सिनेमा, सियासत और साजिशें, मुंबई में सब साथ साथ चलते हैं। और, ये बात बंबई के मुंबई बनने से छह साल पहले की है। 16 फरवरी 1990 को फिल्म ‘अग्निपथ’ रिलीज हुई तो धर्मा प्रोडक्शंस के दफ्तर में दिन भर फोन घनघनाते रहे। वितरकों के फोन आ रहे थे कि फिल्म के प्रिंट में कुछ गड़बड़ है। तब डिजिटल का जमाना नहीं था। फिल्मों की शूटिंग होती, उनकी स्टीनबेक जैसी मशीनों पर मैनुअल एडीटिंग होती। फिर डबिंग होती। साउंड की रील अलग से तैयार होती। फिर विजुअल और ऑडियो को मिलाकर एक ‘मैरीड’ प्रिंट बनता और उसे जांचने परखने के बाद बने फाइनल प्रिंट की कॉपियां तैयार होती है। फिल्म में जितनी ज्यादा रील, उतनी ज्यादा लंबी फिल्म और उसे एक थिएटर में चलाने के लिए जरूरत पड़ते उतने ही ज्यादा रील के डिब्बे। ये उन दिनों की बात हैं जब बड़े शहरों के रेलवे स्टेशनों पर फिल्मों की रीलों के डिब्बे प्लेटफॉर्म पर पसरे दिखना आम बात होती। धर्मा प्रोडक्शंस को जो फोन आ रहे थे वे इस बात के थे कि फिल्म ‘अग्निपथ’ की डबिंग ठीक से नही हुई है। जहां अच्छे साउंड सिस्टम थे, वहां तो लोग कुछ समझ भी पा रहे थे लेकिन जिनके स्पीकर पुराने थे, वहां के लोगों के कुछ पल्ले नहीं पड़ा कि फिल्म में विजय दीनानाथ चौहान बोल क्या रहे हैं!
Bioscope S2: ‘अग्निपथ’ पर चलने से कम नहीं था अमिताभ का ये रोल, मिला अदाकारी का पहला नेशनल अवॉर्ड
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूरा नाम, विजय दीनानाथ चौहान
अमिताभ बच्चन का अपने फिल्मी जीवन का सबसे बड़ा प्रयोग थी फिल्म ‘अग्निपथ’। फिल्म के निर्देशक मुकुल आनंद को खुद अमिताभ ने बुलाकर एक ऐसी फिल्म की प्लानिंग करने को कहा था जो लीक से बिल्कुल अलग हो। अमिताभ ने उनको भरोसा भी दिया कि अगर ऐसी कोई कहानी वह ला सके तो वह फिल्म की मेकिंग में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेंगे। अमिताभ अपना सबसे ऊंचा स्टारडम जी चुके थे और फिल्म ‘मोहब्बतें’ से कमबैक करने में अब भी 10 साल से ज्यादा का वक्त बाकी था। मुकुल आनंद ने फिल्म ‘गॉडफादर’ में मर्लन ब्रांडो के प्रयोग को अमिताभ बच्चन पर दोहरा दिया। गालों में अंदर की तरफ रूई के गोले रखने को दिए गए ताकि चेहरा थोड़ा भारी लगे और आवाज़ भरभराई सी। फिल्म ‘देशप्रेमी’ अगर आपको याद हो तो उसमें अमिताभ बच्चन का एक रोल मास्टर दीनानाथ का था। कहानी ऐसी सोची गई कि अगर देश पर जान छिड़कने वाले एक मास्टर का बेटा अपराधी बन जाए तो वह क्या करेगा? अमिताभ बच्चन के पूरे करियर के वैसे तो अनगिनत संवाद लोकप्रिय रहे हैं लेकिन अमिताभ बच्चन की बोलने की स्टाइल का जब भी जिक्र आता है तो हर किसी की जुबान पर होता है तो बस एक संवाद, ‘पूरा नाम, विजय दीनानाथ चौहान, बाप का नाम दीनानाथ चौहान, मां का नाम सुहासिनी चौहान, गांव मांडवा, उमर छत्तीस साल..!’ फिल्म में अपने संवाद बोलने के लिए अमिताभ ने एक अलग शैली और एक अलग तरह की आवाज निकाली, जो आम दर्शकों को समझ नहीं आई। फिल्म फ्लॉप हो गई।
मान्या सुर्वे की कहानी!
फिल्म ‘अग्निपथ’ मैंने कानपुर के बारादेवी चौराहे के पास के एक थिएटर में देखी। बालकनी में गिनती के दर्जन भर लोग भी नहीं और जो थे वे समझ नहीं पा रहे थे कि अमिताभ बच्चन आखिर बोल क्या रहे हैं। पुराना साउंड सिस्टम और नया फिल्मी प्रयोग। दोनों के बीच ट्यूनिंग हो नहीं पाई। अगले साल अमिताभ बच्चन को अपनी इसी स्टाइल के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। तब जाकर लोगों को लगा कि अरे, ये तो कुछ बड़ा हो गया है। लोगों ने फिर वीसीआर वगैरह पर फिल्म देखनी शुरू की और होते होते फिल्म को एक अलग ही दर्जा हिंदी सिनेमा में हासिल हो गया। वापस फिल्म ‘अग्निपथ’ के उस संवाद की तरफ लौटते हैं जिसका जिक्र विजय अपना परिचय देने के लिए करता है। वह अपनी उम्र 36 साल बताता है, फिर आगे साल भर की कहानी फिल्म में और है। कुछ लोग कहते हैं कि फिल्म ‘अग्निपथ’ मुंबई के चर्चित वरदराजन मुदलियार की कहानी है तो कुछ लोग इसे मान्या सुर्वे से जोड़ते हैं। मान्या सुर्वे वही है जिसने दाऊद के भाई शब्बीर को निपटा दिया था। मुंबई के पठान गैंग और दाऊद गैंग के बीच तेजी से उभरा दबंगई का नया केंद्र था मान्या। पठानों ने उसे अपनी ओर किया। दाऊद गैंग को उसके निशाने पर रखा। लेकिन, मान्या सुर्वे का नाम सुर्खियों में छपा मुंबई में हुए पुलिस एनकाउंटर में मारे गए पहले अंडरवर्ल्ड डॉन के रूप में। उस समय उसकी उम्र 37 साल थी। ये भी संयोग ही है कि अमिताभ बच्चन की एक और फिल्म ‘दीवार’ में उनका किरदार हाजी मस्तान से काफी कुछ मिलता जुलता दिखाई देता है।
अदाकारी का पहला नेशनल अवार्ड
अमिताभ बच्चन को अभिनय का पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाने वाली फिल्म ‘अग्निपथ’ की कहानी विजय के बचपन से शुरू होती है। अगर आपने ये फिल्म अब तक नहीं देखी है तो इसे देखते समय फिल्म के शुरू के 20 मिनट पर फोकस करना बहुत जरूरी है। हिंदी फिल्मों में ऐसी फिल्में गिनती की ही है जिनकी शुरूआत इतनी दमदार है, फिर कहानी आगे चलकर और पकड़ बनाती है और फिल्म क्लाइमेक्स तक अपना प्रभाव किसी भी फ्रेम में कम नहीं होने देती। कांचा चीना नाम का स्मगलर विजय के पिता दीनानाथ चौहान के खिलाफ साजिश रचता है। मां के साथ दुर्व्यहार होता है। और, बालक विजय अपने पिता का बदला लेने के लिए अपराध की दुनिया में चला जाता है। बड़ा होकर वह अपना दबदबा बनाता है, लेकिन एक दिन एक कातिलाना हमले में वह करीब करीब मार दिया जाता है। ऐन मौके पर नारियल बेचने वाला कृष्णा उसकी जान बचाता है। विजय की बहन का वह बॉडीगार्ड बनता है। उधऱ अस्पताल में मिली नर्स मैरी की सेवा विजय को प्रभावित करने लगती है। इस फिल्म का जो रीमेक बाद में करण जौहर ने बनाया, उसमें कृष्णा का किरदार हटा दिया गया है और रऊफ लाला का किरदार अलग से जोड़ दिया गया है। फिल्म की कहानी संतोष सरोज ने लिखी थी और इसके संवाद जो संतोष सरोज ने लिखे थे, उन पर धार रखने का काम बाद में कादर खान ने किया। कादर खान उन दिनों फिल्म निर्देशक बनने की कोशिशों में लगे रहते थे और इसके लिए एक फिल्म ‘जाहिल’ भी उन्होंने लिख रखी थी। इस फिल्म की शुरूआत के पूरे बीस मिनट कादर खान ने मुकुल आनंद के अनुरोध पर फिल्म ‘अग्निपथ’ को दे दिए थे।
रिश्तों की हैट्रिक
फिल्म ‘अग्निपथ’ में इसके निर्देशक मुकुल आनंद का काम अपने पूरे शबाब पर रहा। अमिताभ बच्चन ने उनका काम पहले भी देखा हुआ था और तभी खासतौर से वह उनके साथ काम करने को उत्सुक भी थे। लेकिन, फिल्म ‘अग्निपथ’ की मेकिंग के दौरान दोनों के जो रिश्ते बने, वे फिल्म ‘हम’ और ‘खुदा गवाह’ तक बखूबी कायम रहे। कम लोग ही जानते होंगे कि अमिताभ बच्चन के लिए सुदेश भोसले का गाया सुपर डुपर हिट गाना ‘जुम्मा चुम्मा दे दे जुम्मा’ दरअसल संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फिल्म ‘अग्निपथ’ के लिए ही तैयार किया था। लेकिन विजय दीनानाथ चौहान का किरदार ऐसा बन चुका था कि उसका ऐसे किसी गीत पर नाचना अमिताभ को ठीक नहीं लगा। वैसे तो अमिताभ बच्चन ने मुकुल आनंद से वादा किया था कि वह इस फिल्म की मेकिंग में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेंगे लेकिन वह सुपरस्टार ही क्या जो अपनी फिल्म में अपने हिसाब से रद्दोबदल न कराए। फिल्म के एक दृश्य में विजय दीनानाथ चौहान अपनी मां से बहस करने के बाद बेडरूम में चला जाता है और वहां मैरी के साथ अंतरंग होता है। लेकिन, अमिताभ को यह दृश्य भी विजय दीनानाथ चौहान की कमजोरी दिखाता समझ आया। नतीजा, एडीटिंग टेबल पर ये पूरा सीन ही फिल्म से उड़ा दिया गया। फिल्म रिलीज होने के बाद माधवी ने अपना रोल जरूरत से ज्यादा छोटा हो जाने की बात भी मीडिया से कही थी और ये माना था कि फिल्म में उनका किरदार वैसा निखर कर सामने नहीं आ पाया, जैसा उन्हें फिल्म के निर्माता और निर्देशक ने बताया था।