जंगल प्यासी धरती को पानी, नमी और छांव देते हैं। तराई कें द्रीय के टांडा के जंगल में प्रकृति का यह साधारण नियम उलट गया है। यहां जंगल प्यासी धरती से पानी लूट रहा है। जंगल में जानवरों के पीने के लिए पानीनहीं बचा है। दूसरी तरफ, इसी जंगल में गर्मियों के सीजन में भी सैनिक फार्म में धान की मस्त खेती जंगल विभाग करने दे रहा है।
यहां प्यासी धरती से पानी लूट रहा है जंगल
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खत्तों में लोग अब 21 फुट की गहराई से पानी लेने को मजबूर हैं और वन विभाग संजय वन में ट्यूबवेल के जरिये हरियाली को बचाए हुए है। टांडा के आधे से अधिक जंगल में वन्य जीवों को मात्र एक खोदे गए तालाब से ही पानी मिल पा रहा है।
टांडा के जंगल में 2017 में अब तक तीन हाथियों की मौत हो चुकी है। हल्द्वानी तराई केंद्रीय प्रभाग का यह जंगल पानी और हरियाली की कमी से जूझ रहा है। कभी यहां साल, शीशम, रोहणी, बांस आदि का साम्राज्य था। अब इस जंगल में पॉप्लर, यूकेलिप्टस, सागौन का राज है। इन पेड़ों के बीच में वन विभाग के वन प्रबंधन की कलई खुलकर सामने आ रही है।
हाल यह है कि आधे से अधिक जंगल के लिए सिर्फ एक खोदे गए तालाब का पानी ही उपलब्ध है। खस्सीभोज खत्ते के पास के इस तालाब में भी वन विभाग बोरिंग के जरिये भू जल डालता है। इसके अलावा रामपुर रोड पर हल्द्वानी रेंज में भी एक बड़ा तालाब खोदा गया था। इस तालाब में पानी नहीं है। चीड़खत्ते के पास के दो नाले, सापठानी खत्ते के पास दो नाले, खस्सीभोज खत्ते के पास के एक बड़े नाले, सैनिक फार्म के पीछे से निकलने वाले दो नाले सहित करीब 20 नाले इस क्षेत्र में हैं। ये सभी नाले मुहानों से ही सूखे हुए हैं।
जंगल में करीब दो दर्जन पोखर भी हैं जो बिल्कुल सूखे हुए हैं। जंगल से पानी बिल्कुल ही सूख गया है। दूसरी ओर, वन विभाग की ओर से लीज पर दिए गए सैकड़ों हेक्टेयर के सैनिक फार्म में जून में धान की फसल ली जा रही है। जाहिर है कि इस फार्म से साल में कम से कम दो बार धान की फसल ली जा रही है। यह तब है जबकि भूजल के गिरते स्तर के कारण खत्तों में रह रहे लोगों को अब पानी पाने के लिए कुओं को पांच फुट और गहरा खोदना पड़ रहा है। पूरा जंगल बोरिंग और ट्यूबवेलों से अटा पड़ा है। संजय वन में ही वन विभाग ट्यूबवेल के जरिये अपनी नर्सरी और हरियाली को बचाए हुए है।