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प्याज की बढ़ी कीमतों पर सुषमा से नाराज हो गई थी दिल्ली की जनता, छीन ली थी सीएम की कुर्सी
Wed, 07 Aug 2019 02:22 AM IST
शाहरुख खान
नवनीत शरण, अमर उजाला, नई दिल्ली
नवनीत शरण, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 07 Aug 2019 02:22 AM IST
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फाइल फोटो
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दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज कानून व्यवस्था को लेकर बेहद सजग थीं। अक्सर वह दिल्ली पुलिस की जिप्सी में बैठकर रात में सड़कों पर घूमती थी। उनका मानना था कि राजधानी में लड़कियां सुरक्षित रहे। वो घर से निकले तो कम से कम उन्हें खुद की सुरक्षा की चिंता न रहे। राजधानी से यह संदेश देश के हर राज्य और हर कस्बे में जाए और महिलाओं के सुरक्षित जीवन के लिए वहां की राज्य सरकारें जिम्मेदारी लें।
उनका यह प्रयास सफल भी रहा। उनके मुख्यमंत्रित्वकाल दिल्ली में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में कमी आई, लेकिन अचानक से प्याज के भाव में बढ़ोतरी ने राजधानी की जनता ने उन्हें नकार दिया। इसके बावजूद वो दिल्ली की राजनीति से बराबर जुड़ी रहीं। लालकृष्ण आडवाणी, मदनलाल खुराना, और अरुण जेटली के साथ सुषमा स्वराज का दिल्ली के हर चुनाव में दखल रहता था। दिल्ली की राजनीति में भाजपा की ट्रंप कार्ड मानी जाने वाली सुषमा स्वराज के खिलाफ कांग्रेस ने शीला दीक्षित पर दांव लगाया था।
सुषमा स्वराज
शीला का जादू दिल्ली पर इस कदर छाया कि सुषमा स्वराज को आगे करने के बाद भी भाजपा अपना सियासी किला नहीं बचा पाई। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी और महंगाई को माना गया। 1993 में भाजपा दिल्ली में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई और पार्टी के दिग्गज नेता मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री बने। 2 साल 86 दिन के बाद 1996 में मदन लाल खुराना की जगह साहब सिंह वर्मा को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया गया।
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सुषमा स्वराज (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
हालांकि बचे हुए कार्यकाल को वो पूरा नहीं कर सके। विधानसभा चुनाव से महज कुछ महीने पहले भाजपा ने कद्दावर महिला नेता सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बना दिया। वहीं, कांग्रेस पार्टी ने चुनाव से पहले दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की कमान शीला दीक्षित को सौंप दी। इस तरह से दिल्ली की सियासी जंग दिलचस्प चली थी। शीला ने जहां दिल्ली में कांग्रेस संगठन को सक्रिय किया, वहीं खुद को सुषमा स्वराज के विकल्प के तौर पर स्थापित किया।
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सुषमा स्वराज
- फोटो : PTI
इसके चलते 1998 का चुनाव शीला दीक्षित बनाम सुषमा स्वराज हो गया। दोनों दिग्गज नेता थी। इस जंग में सुषमा स्वराज पर शीला दीक्षित का जादू भारी पड़ा। प्याज की कीमत, महंगाई के कारण भाजप महज 15 सीटों पर सिमट गई। हालांकि सुषमा अपनी सीट जीतने में सफल रहीं।