व्याख्यानमाला: वरिष्ठ न्यायाधीश शुक्ला बोले- AI न्याय प्रणाली में सहयोगी बन सकता है, मानवीय संवेदना में नहीं
भारतीय ज्ञानपीठ की 23वीं सद्भावना व्याख्यानमाला के पांचवें दिन न्यायमूर्ति अनिल शुक्ला ने कहा- AI न्यायिक कार्यों में पुराने फैसले खोजने व अनुवाद में सहायक, लेकिन मानवीय भावनाओं व गवाही के संकेतों को नहीं समझ सकता। इसे केवल सहायक बनाएं, अंतिम निर्णय मानव का हो। न्यायमूर्ति गौतम चौरडिया ने AI के डेटा कैप्चर पर सावधान जताया।
विस्तार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न्यायिक कार्यों को काफी आसान और तेज बना सकता है, लेकिन इसके साथ उतनी ही सावधानी की भी आवश्यकता है क्योंकि सही उपयोग जहां फैसले बेहतर बना सकता है, वहीं गलत उपयोग उल्टा असर भी डाल सकता है। न्याय केवल कागजों के आधार पर नहीं होता, यह मानवीय भावनाओं, परिस्थितियों और व्यवहार को समझने की प्रक्रिया है। अदालत में गवाही का मतलब सिर्फ बोले गए शब्द नहीं होता। गवाह की आवाज का उतार-चढ़ाव, उसके चेहरे के भाव, बोलने का तरीका, आत्मविश्वास या झिझक—ये सब बातें मिलकर यह तय करने में मदद करती हैं कि वह क्या कह रहा है और कैसे कह रहा है। इन मानवीय संकेतों को कोई मशीन पूरी तरह नहीं पकड़ सकती इसलिए ऐसे मामलों में एआई इंसान की जगह नहीं ले सकता। इंसान की समझ, अनुभूति और संवेदना की अपनी एक अलग महत्ता है।
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ये बातें छत्तीसगढ़ राज्य की शुल्क नियामक समिति के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति अनिल शुक्ला ने स्व. कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा और पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की स्मृति में भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित 23वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला के पांचवें दिवस पर मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए। कार्यक्रम का आरंभ संस्थान की शिक्षिकाओं द्वारा सद्भावना एवं देशभक्ति गीत से हुई। दीप प्रज्वलन पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश उदय सिंह बहरावत, बार एसोसिएशन उज्जैन के पूर्व अध्यक्ष अशोक यादव विधिक सेवा प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिवक्ता हरदयाल सिंह ठाकुर द्वारा किया गया। अतिथि स्वागत संस्था प्रमुख युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ, डायरेक्टर अमृता कुलश्रेष्ठ ने किया। इस अवसर पर बार एसोसिएशन अध्यक्ष ओम सारवान, अधिवक्ता आशीष उपाध्याय, राजेश जैन, दिनेश पंडया, चंद्रमौली श्रीवास्तव, प्रेमचंद सृजन पीठ के अध्यक्ष मुकेश जोशी, प्रो. ममता शर्मा, कालिंदिनी धापरे, सुशीला जैन, प्रो. बीके आंजना उपाध्याय, अरुण कुमार सोनी, डॉ शैलेंद्र पाराशर सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
एआई को केवल सहायक साधन की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए
एआई युग में सामाजिक सरोकार एवं न्याय के उपादान विषय पर अपनी बात रखते हुए न्यायमूर्ति अनिल शुक्ला ने कहा कि एआई न्यायालयों में कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो रहा है। पुराने फैसलों को खोजने का काम, जो पहले अधिवक्ताओं का काफी समय लेता था, अब बहुत तेजी से हो जाता है। एआई की मदद से आवश्यक फैसले, संदर्भ, और उदाहरण तुरंत मिल जाते हैं, जिससे तैयारी का समय कम होता है और काम सरल बनता है। न्यायालयों में अनुवाद भी एक बड़ा और समय लेने वाला कार्य रहा है। कई फैसले अलग-अलग भाषाओं में होने से उन्हें समझना कठिन होता था। एआई आधारित अनुवाद से दस्तावेज जल्दी और स्पष्ट रूप से उपलब्ध हो जाते हैं, जिससे मामले आगे बढ़ाने में आसानी होती है। कई त्रुटियां भी शुरुआती चरण में ही पकड़ में आ जाती हैं, और मैन्युअल मेहनत तथा खर्च दोनों कम होते हैं। फिर भी, एआई पर पूरी तरह निर्भर होना उचित नहीं है। यदि डेटा गलत हो या विश्लेषण में गलती हो जाए, तो निर्णय गलत दिशा में भी जा सकता है। इसीलिए एआई को केवल सहायक साधन की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि अंतिम निर्णय लेने वाले के तौर पर।
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हमारे मन, हमारी रुचि और हमारी पसंद को किया जा रहा कैप्चर
समारोह की अध्यक्षता करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति माननीय गौतम चौरडिया ने कहा कि न्याय व्यवस्था के संदर्भ में भी स्पीडी जजमेंट का लक्ष्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है, किंतु इसका उपयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए। उपभोक्तावाद के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नियंत्रण ने उपभोक्ता संबंधी समस्याएं उत्पन्न की हैं। जिन आवश्यकताओं से संबंधित सामग्री हम इंटरनेट पर खोजते हैं, उनसे जुड़े विज्ञापन तुरंत दिखाई देने लगते हैं। इसका अर्थ है कि हमारे मन, हमारी रुचि और हमारी पसंद को कैप्चर किया जा रहा है। यही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का वह पक्ष है जिस पर हमें अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है।




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