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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   A flight of hope in the Sanjay Tiger Reserve area, a large group of vultures was seen in Sidhi's Thonga.

खुशखबरी: संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र में उम्मीद की उड़ान, सीधी में दिखा गिद्धों का बड़ा समूह; मिल रहे ये संकेत

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीधी Published by: सीधी ब्यूरो Updated Sun, 11 Jan 2026 04:37 PM IST
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सार

सीधी जिले के ग्राम ठोंगा में गिद्धों का बड़ा झुंड दिखाई देने से क्षेत्र में उत्सुकता और उम्मीद का माहौल है। विलुप्तप्राय इस प्रजाति की मौजूदगी को जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

A flight of hope in the Sanjay Tiger Reserve area, a large group of vultures was seen in Sidhi's Thonga.
गिद्धों का एक बड़ा झुंड पेड़ पर बैठा हुआ। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सीधी जिले के मझौली जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत ठोंगा में 6 और 11 जनवरी को गिद्धों का एक बड़ा झुंड देखे जाने से क्षेत्र में उत्सुकता और उम्मीद का माहौल बन गया है। विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी इस दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों को ग्रामीणों ने अपने कैमरों में कैद किया, जिसके बाद वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के बीच इस विषय पर चर्चा तेज हो गई है। वर्षों बाद इस तरह गिद्धों का झुंड दिखाई देना जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

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गिद्ध कत्थई और काले रंग के भारी कद-काठी वाले पक्षी होते हैं, जिनकी दृष्टि अत्यंत तीव्र होती है। शिकारी पक्षियों की तरह इनकी चोंच टेढ़ी और मजबूत होती है, हालांकि इनके पंजे उतने शक्तिशाली नहीं होते। गिद्ध झुंड में रहने वाले मुर्दाखोर पक्षी हैं, जो मृत पशुओं और सड़े-गले मांस को खाकर प्रकृति की स्वच्छता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी कारण इन्हें “प्राकृतिक सफाईकर्मी” भी कहा जाता है।

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गिद्धों की औसत आयु 40 से 45 वर्ष मानी जाती है, जबकि ये चार से छह वर्ष की आयु में प्रजनन योग्य होते हैं। इनकी दृष्टि इंसानों की तुलना में लगभग आठ गुना अधिक तेज होती है और ये खुले मैदान में करीब चार मील दूर से भी शव देख सकते हैं।

दो दशकों में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई
पिछले दो दशकों में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इसका प्रमुख कारण पशुचिकित्सा में उपयोग की जाने वाली डिक्लोफेनिक दवा रही है, जो मृत पशुओं के मांस के साथ गिद्धों के शरीर में पहुंचकर उनकी किडनी फेल कर देती है। वर्ष 2008 में इस दवा पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद इसके दुष्प्रभाव लंबे समय तक देखे गए। इसके अलावा हाई टेंशन बिजली टावरों और तारों से टकराने के कारण भी गिद्धों की मौत और पलायन की घटनाएं सामने आई हैं।

इस संबंध में संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र के एसडीओ सुधीर मिश्रा ने बताया कि गिद्ध एक विलुप्तप्राय प्रजाति है और सीधी जिले में इनका दिखाई देना इस बात का संकेत है कि क्षेत्र में इनके लिए अनुकूल वातावरण बन रहा है। उन्होंने कहा कि संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र में पक्षियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे वन प्रबंधन उत्साहित है।
 

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एक तालाब के पास बैठे हुए गिद्ध।

 

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एक समूह में बैठे हुए गिद्ध।

 

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