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चमोली आपदा: छह साल पहले की सिफारिशों नहीं हुआ अमल, पर्यावरणविदों ने अनदेखी को बताया खतरनाक
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Thu, 18 Feb 2021 01:30 PM IST
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चमोली आपदा
- फोटो : अमर उजाला
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प्रदेश की जल विद्युत परियोजनाओं में सुरक्षा को लेकर छह साल पहले की गई सिफारिशों पर अमल किया गया होता तो चमोली आपदा के जख्म कुछ कम होते। यह कहना है पर्यावरणविद और ऑलवेदर रोड की निगरानी को बनी उच्चाधिकार प्राप्त समिति(एचपीसी) के अध्यक्ष रवि चौपड़ा का। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को पत्र लिखकर नीति घाटी में निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं और ऑल वेदर रोड में पर्यावरण की अनदेखी पर चिंता जताई है।
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चमोली आपदा
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वर्ष 2013 में केदारनाथ की आपदा के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनाओं के पर्यावरण पर प्रभाव पर अध्ययन के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। रवि चौपड़ा ही इस समिति के अध्यक्ष बनाए गए थे। अप्रैल 2014 में इस समिति ने सर्वोच्च न्यायालय को अपनी सिफारिशें सौंपी थीं।
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चमोली आपदा
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इसमें एक सिफारिश जल विद्युत परियोजनाओं के लिए खतरे की पूर्व चेतावनी की व्यवस्था करने को कहा गया था और दूसरी सिफारिश ग्लेशियरों के नजदीक बांधों का निर्माण न करने देने की थी। रवि चौपड़ा के मुताबिक नीति घाटी में तीन और परियोजनाएं प्रस्तावित थीं, जिनके निर्माण पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई थी।
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राहत-बचाव कार्य जारी
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यह रोक न होती तो क्षेत्र में बड़ा नुकसान होता। ऋषि गंगा बांध परियोजना और एनटीपीसी की परियोजना ग्लेशियर के नजदीक बन रही थी और इनमें खतरे की पूर्व चेेतावनी की पुख्ता व्यवस्था नहीं की गई थी। चमोली आपदा के नुकसान के पीछे एक वजह परियोजनाओं के कुल संचयी प्रभाव की अनदेखी को भी माना जा रहा है।
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रवि चौपड़ा के मुताबिक चमोली आपदा की नीति घाटी में ढाल कटाव, विस्फोट, सुरंग निर्माण, वनों के कटान आदि से आपदा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी। इनके संचयी प्रभाव का अध्ययन नहीं किया गया। यही स्थिति ऑल वेदर रोड की भी है। चार धाम क्षेत्र में ही इस परियोजना का निर्माण हो रहा है और इसमें भी संचयी प्रभाव का अध्ययन नहीं किया गया। ऑल वेदर रोड को लेकर केद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय अपना रुख लगातार बदल रहे हैं।
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