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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Ujjain News: Mystery of 5,000-Year-Old Boreshwar Mahadev Temple, Sacred Water Never Runs Dry

Ujjain News: 5000 साल पुराने बोरेश्वर महादेव का अनोखा चमत्कार, जलाधारी से कभी खत्म नहीं होता जल, जानें रहस्य

Wed, 05 Aug 2026 06:30 AM IST
उज्जैन ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: उज्जैन ब्यूरो Updated Wed, 05 Aug 2026 06:30 AM IST
सार

लगभग पांच हजार वर्ष पुराना बोरेश्वर महादेव मंदिर आज भी अपनी रहस्यमयी जलाधारी को लेकर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां चढ़ाया गया जल पाताल गंगा में समा जाता है और जलाधारी कभी खाली नहीं होती।

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Ujjain News: Mystery of 5,000-Year-Old Boreshwar Mahadev Temple, Sacred Water Never Runs Dry
बाेरेश्वर महादेव का अनोखा रहस्य - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मालवा की पावन धरा पर शक्ति और शिव उपासना के अनेक प्राचीन प्रमाण मिलते हैं। इन्हीं में से एक है उज्जैन से लगभग 36 किलोमीटर दूर दंगवाड़ा गांव स्थित बोरेश्वर महादेव मंदिर, जो करीब 5,000 वर्ष प्राचीन माना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित स्वयंभू शिवलिंग की जलाधारी है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसमें जल का स्तर कभी कम या अधिक नहीं होता।

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मंदिर के पुजारी प्रकाश शर्मा के अनुसार बोरेश्वर महादेव एक सिद्ध एवं अतिप्राचीन तीर्थ है। मान्यता है कि यहां 12 ज्योतिर्लिंगों का समावेश है। सबसे बड़ा चमत्कार इसकी जलाधारी है। श्रद्धालु कितनी भी मात्रा में जल अर्पित करें, जल का स्तर हमेशा समान बना रहता है। लोकमान्यता है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल सीधे पाताल गंगा में समा जाता है।
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पुजारी का कहना है कि समय-समय पर इस प्राकृतिक जलधारा को समाप्त करने के प्रयास किए गए लेकिन हर बार जल पुनः स्वतः प्रकट हो गया। श्रद्धालु जलकुंभ में सिक्के भी अर्पित करते हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि वे पाताल गंगा में विलीन हो जाते हैं।
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चंबल नदी करती है परिक्रमा
बोरेश्वर महादेव मंदिर चंबल नदी के किनारे स्थित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार मां चंबल स्वयं मंदिर की परिक्रमा करती हुई आगे बढ़ती हैं लेकिन महादेव के सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करतीं। ग्रामीणों का यह भी विश्वास है कि नंदी महाराज रात्रि में यहां विचरण करते हैं और कई भक्तों को उनके दर्शन हुए हैं। कुछ लोगों का दावा है कि मंदिर में रात के समय घंटी और घड़ियाल अपने आप बजने की घटनाएं भी देखी गई हैं।

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पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है मंदिर
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस स्थान का संबंध माता सती की तपस्या और भगवान गणेश के प्राकट्य से माना जाता है। कहा जाता है कि माता सती ने यहीं कठोर तप किया था। एक लोककथा के अनुसार उन्होंने अपने उबटन से भगवान गणेश का निर्माण कर उनमें प्राण स्थापित किए। जब गणेशजी ने वाहन की इच्छा जताई तो भगवान शिव स्वयं उनके वाहन बने। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मानव रूप में भगवान गणेश और जीव रूप में भगवान शिव के प्राकट्य से भी इस स्थान का संबंध माना जाता है।


एक अन्य लोककथा के अनुसार प्राचीन समय में यहां एक खेड़ा बसा था। बोरेश्वर नामक व्यक्ति को खेत में हल चलाते समय शिवलिंग प्राप्त हुआ। इसके बाद यहां मंदिर की स्थापना की गई और उसी के नाम पर इसका नाम बोरेश्वर महादेव पड़ा। कुछ लोग शिवलिंग की आकृति को बोर (बेर) के समान होने को भी इस नाम का कारण मानते हैं।

सावन में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
श्रावण मास में बोरेश्वर महादेव मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। इस दौरान भगवान शिव का आकर्षक शृंगार किया जाता है और प्रत्येक सोमवार को भव्य सवारी निकाली जाती है। वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। कांवड़िये नियमित रूप से जलाभिषेक करते हैं तथा मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां सच्चे मन से दर्शन और पूजा करने पर भगवान बोरेश्वर महादेव सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

 

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