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म्यूजियम ऑफ फ्यूचर क्यों बन रहा है कौतूहल का विषय?

Wed, 20 Nov 2019 07:58 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नवनीत राठौर Updated Wed, 20 Nov 2019 07:58 PM IST
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museum of the future the building designed by an unique design
Museum of Future - फोटो : BBC

ये है म्यूजियम ऑफ फ्यूचर। यानी भविष्य का अजायबघर। इस इमारत का फ्रेमवर्क आयताकार 2400 स्टील की छड़ों से तैयार किया गया था। ये ढांचा पिछले साल नवंबर में तैयार हुआ था। तब से अब तक केवल इस ढांचे के ऊपर पैनल लगाने का काम चल रहा है। ये संग्रहालय एक साल में खोला जाना है। और, इसे बनाने की जो रफ्तार है, उससे आशंका पैदा होती है कि ये वक्त पर तैयार हो भी पाएगी या नहीं। लेकिन, इमारतें बनाने वालों को पक्का यकीन है कि वो अक्तूबर 2020 तक म्यूजियम ऑफ फ्यूचर को जनता के लिए खोल देंगे। उसी समय दुबई में वर्ल्ड एक्स्पो होने वाला है।





म्यूजियम ऑफ फ्यूचर के कार्यकारी निदेशक लैथ कार्लसन कहते हैं कि, इस इमारत का आकार आंखों जैसा है। कार्लसन ये मानते हैं कि इमारत का आकार ऐसा कुछ खास नहीं है, जो लोगों को बहुत आकर्षित करे। इस बिल्डिंग को बनाने का ठेका 2015 में दुबई की ही एक कंपनी किला डिजाइन को मिला था। उनका कहना है कि इमारत का जो ठोस हिस्सा है, वो हमारे मौजूदा ज्ञान को दर्शाता है। वहीं, भीतर का जो खालीपन है, वो उन चीजों का प्रतीक है, जो हम नहीं जानते, यानी हमारा मुस्तकबिल। संयुक्त अरब अमीरात तेज़ी से तरक्की कर रहा है। यहां सैकड़ों इमारतें बन रही हैं। इन सभी में ये म्यूजियम ऑफ फ्यूचर बिल्कुल अलग नजर आता है।

museum of the future the building designed by an unique design
Museum of Future - फोटो : BBC

क्या है म्यूजियम ऑफ फ्यूचर की खासियत?

ढांचे के ऊपर जो पैनल लगाए जा रहे हैं, उन में अरबी भाषा में कुछ लिखा हुआ है। हालांकि इस के निर्माताओं ने ये नहीं बताया कि अरबी में लिखा क्या है। लेकिन, सूत्रों के मुताबिक, ये दुबई के शासक शेख मुहम्मद बिन राशिद अल मकतूम की लिखी हुई कविताएं हैं। हाथ से लिखी हुई ये कविताएं, म्यूजियम की खिड़कियों का भी काम करेंगी। दिन में इनके जरिए रौशनी छन कर भीतर जाया करेगी। वहीं रात में अंदर की रौशनी बाहर निकल कर इसे अद्भुत मंजर की शक्ल देगी। म्यूजियम ऑफ फ्यूचर की ऊंचाई 78 मीटर है। इसमें रौशनी के लिए चौदह किलोमीटर लंबी एलईडी लाइट्स लगाई जा रही हैं।

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Museum of Future - फोटो : BBC

कैसे बना इंजीनियरिंग का यह नमूना?

हाथ से लिखी ये कविताएं और इस इमारत के आकार ने बनाने वालों के लिए बहुत बड़ी चुनौती खड़ी की है। हर स्टील फ्रेम, हर पैनल को खास तरह से ही काटा जा रहा है, क्योंकि ये सामान्य आकार नहीं है कि फ्रेम लाकर लगाया और उसके ऊपर पैनल जड़ कर इमारत तैयार कर दी। इस इमारत को बनाने में प्रमुख सलाहकार ब्रिटेन की ब्यूरोहैपोल्ड इंजीनियरिंग फर्म है। कंपनी के आर्किटेक्ट का कहना है कि इस इमारत का डिजाइन बिल्डिंग इन्फॉर्मेशन मॉडलिंग यानी BIM से तैयार किया गया है। ये डिजाइन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया जाता है। ताकि हर मोड़, हर पेंच और हर घुमाव का सटीक अनुमान लगाया जा सके। बिम एक थ्री-डी मॉडल पर काम करता है।

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Museum of Future - फोटो : BBC

ब्यूरोहैपोल्ड इंजीनियरिंग के टोबाइस बॉली कहते हैं कि, "रेखागणित की मदद से ये खास डिजाइन तैयार करना कम-ओ-बेश नामुमकिन था। हमें सब कुछ डिजिटल तरीके से करना था। अगर हम हाथ से डिजाइन बनाते तो, सोचते कुछ और बन जाता कुछ और। इस तरह से बनाना भी मुश्किल था। तकनीक की मदद से ही ये इमारत हम इतनी आसानी से बना पा रहे हैं।"

पहले प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने इस बिल्डिंग का 2D मॉडल तैयार किया। इसके लिए प्रोजेक्ट में शामिल सभी लोगों को पहले BIM को अच्छे से समझना पड़ा। सबसे पहले कंप्यूटर की मदद से इस डिजाइन के मुश्किल पेंच-ओ-खम से निपटने की कोशिश हुई। बारीक से बारीक बदलावों को कंप्यूटर पर ही आजमाया गया। इस में काफी वक्त लग गया। हालांकि इन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता। लेकिन, इमारत का ढांचा तैयार करने में मिलीमीटर भर का फर्क भी चुनौती बन सकता था। इसके बाद मशीन की ही मदद से स्टील का फ्रेम तैयार किया गया। इसके कंप्यूटर डिजाइन पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से काम किया गया। स्टील की बनी आयताकार बीमों की मदद से इमारत को आकार देने की कोशिश की जा रही थी।

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Museum of Future - फोटो : BBC

दिक्कत ये थी कि इमारत का जो डिजाइन था, उस में फिट बैठने वाला कोई भी स्टील का ढांचा उपलब्ध नहीं था। इसलिए मशीन को हर कट वाली छड़ का आकार पहले से ही सुनिश्चित करना था, ताकि ढांचा आसानी से बन जाए और इसे तैयार करने में स्टील बर्बाद भी न हो। इसके लिए ब्यूरोहैपोल्ड के इंजीनियरों ने खुद का ही एल्गोरिदम लिखा। इसकी मदद से इंजीनियरों ने हर हिस्से के लिए एक तयशुदा स्टील की छड़ का आकार सुनिश्चित किया। इसका फायदा ये हुआ कि इंजीनियरों को अपनी जरूरत का स्टील खुद ही नहीं ढालना पड़ा। कंप्यूटर पर ही डिजाइन तैयार करने का फायदा ये हुआ कि ढांचा खड़ा करते वक्त स्टील का एक भी टुकड़ा नहीं काटना पड़ा। ये सब नई तकनीक की मदद से ही मुमकिन हुआ। इससे पहले कंक्रीट से इस स्टील फ्रेम को सहारा देने वाले खंभे खड़े कर लिए गए थे। जिसके बाद स्टील का पूरा फ्रेम सजाने में करीब 14 महीने लग गए।

थ्री-डी मॉडलिंग की मदद से इमारत के भीतर पानी के बहाव और इलेक्ट्रिकल वायरिंग को भी एकदम बारीकी से डिजाइन किया गया। आम तौर पर इमारतें बनाने में एमईपी यानी मेकैनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग की परेशानियां आती हैं। लेकिन, म्यूजियम ऑफ फ्यूचर बनाने वालों ने ये सभी चुनौतियां कंप्यूटर पर ही निपटा दीं। फायदा ये हुआ कि असल ढांचा खड़ा करते वक्त एमईपी की चुनौतियां नहीं आईं।

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