कभी ट्रेन के डिब्बों में गाया करते थे आयुष्मान खुराना, बोले-मैं ऐसा ही हूं, मुझे धक्का देना पड़ता है
आयुष्मान कहते हैं, 'मैं बचपन से ही अभिनेता बनना चाहता था। मुझे नाटक-नौटंकी में मजा आता था। मैं दादी को गुरुद्वारे में जब भी गाते सुनता था, तो घर में उनकी नकल उतारा करता था। शीशे के आगे खड़े होकर खुद को खूब निहारता था, लेकिन मैं थोड़ा वैसा आदमी हूं, जिसे धक्का देना पड़ता है। अभिनय का जुनून था, लेकिन कॉलेज या कहीं नाटक में भी हिस्सा लेने के लिए मेरे पिता को ही कहना पड़ता था। मैं मानता हूं कि मेरे पिता का जो हुनर है या उनमें जो कला है, वही मेरे अंदर आई है।'
आयुष्मान ने बताया, 'मैं अपने पिता से बहुत प्रभावित होता हूं। उनकी ऊर्जा पहले भी मुझे बहुत प्रेरित करती थी, इसी वजह से कॉलेज में प्रतियोगिता आदि में भाग लेता रहता था। गायिकी का शौक भी शुरू से ही था। कॉलेज के समय दिल्ली से मुंबई जाने वाली पश्चिम एक्सप्रेस ट्रेन में मैं और मेरे दोस्त हर एक डिब्बे में जाकर गाया-बजाया करते थे। उससे हमें पैसे मिलते थे, जिसका इस्तेमाल हम किसी न किसी चीज के लिए करते थे। एक बार तो इससे हमारे पास इतना पैसा जमा हो गया कि उससे हम सारे दोस्त गोवा की सैर कर आए थे।'
आयुष्मान बताते हैं, 'जब कॉलेज खत्म हुआ, तो मैंने सोचा कि घर में रहकर 3-4 दिन थोड़ा आराम करूंगा, लेकिन पापा ने मेरा बैग पैक करके, सारे टिकट बुक करके मुझे अगले ही दिन मुंबई रवाना कर दिया था। वह जानते थे कि उनका बेटा कैसा है। उन्होंने मुझसे एक ही बात कही थी कि अभी कोशिश नहीं करोगे, तो कभी आगे नहीं बढ़ पाओगे। बस उसके बाद मुंबई में आकर मेरा संघर्ष शुरू हो गया।'
'17 साल की उम्र में चैनल वी के शो में मौका मिला, फिर एमटीवी के एक शो में जब विनर बनकर निकला तो लगा था कि कुछ हासिल कर लिया है। इसी तरह दिल्ली में बिग एफएम में नौकरी की, इसके जरिए मेरी आवाज को पहचान मिली। रेडियो में एक समय तक काम करने के बाद मैंने वीडियो जॉकी के रूप में एमटीवी में करियर शुरू किया। कई सारे शो होस्ट किए। 2012 में मुझे शूजित सरकार के यहां से फोन आया। फिल्म 'विक्की डोनर' बन रही थी, उसके लिए ऑडिशन दिया। ऑडिशन में सेलेक्ट हुआ और फिल्म का हिस्सा बन गया। फिल्म की सफलता ने मुझे और आत्मविश्वास से भर दिया। इस फिल्म में मैंने एक गाना भी गाया, जिसे खूब पसंद किया गया।'