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Harish Rana Euthanasia: 'बेटे की पीड़ा देख मां ने मांगी मुक्ति', हरीश को विदाई देने वाली लवली दीदी से बातचीत
समीर बिसारिया, अमर उजाला, गाजियाबाद
Published by: Sharukh Khan
Updated Tue, 17 Mar 2026 08:18 AM IST
सार
गाजियाबाद निवासी हरीश राणा को अंतिम विदाई में आशीष देने वाली ब्रह्माकुमारी बीके लवली दीदी से अमर उजाला ने खास बातचीत की। इस दौरान लवली दीदी ने कहा कि तकलीफ शरीर को होती है आत्मा को नहीं।
गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की राज अंपायर सोसायटी निवासी हरीश राणा के अंतिम सफर को पीड़ारहित बनाने का आशीष देने वाली ब्रह्माकुमारी बीके लवली दीदी का कहना है कि आत्मा और शरीर अलग-अलग बातें हैं। तकलीफ शरीर को होती है आत्मा को नहीं। शरीर गाड़ी है और आत्मा ड्राइवर। गाड़ी जब पुरानी होती है तब कहा जाता है कि इसे छोड़ो और इससे बाहर आ जाओ।
लवली दीदी ने यह बातें सोमवार को अमर उजाला से बातचीत में कहीं। वह एक दिन पहले हरीश को... सबको माफ करते, सबसे माफी मांगते हुए सो जाने का संदेश देकर चर्चा में हैं।
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लवली दीदी से खास बातचीत
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
उन्होंने बताया कि करीब 18 वर्षों से हरीश राणा का परिवार ब्रह्माकुमारीज से जुड़ा है। पांच वर्ष पहले यह परिवार दिल्ली से राजनगर एक्सटेंशन शिफ्ट हुआ था। इससे पहले 13 वर्षों तक दिल्ली स्थित बीके केंद्र से जुड़ा रहा।
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हरीश राणा की फाइल फोटो
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हरीश के पिता कई बार ब्रह्माकुमारीज के प्रमुख केंद्र माउंट आबू भी जाते रहे हैं। हर रोज करीब एक घंटे तक बेटे की शांति और कुशलता के लिए मेडिटेशन करते थे। उनके अनुसार मैं समझ सकती हूं कि माता-पिता ने बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगने का निर्णय बहुत कठोर मन से लिया होगा।
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बेटे हरीश के साथ मां
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बेटे की पीड़ा देख मां ने मांगी थी मुक्ति
लवली दीदी ने बताया कि हरीश की मां निर्मला देवी 13 वर्षों तक अपने बेटे की पीड़ा देख दो साल पहले ही लड़ाई से हार गई थीं। उसे पल-पल तड़पता देख उन्होंने पहली बार ब्रह्मकुमारी केंद्र में आकर उसकी मुक्ति के लिए इच्छामृत्यु का विचार रखा था। इस बारे में बात करते हुए उनकी आंखों से आंसू छलक रहे थे। उन्होंने कहा था कि '... बस अब बहुत हो चुका... बेटे को इतने दुख में नहीं देख सकती। उसका शरीर अब बहुत पीड़ा में है और उसे मुक्ति दिला दीजिए।'
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बेटे हरीश के साथ माता-पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
लवली दीदी ने कहा कि जब मां ने यह बात कही तो उन्होंने उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा कि शरीर को कष्ट हो सकता है, आत्मा को नहीं। इसलिए उन्होंने हरीश के लिए जो सोचा है वह काफी बेहतर है। इसके बाद इच्छा मृत्यु के लिए विशेषज्ञों से बातचीत की और प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।
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