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सावन विशेष: यहां पीपलेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं महादेव

Mon, 10 Aug 2015 08:16 AM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, डबवाली,सिरसा(हरियाणा)
ब्यूरो/अमरउजाला, डबवाली,सिरसा(हरियाणा) Updated Mon, 10 Aug 2015 08:16 AM IST
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सावन विशेष: यहां पीपलेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं महादेव

Sawan special: worshiped of Lord Shiva as pipleshhwar

सावन विशेष: देवों के देव महादेव को पीपलेश्वर महादेव के रूप में भी पूजा जाता है। महादेव का यह स्वरूप विराजमान है हरियाणा के खंड डबवाली के गांव रामगढ़ में। महाशिवरात्रि के दिन जहां विशाल मेला भरता है। राजस्थान के नागौर के रहने वाले संत कृष्णनाथ को सपने में जंगल और पीपल के पेड़ से निकला शिवलिंग अक्सर दिखाई देता था।



सावन विशेष: यहां पीपलेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं महादेव

Sawan special: worshiped of Lord Shiva as pipleshhwar

करीब साठ साल पहले वे ट्रेन से डबवाली पहुंचे। प्यास लगने पर वह रेलवे स्टेशन पर उतरे, इसी दौरान उनकी गाड़ी छूट गई। वे पैदल चलते-चलते बस अड्डा पर पहुंच गए। उन्होंने सिरसा जाना था, लेकिन गलती से दूसरी बस में बैठ गए, वे गोरीवाला पहुंचे।

सावन विशेष: यहां पीपलेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं महादेव

Sawan special: worshiped of Lord Shiva as pipleshhwar

प्यास लगने पर पानी की तालाश में निकल गए। करीब ढाई किलोमीटर पैदल चलने पर एक तालाब दिखाई दिया। आस-पास जंगल देखकर उन्हें अपना सपना सच प्रतीत हुआ। उन्होंने जंगल की सफाई की। शिवलिंग की पूजा अर्चना शुरू की। कुछ ग्रामीणों ने पीपल से शिवलिंग निकलने की बात पर विश्वास नहीं किया। काफी गहरी खुदाई की।

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सावन विशेष: यहां पीपलेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं महादेव

Sawan special: worshiped of Lord Shiva as pipleshhwar

पीपल के साथ-साथ शिवलिंग गहराई में दिखाई दिया। विश्वास जमने के बाद खोदे गए गड्ढे को मिट्टी से भर दिया गया। उस समय से अब तक शिवलिंग को पीपलेश्वर महादेव के रूप में पूजा जा रहा है। महाशिवरात्रि के मौके पर विशाल मेला भरता है। जिसमें राजस्थान, दिल्ली, यूपी, मुंबई, हरियाणा तथा पंजाब से भक्तजन आते हैं।

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Sawan special: worshiped of Lord Shiva as pipleshhwar

ग्रामीण माला राम, विनोद सुथार ने बताया कि उपरोक्त शिवलिंग के किनारे प्राचीन तालाब था। करीब 12 एकड़ भूमि पर पानी भरा हुआ था। आस-पास के गांव पानी लेने के लिए वहां आते थे। शिवलिंग काफी पुरानी है। गड़रिये शिवलिंग को पत्थर समझकर अपने औजार रगड़ा करते थे। आज वहां आस्था का सैलाब उमड़ता है।

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