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गंगाजल को क्यों माना जाता है चमत्कारी, बड़ा गहरा है ये रहस्य

फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नवनीत राठौर Updated Mon, 13 Jul 2020 03:26 PM IST
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गंगा नदी - फोटो : अमर उजाला

ये बात हम हमेशा से सुनते आए हैं। अक्सर लोग गंगा के पानी की खूबियां बताते मिल जाते हैं। ये पानी कभी खराब नहीं होता। इसमें कीड़े नहीं पड़ते। इसमें से बदबू नहीं आती। गंगा की धारा पर हम ने तमाम जुल्म किए। इसमें नाले बहाए, लाशें फेंकीं, कचरा डाला, मगर गंगा के पानी की तासीर जस की तस रही।

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गंगा नदी - फोटो : अमर उजाला

आखिर क्या है इसका राज?
असल में गंगा के पानी के कभी न खराब होने की वजह हैं वायरस। जी हां, इसमें कुछ ऐसे वायरस पाए जाते हैं, जो इसमें सड़न पैदा नहीं होने देते। बात करीब सवा सौ साल पुरानी है। 1890 के दशक में मशहूर ब्रिटिश वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैन्किन गंगा के पानी पर रिसर्च कर रहे थे। उस वक्त हैजा फैला हुआ था। लोग मरने वालों की लाशें लाकर गंगा नदी में फेंक जाते थे। हैन्किन को डर था कि कहीं गंगा में नहाने वाले दूसरे लोग भी हैजा के शिकार न हो जाएं। मगर ऐसा हो नहीं रहा था।

हैन्किन हैरान थे क्योंकि इससे पहले उन्होंने देखा था कि यूरोप में गंदा पानी पीने की वजह से दूसरे लोग भी बीमार पड़ जाते थे। मगर गंगा के पानी के जादुई असर से वो हैरान थे।

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गंगा नदी - फोटो : अमर उजाला

निंजा वायरस
हैन्किन के इस रिसर्च को बीस साल बाद एक फ्रेंच वैज्ञानिक ने आगे बढ़ाया। इस वैज्ञानिक ने जब और रिसर्च की तो पता चला कि गंगा के पानी में पाए जाने वाले वायरस, कॉलरा फैलाने वाले बैक्टीरिया में घुसकर उन्हें नष्ट कर रहे थे। ये वायरस ही गंगा के पानी की शुद्धता बनाए रखने के लिए जिम्मेदार थे। इन्हीं की वजह से नहाने वालों के बीच हैजा नहीं फैल रहा था।

यानी बैक्टीरिया पर बसर करने वाले ये वायरस इंसान के लिए बहुत मददगार साबित हो सकते थे। आज के रिसर्चर इन्हें निंजा वायरस कहते हैं। यानी वो वायरस जो बैक्टीरिया को मार डालते हैं। आज से करीब एक सदी पहले मेडिकल दुनिया में एंटीबॉयोटिक की वजह से इंकलाब आया था। चोट, घाव या बीमारी से मरते लोगों के लिए एंटिबॉयोटिक वरदान बन गए। इनकी मदद से हमने कई बीमारियों पर काबू पाया।

आज दुनिया भर में सैकड़ों हजारों लोग ऐसे बैक्टीरिया की वजह से मर रहे हैं। 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2050 तक एंटीबॉयोटिक का असर इतना कम हो जाएगा कि दुनिया भर में करीब एक करोड़ लोग इन बैक्टीरिया की वजह से मौत के शिकार होंगे। आज की तारीख में इतने लोग कैंसर से मरते हैं।

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गंगा नदी - फोटो : अमर उजाला

खतरनाक बैक्टीरिया को चट करने वाले वायरस
अगर एंटीबॉयोटिक का असर कम होता गया तो मामूली चोट से भी लोगों की मौत होने लगेगी। जैसे अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में हुआ करता था। युद्ध में जख्मी लोगों की भी ज्यादा मौत होने लगेगी। इस हालत से बचने में हमारे काम वो वायरस आ सकते हैं, जो गंगा में पाए जाते हैं। ऐसे वायरस कुदरत में बड़ी तादाद में मिलते हैं। आज पूरी धरती पर जितने इंसान हैं, उतने वायरस तो एक ग्राम मिट्टी में पाए जाते हैं।

इनमें से कई वायरस ऐसे हैं, जो बैक्टीरिया पर हमला करके उनका खात्मा कर देते हैं। इन वायरस की सबसे बड़ी खूबी ये है कि ये सभी बैक्टीरिया को निशाना नहीं बनाते। ये खास नस्लों के कीटाणुओं पर ही हमला करते हैं। ऐसे वायरस इंसान के लिए बहुत कारगर साबित हो सकते हैं। ये एंटीबॉयोटिक का विकल्प हो सकते हैं। न्यूजीलैंड की रहने वाली हीदर हेंड्रिक्सन निंजा वायरस पर रिसर्च कर रही हैं। वो ऑकलैंड की मैसी यूनिवर्सिटी से जुड़ी हुई हैं।

हीदर हेंड्रिक्सन कहती हैं कि 'एंटीबॉयोटिक रेसिस्टेंट बैक्टीरिया का खौफ बढ़ता जा रहा है। हम एंटीबॉयोटिक से पहले के दौर में वापस जा रहे हैं।' अगर हमें ऐसे हालत से बचना है तो निंजा वायरस पर काम आगे बढ़ाना होगा। हेंड्रिक्सन अपने शागिर्दों के साथ ऐसे वायरस की लिस्ट बना रही हैं, जो बैक्टीरिया का खात्मा करते हैं।

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गंगा नदी - फोटो : अमर उजाला

एंटिबॉयोटिक की काट
ये वायरस बहुत साधारण होते हैं। ये सिर्फ प्रोटीन से बने होते हैं। जब ये बैक्टीरिया पर हमला करते हैं, तो उसका डीएनए चट कर जाते हैं और अपनी तादाद बढ़ाने लगते हैं। आखिर में बैक्टीरिया में विस्फोट से उसका खात्मा हो जाता है। ऐसे वायरस सिर्फ बैक्टीरिया की खास नस्ल को निशाना बनाते हैं। वहीं एंटीबॉयोटिक मानो एटम बम। जिन पर निशाना लगाया जाता है, वो बैक्टीरिया तो इन एंटीबॉयोटिक से मारे ही जाते हैं। हमारे शरीर में रहने वाले कुछ अच्छे कीटाणु भी इनके शिकार हो जाते हैं।

लेकिन निंजा वायरस, सिर्फ उन्हीं बैक्टीरिया को खत्म करेंगे जो बीमारी फैलाते हैं। यूं तो पश्चिमी देशों में इस पर होने वाली रिसर्च नई है। पर, पूर्वी यूरोपीय देश लंबे अर्से से ऐसे वायरस की मदद से बीमारियों का इलाज कर रहे हैं। मगर उनकी रिसर्च अंग्रेजी में न छपने की वजह से बाकी दुनिया को उनके बारे में पता नहीं था। हीदर हेंड्रिक्सन बताती हैं कि जॉर्जिया, रूस और पोलैंड में वैज्ञानिकों ने ऐसे वायरस पर काफी रिसर्च की है जो बैक्टीरिया का खात्मा करते हैं। इन देशों ने ऐसे कारगर वायरस की फेहरिस्त भी तैयार की है।

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