Manoj Bajpayee Video Interview: मुझे मजा आता है जब मनोज बाजपेयी गायब हो जाए, मैं किरदार का इंतजार नहीं करता
मेरा मानना है कि अभिनय या कोई दूसरी कला आसान नहीं है। मैं किरदार का इंतजार नहीं करता हूं कि वह मेरे पास आए मैं किरदार के पास जाना पसंद करता हूं। मेरा तरीका थोड़ा अलग है। मेरा ये प्रयास रहता है कि मैं जब अपने आप को देखूं तो मैं वह किरदार ही लगूं। मुझे मजा आता है इसमें। मुझे मजा आता है जब मनोज बाजपेयी गायब हो जाए।
यह पूरा वीडियो इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं...
क्या करें, ये तो एक अभिनेता होने का श्राप है। ‘गली गुलियां’ के बारे में तो अब सबको पता ही है लेकिन उससे पहले मुझे किसी किरदार को करने के बाद अगर मानसिक समस्या हुई थी तो वह हुई थी फिल्म ‘शूल’ के बाद। मुझे नींद नहीं आती थी। जैसे ही सोने जाता था, मुझे अजीब अजीब से ख्याल आते थे। बहुत ही हिंसक विचार आने शुरू हो जाते थे। मेरी तबियत खराब रहने लगी थी। अब सोचता हूं तो लगता है कि ऐसा भी क्या था, कि मैंने क्यूं ऐसा किया..
बहुत जरूरी है। खासतौर से अगर आपकी मातृभाषा वह नहीं है जिसमें आप अभिनय कर रहे हैं। इसका सबसे अच्छा तरीका है कि आप उस किरदार को अपने सिस्टम का हिस्सा बना लो। आप उसकी शख्सीयत को ओढ़ लो। मैं बहुत सारे ऐसे कलाकारों के साथ काम करता हूं जिनकी मुख्यभाषा हिंदी नहीं है। उनको मैं कोंकणा सेन शर्मा का उदाहरण देता हूं, संवादों की रिहर्सल में समय लगाने का, मेहनत करने का।
अरे, मैं बहुत शौकीन हूं खाने का। मुझे खाना खाने का शौक हमेशा से रहा है। बिहारी आदमी हूं। बिहारियों को अमूमन खाना बहुत अच्छा लगता है। सुबह का नाश्ता कर रहे होते हैं तो दोपहर के भोजन में क्या बनेगा, इस पर चर्चा हो रही होती है..! लेकिन, बनाने का शौक मुझे बहुत नया हुआ है। अभी पांच साल पहले से मैंने खाना बनाना शुरू किया है। मैंने अपने पिता की मटन बनाने की रेसिपी बनाई है। यखनी पुलाव बनाया। भुना गोश्त बनाया और शाकाहारी लोगों के लिए मैंने आलू परवल और आलू गोभी भी बनाई। मछली भी बनाता हूं, सरसों वाली। बिहार और बंगाल की खाने और भाषा की संस्कृति भी बहुत करीब की है।