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काली कुमाऊं की खड़ी होली: देश-दुनिया में होती है इसकी चर्चा, 16वीं सदी से चली आ रही है ये परंपरा, तस्वीरों में देखिए...

सतीश जोशी ‘सत्तू’, संवाद न्यूज एजेंसी, चंपावत Published by: रेनू सकलानी Updated Sat, 19 Mar 2022 02:19 PM IST
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Holi 2022: Uttarakhand Kali Kumaoni Khadi Holi: Famous in country and the world, this tradition is going on since 16th century
कुमाऊंनी होली - फोटो : अमर उजाला

यूं तो होली पूरे देश में उल्लास के साथ मनाई जाती है, लेकिन चंपावत जिले में ढोल नगाड़ों की धुन और लय-ताल और नृत्य के साथ गाई जाने वाली खड़ी होली अपना विशेष स्थान रखती है। संगीत सुरों के बीच बैठकी होली के भक्ति, शृंगार, संयोग, वियोग से भरे गीत गाने की परंपरा काली कुमाऊं अंचल के गांव-गांव में चली आ रही है।



एकादशी को रंगों की शुरूआत के बाद गांव-गांव में ढोल-झांझर और पैरों की विशेष कदम ताल के साथ खड़ी होली गायन चलता है। इसी दिन चीर बंधन के साथ शिव स्तुति से होली गायन शुरू किया जाता है। इसमें शिव के मन माहि बसे काशी..., हरि धरै मुकुट खेले होरी... शामिल है। आध्यात्मिक रसों, भक्ति, शृंगार आदि से जुड़ीं होलियों का गायन छरड़ी तक किया जाता है। इसके अलावा परिवार, समाज में होने वाली विभिन्न घटनाओं, स्त्री पुरुष प्रसंग, हास्य ठिठोली से भरी होलियां भी गाई जाती हैं। 

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कुमाऊं में साल 1850 से बैठकी होली गायन हो रहा है। होली हर्ष, उल्लास और ऋतु परिवर्तन का पर्व है। जनसामान्य इसे होलिका एवं प्रहलाद के प्रसंग से जोड़कर देखता है, लेकिन होली का मनोविनोद, गीत संगीत, मिलना, रंग खेलना एक पक्ष है तो होलिका दहन दूसरा। कुमाऊं की होली गीतों से जुड़ी है, जिसमें खड़ी व बैठकी होली ग्रामीण अंचल की ठेठ सामूहिक अभिव्यक्ति है। यह कहना है संगीताचार्य टनकपुर महाविद्यालय संगीत विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज उप्रेती का।

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कुमाऊंनी होली - फोटो : अमर उजाला
हर होली गीत से अलग रंग छलकता है। ‘हम घर पिया परदेश, बदरिया जन बरसों, पश्विम दिशा घनघोर बदरिया जन बरसों’ होली होली गीत में जहां जोबन की ज्वाला और प्रकृति से विनय करते दिखती है, तो वहीं ‘पतली कमर, लंबे केस, सुघड़ जल भरन चली पनघट पर...’ हो या ‘चल कहो तो यहीं रम जाए, गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे’ सरीखे होली गीत नारी के शृंगार और सौंदर्य का बखान करते हैं।
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कुमाऊंनी होली - फोटो : अमर उजाला
‘पिया के विरह में भई हूं मै बावरी, विरह कलेजुआ में चोट दई रे...’ और ‘आज पिया के गलेवा लगूंगी, कलंक लगे सो लगे हो, सास बुरी गोरी, ननद हठीली, देवरा लड़ै तो, लड़ै हूं’ जैसे होली गीतों में विरह बखूबी झलकता है। ‘जल कैसे भरूं जमुना गहरी, ठाड़ेे भरूं राजा राम जी देखे, बैठी भरूं छलके गगरी’ में अपने परिधान को लेकर स्वयं महिला की परेशानी झलकती है। ‘अब कैसे जोबना बचाओगी गोरी, फागुन मस्त महीना की होरी’ होली गीत पर  इठलाती गोरी को सखियां फागुन में पशोपेश में डाल देती हैं।
Holi 2022: Uttarakhand Kali Kumaoni Khadi Holi: Famous in country and the world, this tradition is going on since 16th century
कुमाऊंनी होली - फोटो : अमर उजाला
डॉ. उप्रेती के मुताबिक बैठकी होली को नागर होली भी कहते हैं। बैठकी होली शास्त्रीय संगीत से जुड़ी परंपरा है, जो लोकगीतों के करीब भी है। कुमाऊं में होली गायन की परंपरा का आरंभ 16वीं सदी में राजा कल्याण चंद के समय में हुआ। कुमाऊं की बैठकी होली का नियमित गायन वर्ष 1850 से माना जाता है। वर्ष 1870 से कुमाऊं में इसे वार्षिक समारोह के रूप में मनाया जाने लगा।
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कुमाऊंनी होली - फोटो : अमर उजाला
शास्त्रीय संगीत से उपजी कुमाऊं की बैठी होली के स्वरूप को बनाने में उस्ताद अमानत हुसैन का नाम सर्वप्रथम आता है। उन्होंने होली गायकी को ठुमरी के स्वरूप में सोलह मात्राओं में पिरोया। कुमाऊं की होली के काव्य में विस्तृत भाव एवं संगीत पक्ष में शास्त्रीयता होने से यहां की होली गायन को ऊंचाई तक पहुंचाया है। यहां कई गांवों में होली गायन के साथ झोड़ा-चांचरी लोक नृत्यसंगीत शौली का भी चलन है।
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