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बुंदेलखंड में बदलाव की बयार: क्या है पारंपरिक ‘जवारे’ की तकनीक? जानें महिलाओं ने कैसे दूर किया चारे का संकट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
Published by: सागर ब्यूरो
Updated Wed, 20 May 2026 08:42 AM IST
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सार
भीषण गर्मी और पानी की कमी के बीच सागर जिले की महिलाओं ने मवेशियों के लिए हरे चारे का अनोखा समाधान खोज निकाला है। ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी स्व-सहायता समूह की महिलाएं अब हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से बिना मिट्टी के पौष्टिक हरा चारा उगा रही हैं, जिससे जिले की 12 गौशालाओं को राहत मिल रही है। पढ़ें पूरी खबर
'हाइड्रोपोनिक्स विधि' से हरे चारे का किया ठोस इंतजाम।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भीषण गर्मी में जहां एक ओर बुंदेलखंड का बड़ा हिस्सा पानी की किल्लत से जूझ रहा है। वहीं, बेजुबान मवेशियों के लिए हरा चारा जुटाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। लेकिन इस बार सागर जिले से उम्मीद की एक ऐसी हरी-भरी किरण जागी है, जिसने इस पुरानी समस्या का एक बेहद आधुनिक और टिकाऊ समाधान ढूंढ निकाला है। जिले की 12 गौशालाओं में अब मवेशियों को भीषण गर्मी में भी पौष्टिक हरा चारा मिल रहा है, और यह कमाल कर दिखाया है ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाओं ने।
परंपरा और विज्ञान का अनोखा संगम
इस पूरी पहल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसका आइडिया कहीं बाहर से नहीं, बल्कि हमारी अपनी संस्कृति से आया है। हिंदू परंपरा में नवरात्रि के दौरान घरों में जो 'जवारे' बोए जाते हैं, उसी पारंपरिक सूझबूझ को वैज्ञानिक रूप देकर 'हाइड्रोपोनिक्स विधि' (बिना मिट्टी के पानी में पौधे उगाना) को अपनाया गया है। आजीविका मिशन की स्व-सहायता समूहों की महिलाओं ने इस तकनीक को बखूबी सीखकर बड़े पैमाने पर चारे का उत्पादन शुरू कर दिया है।
कम पानी में 'सुपर फूड' तैयार
सागर में छोटी-बड़ी 25 से ज्यादा गौशालाएं संचालित हो रही हैं, जो अक्सर गर्मी में चारे की कमी से परेशान रहती थीं। हाइड्रोपोनिक्स तकनीक इन गौशालाओं के लिए वरदान साबित हो रही है क्योंकि इस विधि में पारंपरिक खेती के मुकाबले बेहद कम पानी की जरूरत होती है, जो सागर जैसे जलसंकट वाले क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी राहत है। गेहूं, मक्का या जौ की मदद से सिर्फ एक हफ्ते के भीतर मवेशियों के लिए अत्यंत पौष्टिक और रसदार हरा चारा तैयार हो जाता है। यह चारा विटामिन्स और खनिजों से भरपूर होता है, जिससे मवेशियों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
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ये भी पढ़ें- Ujjain: चंदन से हुआ बाबा श्री महाकाल का श्रृंगार, त्रिपुंड और त्रिनेत्र ने मोहा मन; भस्म आरती में लगे जयकारे
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
इस नवाचार ने न सिर्फ बेजुबान जानवरों के पेट भरने का इंतजाम किया है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते भी खोले हैं। आजीविका मिशन के तहत महिलाएं खुद इस तकनीक का प्रबंधन कर रही हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास और आर्थिक स्थिति दोनों मजबूत हो रहे हैं।
सागर की यह पहल साबित करती है कि अगर हमारी पारंपरिक सूझबूझ को आधुनिक विज्ञान और महिला शक्ति का साथ मिल जाए, तो बुंदेलखंड की सदियों पुरानी समस्याओं को भी चुटकियों में सुलझाया जा सकता है। यह मॉडल पूरे प्रदेश और देश के सूखाग्रस्त इलाकों के लिए एक बेहतरीन मिसाल है।
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इस पूरी पहल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसका आइडिया कहीं बाहर से नहीं, बल्कि हमारी अपनी संस्कृति से आया है। हिंदू परंपरा में नवरात्रि के दौरान घरों में जो 'जवारे' बोए जाते हैं, उसी पारंपरिक सूझबूझ को वैज्ञानिक रूप देकर 'हाइड्रोपोनिक्स विधि' (बिना मिट्टी के पानी में पौधे उगाना) को अपनाया गया है। आजीविका मिशन की स्व-सहायता समूहों की महिलाओं ने इस तकनीक को बखूबी सीखकर बड़े पैमाने पर चारे का उत्पादन शुरू कर दिया है।
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कम पानी में 'सुपर फूड' तैयार
सागर में छोटी-बड़ी 25 से ज्यादा गौशालाएं संचालित हो रही हैं, जो अक्सर गर्मी में चारे की कमी से परेशान रहती थीं। हाइड्रोपोनिक्स तकनीक इन गौशालाओं के लिए वरदान साबित हो रही है क्योंकि इस विधि में पारंपरिक खेती के मुकाबले बेहद कम पानी की जरूरत होती है, जो सागर जैसे जलसंकट वाले क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी राहत है। गेहूं, मक्का या जौ की मदद से सिर्फ एक हफ्ते के भीतर मवेशियों के लिए अत्यंत पौष्टिक और रसदार हरा चारा तैयार हो जाता है। यह चारा विटामिन्स और खनिजों से भरपूर होता है, जिससे मवेशियों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
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आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
इस नवाचार ने न सिर्फ बेजुबान जानवरों के पेट भरने का इंतजाम किया है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते भी खोले हैं। आजीविका मिशन के तहत महिलाएं खुद इस तकनीक का प्रबंधन कर रही हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास और आर्थिक स्थिति दोनों मजबूत हो रहे हैं।
सागर की यह पहल साबित करती है कि अगर हमारी पारंपरिक सूझबूझ को आधुनिक विज्ञान और महिला शक्ति का साथ मिल जाए, तो बुंदेलखंड की सदियों पुरानी समस्याओं को भी चुटकियों में सुलझाया जा सकता है। यह मॉडल पूरे प्रदेश और देश के सूखाग्रस्त इलाकों के लिए एक बेहतरीन मिसाल है।

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