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Explainer: क्या है यूसीसी कानून? मध्यप्रदेश में कहां तक पहुंची इसकी तैयारी; जानें पक्ष-विपक्ष के तर्क व दावे?
सार
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की तैयारी अंतिम चरण में पहुंच रही है। सरकार की गठित समिति विभिन्न वर्गों से सुझाव जुटा रही है और मानसून सत्र में विधेयक पेश होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में जानिए यूसीसी क्या है, इसका उद्देश्य क्या है और मध्य प्रदेश में इसकी तैयारी कहां तक पहुंची है। कांग्रेस और मुस्लिम पक्ष के लोगों की इस मुद्दे को लेकर क्या राय है? चलिए जानते हैं।
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मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर तैयारियां तेजी से चल रही हैं।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर तैयारियां तेजी से चल रही हैं। राज्य सरकार द्वारा गठित समिति विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक अधिकारों से जुड़े विभिन्न प्रावधानों पर अध्ययन के साथ ही जनता से राय ले रही है। इसके बाद फाइनल ड्राफ्ट तैयार किया जाएगा। सरकार संकेत दे चुकी है कि आगामी 20 जुलाई से प्रस्तावित विधानसभा के मानसून सत्र में इस संबंध में विधेयक पेश किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो उत्तराखंड और गुजरात के बाद मध्य प्रदेश यूसीसी लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन जाएगा।
क्या है यूसीसी?
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य अलग-अलग धर्मों और समुदायों में लागू व्यक्तिगत कानूनों की जगह नागरिकों के लिए एक समान पारिवारिक व्यवस्था लागू करना है। इसके तहत विवाह, तलाक, गोद लेने, भरण-पोषण और संपत्ति के अधिकार जैसे मामलों में समान नियम लागू किए जाते हैं। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद-44 भी राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने के प्रयास करने का मार्गदर्शन देता है।
मध्य प्रदेश में किस स्तर तक पहुंची तैयारी?
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित की है। समिति अलग-अलग जिलों में जाकर सामाजिक संगठनों, महिला समूहों, विधि विशेषज्ञों और आम नागरिकों से सुझाव जुटा रही है। साथ ही ऑनलाइन माध्यम से यूसीसी.com पर भी नागरिकों की राय ली जा रही है, ताकि कानून को व्यापक सामाजिक समर्थन के साथ अंतिम रूप दिया जा सके।
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क्या है यूसीसी?
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य अलग-अलग धर्मों और समुदायों में लागू व्यक्तिगत कानूनों की जगह नागरिकों के लिए एक समान पारिवारिक व्यवस्था लागू करना है। इसके तहत विवाह, तलाक, गोद लेने, भरण-पोषण और संपत्ति के अधिकार जैसे मामलों में समान नियम लागू किए जाते हैं। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद-44 भी राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने के प्रयास करने का मार्गदर्शन देता है।
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मध्य प्रदेश में किस स्तर तक पहुंची तैयारी?
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित की है। समिति अलग-अलग जिलों में जाकर सामाजिक संगठनों, महिला समूहों, विधि विशेषज्ञों और आम नागरिकों से सुझाव जुटा रही है। साथ ही ऑनलाइन माध्यम से यूसीसी.com पर भी नागरिकों की राय ली जा रही है, ताकि कानून को व्यापक सामाजिक समर्थन के साथ अंतिम रूप दिया जा सके।
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यूसीसी।
- फोटो : अमर उजाला
किन चार प्रमुख विषयों पर रहेगा फोकस?
प्रस्तावित मसौदे में चार प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इसमें पहला- विवाह व्यवस्था, जिसमें सभी समुदायों के लिए विवाह पंजीकरण और वैधानिक प्रक्रिया को एकरूप बनाने पर जोर रहेगा। दूसरा तलाक और भरण-पोषण है, जिसमें तलाक से जुड़े अलग-अलग धार्मिक प्रावधानों की जगह एक समान कानूनी प्रक्रिया लागू हो सकती है। साथ ही महिला और बच्चों के भरण-पोषण के अधिकारों को स्पष्ट किया जाएगा।
तीसरा संपत्ति और उत्तराधिकार है, जिसमें पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों को समान बनाने की दिशा में प्रावधान तैयार जाएंगे। वहीं, चौथा लिव-इन रिलेशनशिप है, जिसमें लिव-इन संबंधों को कानूनी ढांचे में लाने के लिए विशेष प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं।
प्रस्तावित मसौदे में चार प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इसमें पहला- विवाह व्यवस्था, जिसमें सभी समुदायों के लिए विवाह पंजीकरण और वैधानिक प्रक्रिया को एकरूप बनाने पर जोर रहेगा। दूसरा तलाक और भरण-पोषण है, जिसमें तलाक से जुड़े अलग-अलग धार्मिक प्रावधानों की जगह एक समान कानूनी प्रक्रिया लागू हो सकती है। साथ ही महिला और बच्चों के भरण-पोषण के अधिकारों को स्पष्ट किया जाएगा।
तीसरा संपत्ति और उत्तराधिकार है, जिसमें पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों को समान बनाने की दिशा में प्रावधान तैयार जाएंगे। वहीं, चौथा लिव-इन रिलेशनशिप है, जिसमें लिव-इन संबंधों को कानूनी ढांचे में लाने के लिए विशेष प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं।
लिव-इन संबंधों को लेकर क्या हो सकती है व्यवस्था?
जानकारी के अनुसार प्रस्तावित प्रावधानों में लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाया जा सकता है। इसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया जा रहा है। ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को उत्तराधिकार और भरण-पोषण के मामलों में कानूनी संरक्षण मिलने का प्रावधान भी शामिल किया जा सकता है।
महिलाओं के अधिकारों पर विशेष जोर
यूसीसी के मसौदे में लैंगिक समानता प्रमुख आधार माना गया है। संपत्ति, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और पारिवारिक अधिकारों से जुड़े मामलों में महिलाओं को समान कानूनी दर्जा देने की दिशा में प्रावधान तैयार किए गए हैं।
जानकारी के अनुसार प्रस्तावित प्रावधानों में लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाया जा सकता है। इसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया जा रहा है। ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को उत्तराधिकार और भरण-पोषण के मामलों में कानूनी संरक्षण मिलने का प्रावधान भी शामिल किया जा सकता है।
महिलाओं के अधिकारों पर विशेष जोर
यूसीसी के मसौदे में लैंगिक समानता प्रमुख आधार माना गया है। संपत्ति, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और पारिवारिक अधिकारों से जुड़े मामलों में महिलाओं को समान कानूनी दर्जा देने की दिशा में प्रावधान तैयार किए गए हैं।
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव।
- फोटो : अमर उजाला
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
यदि यूसीसी लागू होता है तो विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में अलग-अलग धार्मिक कानूनों की जगह एक समान प्रक्रिया लागू होगी। इससे कानूनी विवादों में स्पष्टता बढ़ने और न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों को लेकर बहस भी जारी है। समर्थक इसे समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ संगठन धार्मिक परंपराओं और व्यक्तिगत कानूनों पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यहीं वजह है कि सरकार ने आदिवासी समाज को गुजरात और उत्तराखंड के अनुसार ही यूसीसी में शामिल नहीं करने का निर्णय लिया है।
22% आबादी को यूसीसी में छूट क्यों?
मध्य प्रदेश की कुल आबादी में आदिवासी वर्ग करीब 22 प्रतिशत हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा में 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। वहीं, 80 से ज्यादा सीटों पर समाज का प्रभाव हैं। आदिवासी वर्ग के संस्कृति, परंपराएं और रीति रिवाज से वंचित करने को लेकर विपक्ष भी सरकार को घेर रहा है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि आदिवासी समाज पर यूसीसी की पांबंदिया लागू नहीं होगी।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव अपने पूर्व एक बयान में कह चुके हैं कि राज्य सरकार विधानसभा सत्र में कई महत्वपूर्ण और समसामयिक विषयों से जुड़े प्रस्ताव लेकर आ रही है। इनमें समान नागरिक संहिता का विषय भी प्रमुख है। उन्होंने विश्वास जताया कि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है और विधानसभा में इस पर सार्थक चर्चा होगी
यदि यूसीसी लागू होता है तो विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में अलग-अलग धार्मिक कानूनों की जगह एक समान प्रक्रिया लागू होगी। इससे कानूनी विवादों में स्पष्टता बढ़ने और न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों को लेकर बहस भी जारी है। समर्थक इसे समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ संगठन धार्मिक परंपराओं और व्यक्तिगत कानूनों पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यहीं वजह है कि सरकार ने आदिवासी समाज को गुजरात और उत्तराखंड के अनुसार ही यूसीसी में शामिल नहीं करने का निर्णय लिया है।
22% आबादी को यूसीसी में छूट क्यों?
मध्य प्रदेश की कुल आबादी में आदिवासी वर्ग करीब 22 प्रतिशत हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा में 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। वहीं, 80 से ज्यादा सीटों पर समाज का प्रभाव हैं। आदिवासी वर्ग के संस्कृति, परंपराएं और रीति रिवाज से वंचित करने को लेकर विपक्ष भी सरकार को घेर रहा है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि आदिवासी समाज पर यूसीसी की पांबंदिया लागू नहीं होगी।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव अपने पूर्व एक बयान में कह चुके हैं कि राज्य सरकार विधानसभा सत्र में कई महत्वपूर्ण और समसामयिक विषयों से जुड़े प्रस्ताव लेकर आ रही है। इनमें समान नागरिक संहिता का विषय भी प्रमुख है। उन्होंने विश्वास जताया कि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है और विधानसभा में इस पर सार्थक चर्चा होगी
अंग्रेजों के समय ही उठा था एकरूपता का विचार
1835 में ब्रिटिश शासन के दौरान पहली बार भारतीय कानूनों में एकरूपता लाने का विचार सामने आया था। हालांकि अंग्रेजों ने आपराधिक और प्रशासनिक कानूनों में तो एकरूपता लागू की, लेकिन विवाह, उत्तराधिकार और धार्मिक मामलों को समुदायों के पर्सनल लॉ के अधीन ही रखा।
आगे क्या?
सरकार की ओर से संकेत हैं कि मसौदे को अंतिम रूप दिए जाने के बाद विधानसभा के मानसून सत्र में विधेयक पेश किया जा सकता है। बता दें मध्य प्रदेश में 20 जुलाई से पांच दिवसीय सत्र प्रस्तावित हैं। यदि सदन से मंजूरी मिलती है तो मध्य प्रदेश देश में यूसीसी लागू करने वाले राज्यों में शामिल हो जाएगा।
उत्तराखंड और गुजरात में यूसीसी लागू होने के बाद क्या बदला?
उत्तराखंड 27 जनवरी 2025 को यूसीसी लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना। वहां विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए समान नियम लागू किए गए। लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाया गया है, जबकि बहुविवाह, ट्रिपल तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं को मान्यता नहीं दी गई। महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को भी कानूनी सुरक्षा दी गई है। हालांकि इसमें आदिवासी वर्ग को अलग रखा गया है।
1835 में ब्रिटिश शासन के दौरान पहली बार भारतीय कानूनों में एकरूपता लाने का विचार सामने आया था। हालांकि अंग्रेजों ने आपराधिक और प्रशासनिक कानूनों में तो एकरूपता लागू की, लेकिन विवाह, उत्तराधिकार और धार्मिक मामलों को समुदायों के पर्सनल लॉ के अधीन ही रखा।
आगे क्या?
सरकार की ओर से संकेत हैं कि मसौदे को अंतिम रूप दिए जाने के बाद विधानसभा के मानसून सत्र में विधेयक पेश किया जा सकता है। बता दें मध्य प्रदेश में 20 जुलाई से पांच दिवसीय सत्र प्रस्तावित हैं। यदि सदन से मंजूरी मिलती है तो मध्य प्रदेश देश में यूसीसी लागू करने वाले राज्यों में शामिल हो जाएगा।
उत्तराखंड और गुजरात में यूसीसी लागू होने के बाद क्या बदला?
उत्तराखंड 27 जनवरी 2025 को यूसीसी लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना। वहां विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए समान नियम लागू किए गए। लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाया गया है, जबकि बहुविवाह, ट्रिपल तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं को मान्यता नहीं दी गई। महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को भी कानूनी सुरक्षा दी गई है। हालांकि इसमें आदिवासी वर्ग को अलग रखा गया है।
मध्य प्रदेश में यूसीसी समिति कब बनी और क्या काम हुआ?
मध्य प्रदेश सरकार ने अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में छह सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति को यूसीसी का मसौदा तैयार करने, अन्य राज्यों के मॉडल का अध्ययन करने और जनता से सुझाव लेने की जिम्मेदारी दी गई। सरकार ने सुझावों के लिए विशेष वेबसाइट भी शुरू की, जहां नागरिकों से ऑनलाइन राय मांगी गई।
किन कानूनों और मामलों पर पड़ेगा असर?
यूसीसी लागू होने पर विवाह, तलाक, भरण-पोषण, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मामलों में अलग-अलग धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह समान नियम लागू हो सकते हैं। इसका उद्देश्य पारिवारिक मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था स्थापित करना है।
किन वर्गों और समुदायों से सुझाव लिए गए?
सरकार के अनुसार समिति विभिन्न जिलों में जाकर अलग-अलग धर्मों, सामाजिक संगठनों, महिला समूहों और नागरिकों से सुझाव एकत्र कर रही है। ऑनलाइन माध्यम से भी आम जनता को अपने सुझाव देने का अवसर दिया गया।
मध्य प्रदेश सरकार ने अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में छह सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति को यूसीसी का मसौदा तैयार करने, अन्य राज्यों के मॉडल का अध्ययन करने और जनता से सुझाव लेने की जिम्मेदारी दी गई। सरकार ने सुझावों के लिए विशेष वेबसाइट भी शुरू की, जहां नागरिकों से ऑनलाइन राय मांगी गई।
किन कानूनों और मामलों पर पड़ेगा असर?
यूसीसी लागू होने पर विवाह, तलाक, भरण-पोषण, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मामलों में अलग-अलग धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह समान नियम लागू हो सकते हैं। इसका उद्देश्य पारिवारिक मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था स्थापित करना है।
किन वर्गों और समुदायों से सुझाव लिए गए?
सरकार के अनुसार समिति विभिन्न जिलों में जाकर अलग-अलग धर्मों, सामाजिक संगठनों, महिला समूहों और नागरिकों से सुझाव एकत्र कर रही है। ऑनलाइन माध्यम से भी आम जनता को अपने सुझाव देने का अवसर दिया गया।
जीतू पटवारी, मध्य प्रदेश प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष।
- फोटो : अमर उजाला
'पहले दूसरे राज्यों का आकलन बताए सरकार'
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही कवायद के बीच कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि यूसीसी मूल रूप से केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है, लेकिन राज्य में इसे मुद्दा बनाकर जनता का ध्यान असली समस्याओं से हटाने का प्रयास किया जा रहा है।
पटवारी ने कहा कि गुजरात, असम और उत्तराखंड जैसे राज्यों में यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसे में मध्य प्रदेश में आगे बढ़ने से पहले सरकार को यह बताना चाहिए कि उन राज्यों में इसके क्या परिणाम सामने आए, क्या फायदे हुए और किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि बिना किसी विस्तृत मूल्यांकन के प्रदेश में यूसीसी पर चर्चा शुरू करना जल्दबाजी होगी।
पटवारी ने आदिवासी समाज को लेकर जताई चिंता
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि मध्य प्रदेश की सामाजिक संरचना अन्य राज्यों से अलग है। यहां बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय निवास करता है, जिनकी अपनी परंपराएं, सामाजिक व्यवस्थाएं और सांस्कृतिक पहचान है। पटवारी ने सवाल उठाया कि क्या यूसीसी लागू होने से आदिवासी समाज के पारंपरिक अधिकारों और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं पर असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस पहलू पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही कवायद के बीच कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि यूसीसी मूल रूप से केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है, लेकिन राज्य में इसे मुद्दा बनाकर जनता का ध्यान असली समस्याओं से हटाने का प्रयास किया जा रहा है।
पटवारी ने कहा कि गुजरात, असम और उत्तराखंड जैसे राज्यों में यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसे में मध्य प्रदेश में आगे बढ़ने से पहले सरकार को यह बताना चाहिए कि उन राज्यों में इसके क्या परिणाम सामने आए, क्या फायदे हुए और किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि बिना किसी विस्तृत मूल्यांकन के प्रदेश में यूसीसी पर चर्चा शुरू करना जल्दबाजी होगी।
पटवारी ने आदिवासी समाज को लेकर जताई चिंता
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि मध्य प्रदेश की सामाजिक संरचना अन्य राज्यों से अलग है। यहां बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय निवास करता है, जिनकी अपनी परंपराएं, सामाजिक व्यवस्थाएं और सांस्कृतिक पहचान है। पटवारी ने सवाल उठाया कि क्या यूसीसी लागू होने से आदिवासी समाज के पारंपरिक अधिकारों और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं पर असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस पहलू पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
हाजी मोहम्मद हारून।
- फोटो : अमर उजाला
यूसीसी पर जमीयत का बड़ा हमला: बोले- मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल बर्दाश्त नहीं
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही कवायद के बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रदेश अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून ने सरकार के प्रस्तावित प्रावधानों पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश में अधिकांश सिविल कानून पहले से लागू हैं, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ को संविधान का संरक्षण प्राप्त है और उसमें किसी भी तरह की छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जाएगी। अमर उजाला से चर्चा के दौरान हाजी हारून ने कहा कि यूसीसी के नाम पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रावधानों की बात की जा रही है। यदि पूरे देश के लिए एक समान कानून बनाना है तो यह काम संसद के स्तर पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान और हदीस पर आधारित है, जिसे मुस्लिम समाज मानता और उस पर अमल करता है।
लिव-इन रिलेशनशिप पर जताई कड़ी आपत्त
हाजी हारून ने प्रस्तावित यूसीसी में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि विवाह, निकाह और शादी जैसे पवित्र रिश्तों को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना था कि बिना विवाह के संबंधों को कानूनी मान्यता देना समाज और पारिवारिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। उन्होंने कहा, हम पवित्र रिश्तों की बात करते हैं। शादी और परिवार की संस्था को मजबूत किया जाना चाहिए, जबकि लिव-इन रिलेशनशिप को बढ़ावा देना भारतीय सामाजिक मूल्यों के विपरीत है।
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही कवायद के बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रदेश अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून ने सरकार के प्रस्तावित प्रावधानों पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश में अधिकांश सिविल कानून पहले से लागू हैं, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ को संविधान का संरक्षण प्राप्त है और उसमें किसी भी तरह की छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जाएगी। अमर उजाला से चर्चा के दौरान हाजी हारून ने कहा कि यूसीसी के नाम पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रावधानों की बात की जा रही है। यदि पूरे देश के लिए एक समान कानून बनाना है तो यह काम संसद के स्तर पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान और हदीस पर आधारित है, जिसे मुस्लिम समाज मानता और उस पर अमल करता है।
लिव-इन रिलेशनशिप पर जताई कड़ी आपत्त
हाजी हारून ने प्रस्तावित यूसीसी में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि विवाह, निकाह और शादी जैसे पवित्र रिश्तों को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना था कि बिना विवाह के संबंधों को कानूनी मान्यता देना समाज और पारिवारिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। उन्होंने कहा, हम पवित्र रिश्तों की बात करते हैं। शादी और परिवार की संस्था को मजबूत किया जाना चाहिए, जबकि लिव-इन रिलेशनशिप को बढ़ावा देना भारतीय सामाजिक मूल्यों के विपरीत है।
