को ही दर्ज किया जाता है। इसी कारण दोनों सीजन के आंकड़ों और प्रजातियों में अंतर देखने को मिलता है। शीतकालीन गणना पहले ही पूरी हो चुकी है। अब ग्रीष्मकालीन आंकड़ों से तुलना कर गिद्धों की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा।
डाइक्लोफेनाक से घटी थी गिद्धों की संख्या
गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र के सबसे महत्वपूर्ण पक्षियों में से एक माने जाते हैं। ये मरे हुए जानवरों को खाकर बीमारियां फैलने से रोकते हैं। पिछले दो दशकों में डाइक्लोफेनाक दवा और भोजन की कमी के कारण गिद्धों की संख्या तेजी से घटी है। ऐसे में हर साल होने वाली गणना से यह पता चलता है कि संरक्षण के प्रयास कितने सफल हो रहे हैं। रायसेन में चार देसी प्रजातियों का मिलना वन विभाग के लिए राहत की खबर है।
ग्रामीणों को भी किया जा रहा जागरूक
गणना के दौरान वन विभाग की टीमें आसपास के गांवों में लोगों को गिद्ध संरक्षण के प्रति जागरूक भी कर रही हैं। ग्रामीणों से अपील की जा रही है कि वे मवेशियों को डाइक्लोफेनाक इंजेक्शन न लगवाएं और मृत पशुओं को खुले में छोड़ें, ताकि गिद्धों को प्राकृतिक भोजन मिल सके।
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रिपोर्ट से तय होगी गिद्धों की वास्तविक स्थिति
तीन दिन तक चलने वाले इस अभियान के बाद सभी साइटों का डेटा एकत्र कर रिपोर्ट तैयार की जाएगी। इस रिपोर्ट से तय होगा कि रायसेन वन मंडल में गिद्धों की आबादी बढ़ रही है या अभी और प्रयासों की जरूरत है। वन विभाग को उम्मीद है कि इस बार के आंकड़े संरक्षण की नई राह खोलेंगे।

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